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सोमवार, 29 जून 2020

आयुर्वेद की साख धाक प्रतिष्ठा को पतंजलि का ऋणी न बनाए तो बेहतर होगा

जरा सोचिए कि भारत की सरकार, विशेषकर प्रधानमंत्री की कैसी और कितनी थू-थू केवल देश नहीं बल्कि पूरी दुनिया में हो रही होती...???


बड़ा सवाल यही है कि मेडिकल संस्थान का चेयरमैन बीएस तोमर जो बाबा रामदेव और बालकृष्ण के साथ प्रेस कांफ्रेंस में बैठकर फोटो खिंचवाया वो अचानक मुकर क्यों गया...???
बाबा रामदेव की दवा कोरोनिल का क्लीनिकल परीक्षण जिस मेडिकल संस्थान में किया गया था, उस मेडिकल संस्थान के चेयरमैन बीएस तोमर ने ही साफ मना कर दिया है कि मेरे मेडिकल संस्थान में ऐसा कोई परीक्षण कभी नहीं हुआ हद तो यह है कि बाबा रामदेव जब दवा लॉन्चिंग की प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी दवा कोरोनील का क्लीनिकल परीक्षण उपरोक्त मेडिकल संस्थान में करने का दावा कर रहे थे उस समय इसी मेडिकल संस्थान का यही चेयरमैन बीएस तोमर भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में बाबा के साथ उपस्थित था। फिर अचानक बाजी पलट कैसे गयी ? बड़ा सवाल यही है कि मेडिकल संस्थान का चेयरमैन बीएस तोमर जो बाबा रामदेव और बालकृष्ण के साथ प्रेस कांफ्रेंस में बैठकर फोटो खिंचवाया वो अचानक मुकर क्यों गया...???


निम्स संस्थान के चेयरमैन बीएस तोमर और योग गुरु बाबा रामदेव...

दरअसल इसमें चौंकाने वाली कोई बात नहीं है ऐसे हथकंडों ऐसी करतूतों का यही हश्र होता है। जरा सोचिए कि अपनी दवा के क्लीनिकल परीक्षण के लिए बाबा रामदेव को पूरे देश में एक भी सरकारी संस्थान नहीं मिला यह परीक्षण करने के लिए उन्होंने एक निजी संस्थान खोजा जयपुर में संस्थान भी ऐसा जिसका चेयरमैन बीएस तोमर केवल 7-8 महीने पहले अपने संस्थान की असिस्टेंट प्रोफेसर के साथ बलात्कार के आरोप में नामजद होने के बाद फरार हो गया था और राजस्थान पुलिस ने उसके विदेश भाग जाने की आशंका पर लुकआउट नोटिस जारी कर उसके पासपोर्ट को जब्त करने के निर्देश जारी किए थे। ऐसे व्यक्ति की साख और विश्वसनीयता का स्तर क्या और कैसा होगा ? यह बताने की आवश्यकता नहीं है..."
आयुष मंत्रालय भारत सरकार...
बाबा रामदेव ने अपनी दवा के क्लीनिकल परीक्षण के लिए किसी मेडिकल कालेज लैब उपलब्ध कराने का अनुरोध सीधे सरकार से करने के बजाय एक कलंकित विवादित अत्यन्त घृणित अपराध में नामजद व्यक्ति को अपनी दवा के क्लीनिकल परीक्षण में साझीदार क्यों बनाया था ? यह एक सवाल ही बहुत कुछ, या यूं कहूं कि सबकुछ कह देता है। लेकिन जरा सोचिए कि यदि आयुष मंत्रालय अपनी आपत्ति दर्ज करा के दवा का परीक्षण स्वयं करने की अपनी मांग पर कठोरता के साथ नहीं अड़ गया होता तो आज उपरोक्त गड़बड़ घोटाला उजागर होने के बाद पूरी दुनिया में भारत की कितनी और कैसी थू थू हो रही होती ? साथ ही दवा के भ्रमजाल में फंसे रोगियों का क्या हश्र हो रहा होता ? गम्भीर प्रश्न यह है कि जानलेवा महामारी के लिए बनाई जा रही अपनी तथाकथित दवा के तथाकथित क्लीनिकल टेस्ट के लिए बाबा रामदेव ने ऐसे व्यक्ति के निजी संस्थान को ही क्यों चुना था...??? 

