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शुक्रवार, 15 मई 2020

सच कडुआ होता है

क्या है प्रवासी मजदूरों की वास्तविक दशा...???
एक स्वस्थ ब्यक्ति एक दिन में कितने किमी की यात्रा कर सकता है...???
प्रवासी मजदूरों की असलियत बताती सतीश मिश्र की ये रिपोर्ट...!!!
वर्ष-2011 की जनगणना के अनुसार उस समय देश में लगभग 14 करोड़ प्रवासी नागरिक थे अर्थात्‌ 14 करोड़ लोग अपने गृह प्रदेश को छोड़कर दूसरे प्रदेशों में रह रहे थे स्वाभाविक है कि यह सभी लोग अपनी आजीविका के कारण ही अन्य प्रदेशों में रह रहे थे यह सत्य है कि ये सभी लोग मजदूर नहीं थेलेकिन सत्य यह भी है कि इनमें सबसे ज्यादा संख्या मजदूरों की ही थीअगर यह संख्या 30% भी मान लीजिए तो स्पष्ट होता है कि लगभग 10 वर्ष पहले देश में लगभग सवा चार करोड़ प्रवासी मजदूर थे तब से अब तक देश की अर्थव्यवस्था के आकार में हुई लगभग 50% की वृद्धि के फलस्वरुप आज देश में प्रवासी मजदूरों की संख्या कम से कम 6 करोड़ होनी चाहिए
आज कल प्रवासी मजदूरों के पलायन के नाम पर हो रहे सुनियोजित प्रायोजित सियासी मीडियाई हुड़दंग के बावजूद क्या 6 करोड़ लोग आपको पलायन करते दिख रहे हैं ? यदि ऐसा होता तो देश में भयंकर भगदड़ मच गई होतीभयानक अराजकता फैल गई होतीइस देश के राजनीतिक नरपिशाचों ने यही करना ही चाहा थालेकिन ईश्वर की कृपा और केन्द्र सरकार तथा 2-3 राज्य सरकारों को छोड़कर देश के शेष सभी राज्यों की सरकारों की सक्रियता सजगता और कर्मठता के परिणामस्वरूप राजनीतिक नरपिशाचों का वह पैशाचिक षड्यंत्र सफल नहीं हो सका हैगांव जाने के लिए उतावली बौराई दिख रही भीड़ की संख्या 15-20 लाख या अधिकतम 25 लाख है इसमें बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की है जो बंदी के कारण मिली छुट्टी का उपयोग घर पर ईद मनाने के लिए कर लेना चाहते हैंदूसरी संख्या उन लोगों की है जो शहरों में लॉकडाउन के कारण हुई छुट्टी में घर इसलिए पहुंच जाना चाहते हैं, क्योंकि लॉकडाउन के कारण शहरों में लगी पाबंदियां उन्हें रास नहीं आ रहीं
इन मजदूरों के पलायन का कारण अर्थिक बदहाली कंगाली भुखमरी बता रहे न्यूजचैनल के एडिटर एंकर अपनी अकल पर बंधी काली पट्टी खोलकर किसी और के बजाय खुद अपने ही न्यूजचैनल की रिपोर्टों को ध्यान से दोबारा देखें तो उन्हें सच समझ में आ जाएगामित्रों आप किसी भी न्यूजचैनल की रिपोर्ट देख लीजिए हज़ारों ट्रक और बसों में लद कर गांव भाग रहे मजदूर और उनको लाद रहे ट्रक बस वाले तथा रिपोर्ट तैयार कर रहा रिपोर्टर बहुत साफ शब्दों में यह बताते हुए दिखेंगे कि ट्रक बस वाले प्रति व्यक्ति 3 से 4 हजार रुपए किराया वसूल रहे हैंवो मजदूर भी बता रहे हैं कि हमने 3-4 हजार किराया दिया हैसाथ ही वो यह भी बताते हैं कि हम भूखों मरने लगे थे इसलिए यहां से