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मंगलवार, 5 मार्च 2019

ऐक्शन में मोदी सरकार

बैन जमात-ए-इस्लामी की सम्पत्ति ज़ब्ती कार्रवाई जोरों पर...!!!
कश्मीर के प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी के पास है,4500 करोड़ की संपत्ति...!!!
पाकिस्तान समेत दुनिया के कई देशों से भी लेता है ज़ेहाद,अलगाववाद को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक मदद...!!!
पीएम मोदी के इस कदम का तमाम नेताओ ने विरोध कर शुरू कर दी राष्ट्रहित के मुद्दे पर भी राजनीति...!!!
पहले भी लग चुके हैं,देशविरोधी गतिविधियों के चलते प्रतिबंध इस संगठन पर...!!!
नरेंद्र मोदी सरकार देश मे आतंकवाद की कमर तोड़ने में तेजी से लगी हुई है और केंद्र सरकार ने कड़े फैसले लेते हुए आतंकियों की नर्सरी तैयार करने के लिए पहले से ही कुख्यात रहे जमात-के-इस्लामी पर प्रतिबंध लगाने के साथ ही उसकी 4500 करोड़ की संपत्ति जप्त करने की तैयारी शुरू कर दी है। पीएम मोदी के इस फैसले से जहाँ आतंकियो,उसके सरपरस्तों को तगड़ा झटका लगा है तो इस राष्ट्र की सुरक्षा, एकता को बरकरार रखने हेतु की गयी इस कार्रवाई पर भी राजनीति शुरू हो चुकी है। विदित हो कि जम्मू कश्मीर में इन दिनों अलगाववादी संगठन जमात-ए-इस्लामी के खिलाफ अनलॉफुल एक्टिविटी प्रिवेंशन एक्ट (UAPA) तहत कार्रवाई की जा रही है।केंद्र सरकार की ओर से की जा इस कार्रवाई में जमात-ए-इस्लामी के ठिकानों पर छापेमारी की जा रही है।संदिग्धों को गिरफ्तार किया जा रहा है. लेकिन सबसे अहम कार्रवाई केंद्र सरकार ने इसकी संपत्ति को लेकर की है। अब तक सरकार की ओर से की गई कार्रवाई में करीबन 52 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त कर ली है। ये पैसे संगठन से जुड़े करीब 70 अलग-अलग बैंकों के खातों को सीज कर के किया गया है। जबकि कई ‌ठिकानों पर ताला लगा दिया गया है। जानकारी के अनुसार इसके 100 ‌ठिकानों की एक सूची बनाई गई है। इन सब पर कार्रवाई की जा रही है। इसमें इस संगठन के नेताओं के घरों, दफ्तरों आदि को सील किए जाने की भी खबरें हैं। पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती व जम्मू कश्मीर पीपूल्स कॉफ्रेंस नेता सज्जाद लोन सरकार की कार्रवाई का विरोध कर रहे हैं। उनके अनुसार सरकार निजी हितों के चलते इनपर कार्रवाई कर रही है।
कहां से आते हैं,जमात-ए-इस्लामी के पास पैसे...???
जमात ए इस्लामी के दो चेहरे हैं. पहला वह जम्मू कश्मीर में अलगाववादी प्रकृति को बढ़ावा देता है. दूसरा यह खुद को एक समाजसेवी संगठन बताता है। इसी के तहत इस संगठन ने 400 से ज्यादा स्कूल, करीब 350 मस्जिद और कई हजार मदरसे खोल रहे हैं। इन सबों पर ये लोगों से चंदा उगाही करता है।साथ ही अन्य देशों से भी अनुदान लेता  है। एक पाकिस्तानी रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान सरकार तक से इसने शिक्षा और समाजसेवा के नाम पर अनुदान लिए हैं। इसके अलावा हुर्रियत कांफ्रेस समेत कई विदेशी संगठन इसे चंदा देते हैं।इन पैसों से इसने कई आलीशान भवन भी बना रखे हैं. अगर इसके सभी शिक्षण संस्‍‌थानों समेत बैंक में जमा रकम का आंकलन किया जाए तो यह करीबन 4500 करोड़ मालिकाना हक वाला अलगाववादी संगठन है।
टेरर फंड‌िंग का भी अंदेशा...
