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शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

कानपुर के विकास दुबे की कहानी खत्म हो गई अब दिल्ली के उत्तम चन्द्र मिश्र की कहानी जरुर पढ़े


उत्तम चंद मिश्र की बेबशी...
राजधानी दिल्ली के मौजपुर में उत्तम चंद मिश्र सपरिवार रहते रहे। साथ में उनकी बेटी और उनकी इलेक्ट्रिकल्स की दुकान। 24 फरवरी को दंगाइयों ने उनकी दुकान जला दी। घर में बीमार बेटी थी, जिसका इलाज चल रहा था। कुछ दिन बाद उत्तम चंद मिश्र को पुलिस गिरफ्तार करके ले गई। सदमे से बीमार बेटी की जान चली गई। उसका अंतिम संस्कार भी उत्तम चंद मिश्र नहीं कर सके। क्योंकि कोर्ट ने ज़मानत नहीं दी। सिर्फ छह घंटे की पैरोल दी वो भी बहुत बाद में। उत्तम चंद मिश्र पैरोल लेने से मना कर दिया कि इतनी देर में तो घर जाकर लौट भी नहीं सकते।


उत्तम चंद मिश्रा की दंगाइयों द्वारा जलाई गई दुकान...
"उत्तम चंद मिश्र की ये कहानी इकलौती नहीं हैं। उनके जैसे 16 निर्दोष लोग तीन महीने से जेल में सड़ रहे हैं। ये सारे लोअर मिडिल क्लास के लोग हैं। इनमें से कई की दुकानें और मकान जले हैं। कुछ तो घटना के दिन दिल्ली में ही नहीं थे। अरब से फंडिंग पाने वाले असली दंगाइयों पर सरकार को UAPA लगाना पड़ता है, वरना कोर्ट उन्हें तत्काल जमानत देने को तैयार बैठी हैं। लेकिन इन 16 लोगों की कोर्ट को भी चिंता नहीं क्योंकि ये हिंदू हैं..."
इन लोगों की दूसरी गलती है कि वो एक ऐसे इलाके में रह रहे हैं जो लगभग पाकिस्तान बन चुका है। थोड़े-बहुत हिंदुओं के घर बाकी बचे हैं। जिस परवेज आलम की हत्या के आरोप में इन लोगों को गिरफ्तार किया गया है।उस परवेज आलम का पोस्टमार्टम कर रहे डॉक्टरों ने उसकी जैकेट की पॉकेट से 12 जिंदा कारतूस निकाले थे। मतलब ये कि वो खुद ही दंगाई था। उसकी पिस्तौल शायद उसके साथियों ने गायब कर दी होगी। लेकिन कारतूस जेब में भूल गए। पूरे एक महीने बाद परवेज आलम के बेटे ने केस में इलाके के लगभग सारे हिंदुओं के नाम लिखवा दिए। जिनकी दुकानें और मकान जले वो जेल में बंद हैं और जो दंगाई है वो पीड़ित बना घूम रहा है।

भले ही दंगा हिंदुओं के खिलाफ था, लेकिन पुलिस पर दबाव है कि वो बराबर संख्या में हिंदुओं को भी अरेस्ट करे। ताकि सेकुलरिज्म पर दाग़ न लगने पाए। भले ही उसके लिए कुछ निर्दोष गरीबों की ज़िंदगी तबाह करनी पड़े। देश में ये कैसी न्याय ब्यवस्था है ? कैसा नियम कानून है ? देश की सत्ता पान के लिए राजनीतिक दल कितना गिरेगे ? अपना जमीर बेंच देंगे या कफन बेंच देंगे ? क्या सत्ता सुख के लिए इंसानियत और मानवीय सवेदनाओं को दर किनार कर वोट बैंक की खातिर किसी निर्दोष को फंसाना उचित है ? शायद नहीं ! परन्तु आजकल राजनीति की मंडी में सबकुछ जायज है उधर मीडिया, सरकारें और अदालतें दंगों की सरगना शफूरा बानो की औलाद के लिए सोहर गा रही हैं। कुछ जातिवादी लंपट एक समाजवादी गुंडे के लिए न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं।

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