उल्लेख कर दूं कि देश में आयुष मंत्रालय के अनेक आयुर्वेदिक अस्पताल और मेडिकल कालेज हैं कोरोना के उपचार के लिए दवा की खोज में देश की आधा दर्जन से अधिक जो कम्पनियां महीनों पहले से जुटी हुई हैं, उन सभी को प्रधानमंत्री मोदी ने उनकी मुंहमांगी प्रत्येक सुविधा एवं साधन को युद्ध स्तरीय तत्परता से उपलब्ध कराया है और व्यक्तिगत रूप से उनके सीधे सम्पर्क में हैं। ताकि उनके कार्य में किसी प्रकार की कोई बाधा, कोई कमी नहीं हो पाए। बाबा के समर्थक जो हुड़दंग काटे थे, भांति-भांति के कुतर्कों के साथ नंगनाच कर रहे थे कि आयुष मन्त्रालय ने अनुमति क्यों नहीं दी, परीक्षण की बात क्यों की ? अगर उपरोक्त दबाव में सरकार ने बिना परीक्षण स्वीकृति दे दी होती तो आज देश दुनिया में भारत और आयुर्वेद की थू-थू तो हो ही रही होती। मगर अब तो बात उससे बहुत आगे निकल गई है बाबा बताए कि बीएस तोमर मुकर क्यों गया ? बाबा रामदेव ने दवा के टेस्ट के लिए इतने कुकर्मी कलंकित नामजद अपराधी के संस्थान को ही क्यों चुना था...???

उपरोक्त पूरे प्रकरण में बाबा रामदेव समर्थकों ने फिर हुड़दंग शुरू किया है कि राजस्थान की कांग्रेसी सरकार ने दबाव डाल कर मेडिकल संस्थान के मुखिया को मुकरने के लिए मजबूर कर दिया है। ऐसे हुड़दंगी समर्थकों से बस इतना ही कहूँगा कि एक बात भलीभांति समझ लीजिए कि यह जानलेवा महामारी के लिए बनने वाली किसी दवा के क्लीनिकल टेस्ट का मामला है, किसी पशु मेले में होने वाले लौंडा डांस का मामला नहीं है, जिसे किसी के दबाव में नकार या स्वीकार लिया जाए। ध्यान रखिए कि किसी भी जानलेवा महामारी के लिए बनने वाली किसी दवा के क्लीनिकल टेस्ट के फॉरेंसिक बायोलॉजिकल पैथोलॉजिकल साक्ष्य इतने अकाट्य होते हैं कि उनको नकारा नहीं जा सकता। अन्त में बस इतना ही कहूंगा कि यह पूरी दवा लीला क्या प्रायोजित सुनियोजित थी ? जिसे कोई और भले न समझ पाया हो ! लेकिन इस देश का सजग सतर्क चौकीदार और उसकी टीम ने इसे भलीभांति देखने समझने में कोई चूक नहीं की

कोरोना के इलाज के लिए पतंजलि की ओर से कोरोनिल दवा बनाए जाने के दावे के मामले में बाबा रामदेव के सहयोगी ने पलटी मार दी है। जयपुर की जिस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी (निम्स) में कोरोना पीड़ितों पर दवा का ट्रायल करने का बाबा रामदेव ने बुधवार को दावा किया था, उस यूनिवर्सिटी के चेयरमैन डॉ. बीएस तोमर ने कहा कि उनके अस्पताल में किसी दवा का ट्रायल नहीं हुआ है। यह वही शख्स है जिसे बाबा रामदेव ने कोरोनिल दवा बनाने के बाद प्रेस वार्ता में अपने बगल बैठाया था मेडिकल संस्थान के इसी चेयरमैन बीएस तोमर के खिलाफ़ बलात्कार के आरोप में नामजद होने के बाद फरार होने और राजस्थान पुलिस द्वारा उसके विदेश भाग जाने की आशंका पर लुकआउट नोटिस जारी कर उसके पासपोर्ट को जब्त करने के निर्देश भी जारी हुए थे, जिसे मीडिया ने प्रमुखता से दिखाया था और अपने समाचार पत्रों में प्रमुखता से खबर प्रकाशित की थी

जब बाबा रामदेव साइकिल पर चलते थे और पतंजलि नाम की चिड़िया का भी अता पता नहीं था, उस समय डाबर, ऊंझा, वैद्यनाथ, झंडू और हिमालय सरीखी कम्पनियां आयुर्वेदिक दवाओं का हजारों करोड़ का व्यापार कर रहीं थीं यदि आयुर्वेदिक पद्धति पर लोग विश्वास नहीं कर रहे थे, उसे लोग अपना नहीं रहे थे तो उन दवाओं को खरीद कौन रहा था ? आज से दशकों पहले लिव-52 का डंका अमेरीका में बहुत जोरशोर से बज चुका थाआज भारत में आयुर्वेदिक दवाओं का कारोबार 25 से 30 हजार करोड़ रुपये का है इसमें बाबा रामदेव की आयुर्वेद की दवाओं का हिस्सा लगभग 7 हजार करोड़ रुपये का है। इसलिए ऐसा कहना ठीक नहीं कि आयुर्वेद बाबा रामदेव का मोहताज है ऐसा कह कर हम आयुर्वेद और असंख्य उन लोगों का घोर अपमान करते हैं जो प्राणपण से आयुर्वेद की सेवा कर रहे हैं
प्रस्तुति :- सतीश मिश्र 

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