जमात-ए-इस्लामी पर कई बार प्रतिबंध लगा चुका है।इस पर अपने मस्जिदों व मदरसों में आतंकियों को पनाह देने और आतंकवादी संगठनों का मददगार होने का आरोप है।बताया जाता है कि यह संगठन पैसों के मामले में इतना मजबूत हो गया है कि यह आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने वाले कई बड़े सगठनों को भी फंड मुहैय्या करने लगा था. हालांकि इस बात को लेकर कोई पुख्ता सबूत सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।लेकिन सरकार की ओर से इस संगठन पर कार्रवाई जारी है।
प्रशासन पैसों का नहीं कर रहा खुलासा...
जमात-ए-इस्लामी के सीज किए खातों से संबंधित जानकारियां अभी उजागर नहीं की गई हैं। इसके उजागर होते ही इस बात का पता चल जाएगा कि इस संगठन को कौन पैसे देता था और इस बात भी खुलासा हो जाएगा कि यह संगठन कहां-कहां पैसे खर्च करता था।प्रशासन की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार संगठन पर कई संवेदनशील मसलों में लिप्त होने की जानकारी मिली है. फिलहाल पड़ताल जारी है।
कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने का हिमायती है जमात-ए-इस्लामी...
आमतौर पर स्वतंत्र कश्मीर की मांग करने वाले अलगाववादी नेताओं व संगठनों के बीच जमात-ए-इस्लामी एक ऐसा संगठन है जो हमेशा कश्मीर के पाक‌िस्तान में मिलाने की तरफदारी करता है।जानकारी के अनुसार कई मोर्चों पर यह संठन ऐसे मुहिम भी चलाता है, जिनमें कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बताया जाता है। हालांकि इसके दूसरे पक्ष ने इसे हमेशा बचाए रखा था।इस पक्ष में वह लगातार शिक्षा की दिशा में काम करता है. इससे वह आमजन में एक दूसरी छवि बनाने में भी सफल रहा है।
जमात-ए-इस्लामी का इतिहास,बड़े-बड़े कैडर पैदा कर चुका संगठन...
यह संगठन साल 1942 में अस्‍तित्व में आया था. इसकी स्‍थापना सैदउद्दीन ने की थी. लेकिन यह संगठन सबसे ज्यादा चर्चा में आया जब इसने 1971 में कश्मीर चुनाव लड़ा. साल 1972 में पहली दफा इसके पांच प्रत्याशियों ने चुनाव जीतकर जम्मू कश्मीर की विधानसभा में जगह बनाई।इसमें कट्टरवादी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी भी था।
कभी हिजबुल के दाहिनी हाथ के तौर पर मिली थी पहचान...
इस संगठन की राजनैतिक पारी उतनी सफल नहीं रही।धार्मिक गतिविधियों में संल्पितता बढ़ने के साथ ही इसने साल 1987 में मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट कश्मीर (मफ) बनाया. इसके बाद 1990 के दशक में जम्मू कश्मीर की अस्थिरता के दौर में इसे हिजबुल मुजाहिद्दीन के साथ खड़ा माना जाता था।इसी दौर में इसने सबसे ज्यादा कैडर अपने संगठन में शामिल किए और यही से यह संगठन आर्थ‌िक तौर पर भी मजबूत होना शुरू हुआ।
1975में पहली दफा और 1990में दूसरी बार हुआ था,बैन...
यह तीसरा मौका है जब जमात-ए-इस्लामी पर बैन लगाया गया है। इससे पहले साल 1975 में जब इस संगठन में राजनीति में आकर कंटरपंथ फैलाना चाहा तब इसे बैन किया गया।साल 1990 में इसकी आक्रामकता से बढ़ रही कश्मीर कट्टरपं‌थ को देखते हुए बैन किया गया। अब 2019 में फिर से इस संगठन को बैन कर दिया गया है।हालांकि इस बार भी यह प्रतिबंधन 5 सालों के लिए ही है। पहले भी इसपर तीन साल, दो साल बैन लग चुके हैं।लेकिन इसने अपनी जड़े इतनी गहरी बिठाई हैं कि फिर से पनप जाता है। बताया जाता है कि कश्मीर के ज्यादातर अलगाववादी नेता मसर्रत आलम, शब्बीर शाह, सैय्यद अली शाह गिलानी, मोहम्मद अशरफ सहराई आदि इससे किसी ना किसी मोड़ पर जुड़े रहे हैं,अब इसे वे बाहर से सुरक्षा देते हैं।

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