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मंगलवार, 14 जुलाई 2020

न्यायिक प्रक्रिया में कुर्सी पर आसीन जज का निर्णय ही सर्वोच्च होता है

दो ट्रेनी जजों को पुलिस ने तेज गाड़ी चलाने के जुर्म में पकड़ लिया, पहला जज, न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठा और दूसरा कटघरे में खड़ा हुआ...

 ऑर्डर...ऑर्डर...ऑर्डर...
दो ट्रेनी जजों को पुलिस ने तेज गाड़ी चलाने के जुर्म में पकड़ लिया। फिर उनका चालान किया। मामला अदालत में पहुँचा तो अजीब स्थिति हुई। क्योंकि उक्त मामले की सुनवाई जिस जज के सामने पहुँची। उस जज महोदय ने उक्त प्रकरण की सुनवाई उन्हीं जजो के पास भेज दिया जो उसमें आरोपी रहे। चूँकि वे दोनों जज थे। इसलिए जब उनका मामला अदालत में पहुंचा तो वरिष्ठ जज ने आदेश दिया कि वे एक दूसरे की सुनवाई वो स्वयं करें।

अदालत में सुनवाई शुरू हुई…

पहला जज, न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठा और दूसरा कटघरे में खडा हुआ। दूसरे जज ने खामोशी से अपना अपराध स्वीकार कर लिया।

न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठे जज ने दूसरे जज पर 100 रुपये का जुर्माना लगाया और दुबारा ऐसी हरकत न करने की चेतावनी दी।

अब दूसरे जज की बारी थी…

दूसरा जज न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठा और पहला जज कटघरे में खडा हुआ। उसने भी चुपचाप अपना अपराध स्वीकार कर लिया।

न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठे जज ने 10 हजार रुपये जुर्माना और एक महीने तक गाड़ी न चलाने की सजा सुनाई। यह सुनते ही कटघरे में खडा जज गुस्से से उबल पड़ा। “ये क्या बात हुई ? मैंने तुम्हें सिर्फ 100 रुपये जुर्माना और बिना कोई सजा दिए छोड़ दिया और तुम मेरे ऊपर 10 हजार रुपये का जुर्माना और गाड़ी चलाने पर पाबंदी भी लगा रहे हो ?”

न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठे जज ने शांतिपूर्वक कहा – “आय एम सॉरी माय फ्रेंड लेकिन इस अदालत में आज ही दिन में तेज़ गाड़ी चलाने का ये दूसरा केस है और ये स्थिति वाकई चिंताजनक है….. इस तरह की घटनाएं और न हों इसके लिए आखिर किसी न किसी को तो सख्ती करनी पड़ेगी न

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