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रविवार, 5 जुलाई 2020

मुखबिरी तंत्र को नजरअंदाज करना पुलिस को पड़ा भारी, विकास दुबे ने प्यादे से दी पुलिस वालों को मात

विकास दुबे को जमीन खा गई अथवा आसमान निगल लिया...???
" दिल दहला देने वाली घटना को बीते 3दिन हो गए और पुलिस के हाथ आज भी खाली हैं। अपनी अलग पहचान बनाने वाली STF को भी कुछ नहीं सूझ रहा है। आम जनता और जिनके घरों से जवानों ने अपनी जान कुर्बान की उन्हें लगा था कि उ प्र की पुलिस 24 घंटे में विकास का काम तमाम कर देगी, परन्तु अज तीसरे दिन भी पुलिस लकीर की फकीर बनी हुई है..."
उत्तर प्रदेश पुलिस की चकौती गुल...
कानपुर। 2 जुलाई की आधी रात हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे के बिकरु गांव में एक खतरनाक बिसात बिछी पुलिस और विकास दुबे के बीच। दोनों अपनी-अपनी चाल चल रहे थे और इस खूनी खेल में यू पी की तेज तर्रार पुलिस को बहुत बड़ी मात मिली। विकास दुबे ने उसी मोहरे से मात दी, जिस पर कभी पुलिस को सबसे ज्यादा भरोसा हुआ करता था। मुखबिरी को पिछले दो दशकों में पुलिस ने धीरे-धीरे तिलांजलि दे दी और अपराधियों ने इसे अपना लिया। इस घटना के बाद ये चर्चा आम है कि विकास दुबे को इस बात की समय रहते सटीक जानकारी मिल गयी थी कि पुलिस कब और कितने जोर से उसके ऊपर धावा बोलने आ रही है। उसने मोर्चा लेने की सारी तैयारी कर ली। उसे तो पुलिस की हर चाल की जानकारी मिलती रही, लेकिन पुलिस उसकी किलेबन्दी से अनजान रही।
 आधुनिक उ प्र पुलिस के पास ऐसे भी मुखबिर शेष नहीं रहे जो अपराधियों के बारे में कुछ सुराग दें...
पिछले कई सालों में पुलिस की असफलता के पीछे एक बड़ी वजह मुखबिरी के तंत्र का बदल जाना है। साल 2000 के बाद से पुलिस सूचना के लिए तकनीक पर निर्भर होती गई। विभाग में अलग-अलग सेल काम करने लगे हैं, जो टेक्नोलॉजी के सहारे अपराधियों की सूचना हासिल करने लगे। इसका खूब फायदा भी मिला। लेकिन वर्क कल्चर में कमजोरी भी आती गयी। पहले यह काम मैनुअल होता था। यानी मुखबिरों के सहारे हर थानाध्यक्ष मुखबिरों की टोली रखता था, जो गांव-गांव में फैली रहती थी। पुलिस इन्हें हर तरह से मदद करती थी, लेकिन सर्विलांस सिस्टम जैसे-जैसे फैलता गया, इंसानों के सहारे मुखबिरी का तंत्र कमजोर पड़ता गया। साइबर सेल से सूचना हासिल करने से मदद तो मिलती है। लेकिन कई बार बड़े धोखे भी होते हैं। पुलिस को ट्रेडिशनल तरीकों को पूरा नहीं छोड़ना चाहिए।

पुलिस आज सिर्फ और सिर्फ करती हैं,मोबाइल नेटवर्किंग...
किसी अपराधी की खबर कोई शरीफ इंसान तो देगा नहीं ! हर अपराधी को पता है कि उसका मोबाइल सर्विलांस पर है। आखिर विकास दुबे ने JCB लगाकर सड़क क्यों रोकी ? बताने वाले ने उसे बता दिया कि आज पूरी पल्टन आने वाली है। लेकिन पुलिस न तो ये पता कर पाई कि विकास दुबे को सब मालूम हो गया है और न ये कि उसकी क्या तैयारी है ? ऐसा इसलिए हुआ ! क्योंकि उसका मुखबिर ज्यादा मुस्तैद निकला और ये भी कि सूचना पहुंचाने के लिए उसने फोन का नहीं बल्कि खुद पहुंचकर ऐसा किया होगा। टेलीफोनिक बातचीत तो पुलिस सुन ही लेती है। जो विकास दुबे को मुखबिरी किया वो काफी होशियार था। जो होशियार मुखबिर होता है वो अपने मोबाइल नम्बर से किसी को फोन से सूचना का आदान प्रदान नहीं करता। उसे पता है कि देर सबेर उसकी ये गलती उसके गले में फाँस बनकर उसकी सारी किये कराये पर पानी फेर देगी। इसलिए ऐसे सिम से अपना संचार संचालित रखता है जो उसके नाम से रहता ही नहीं ! अगर सर्विलांस सिस्टम फेल हो जाये तो आज की तारीख में एक चोर को पकड़ना पुलिस के लिए मुश्किल ही नहीं नामुकिन होगा। 

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