जा रहे हैंक्या आपको एक ही व्यक्ति द्वारा एक ही समय पर दिए जा रहे ऐसे दो बयानों में जमीन आसमान सरीखा विरोधाभास नहीं दिखाई देता ? क्या जब जानलेवा संकट सिर पर मंडरा रहा हो उस समय घर में बैठकर केवल भोजन करने का खर्च, प्रति व्यक्ति 4 हज़ार रुपये प्रतिमाह होगा, वह भी मजदूर तबके के व्यक्ति के लिए ? इसका उत्तर है नहींएक मजदूर के लिए 4000 रुपये में दो महीने तक दो समय के भोजन का प्रबन्ध बहुत आसानी से हो जाता है
ध्यान रहे कि यहां मैं उस दौर की बात कर रहा हूं जब जानलेवा संकट काल में आपसे केवल यह अपेक्षा की जा रही है कि भोजन करो आराम करोजैसे तैसे समय काटो ऐसे में 4000 रुपए प्रति व्यक्ति पास में होना कम से कम दो महीने के भोजन के लिए पर्याप्त हैदिल्ली मुम्बई के पंचतारा सुविधाओं वाले एयरकंडीशंड स्टूडियो में बैठे एडिटरों एंकरों को ऐसा लगता होगा कि ट्रक पर लदने के लिए 4 हजार रुपये दे रहा व्यक्ति भूखों मर रहा थालेकिन जो लोग जमीनी हकीकत से परिचित हैं वो समझते हैं कि इन हालातों में एक व्यक्ति, विशेषकर मजदूर के लिए 4 हज़ार रुपए उसके दो माह के भोजन के लिए कितने कितने पर्याप्त हैं और कितने अपर्याप्त ? सम्बंधित राज्य सरकारों के राहत कार्यों को अनदेखा भी कर दीजिए तो भी कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं संगठनों द्वारा इनकी कुछ ना कुछ सहायता भी की जा रही है
हां, इस तथ्य से मैं सहमत हूं कि इस 15 से 25 लाख की भीड़ के हुड़दंग और बवाल, राजनीतिक नर पिशाचों के सुनियोजित षड्यंत्र एवं सनसनी तलाशती मीडिया की मूर्खता का शिकार बनकर उस बवाली भीड़ में 2-4 प्रतिशत परिवार ऐसे भी हैं जो हवा में बह गए और बिना सोचे समझे हुए अपने गांव जाने के लिए सड़क पर पैदल ही निकल पड़ेवही लोग मीडिया के कैमरों की टीआरपी की मंडी का बिकाऊ माल बनकर खबरों के बाजार में हॉट केक की तरह बिक रहे हैंइस खूनी षड्यंत्र में अनजाने में फंसकर कुछ ने अपने जीवन से भी हाथ धो दिया हैउनके साथ सहानुभूति ही जताई जा सकती हैअन्त में एक सवाल के साथ बात खत्म करूंगा कि सड़क पर पैदल चल रहे कुछ मजदूरों को ट्रेजडी किंग नायक की तरह प्रस्तुत करते रहे और आज भी करने में जुटे किसी भी मीडियाई मठाधीश को उन मजदूरों को यह सन्देश देते हुए क्या आपने देखा सुना कि मुम्बई से लखनऊ गोरखपुर पटना और रांची की दूरी डेढ़ से सवा दो हजार किमी के मध्य हैआम आदमी इसे पैदल तय कर ही नहीं सकताबहुत स्वस्थ और नियमित अभ्यास वाला व्यक्ति भी रोजाना 25-30 किमी से अधिक नहीं चल सकता ! इसलिए पटना रांची पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपने गांव पैदल चल कर पहुंचने वालों की जो कहानियां मीडिया आपको सुना रहा है वो सरासर झूठी हैं,सफ़ेद झूठ हैं...!!!

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