Breaking News

Post Top Ad

Your Ad Spot

बुधवार, 9 मार्च 2022

एक्जिट पोल एक तरह से माँ के गर्भ में पलने वाले भ्रूण के लिंग परीक्षण कराने जैसा है, मतगणना से पहले एक्जिट पोल दिखाने पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए

लोक प्रतिनिधत्व अधिनियम-1950 और केन्द्रीय निर्वाचन आयोग को प्रदत्त अधिकार यदि इमानदारी के साथ लागू किया जाए तो समाज और राजनीति में हो सकता है, अमूलचूर्ण परिवर्तन...

एक्जिट पोल एक तरह से माँ के गर्भ में पलने वाले भ्रूण के लिंग परीक्षण कराने जैसा है...

मतगणना से पहले एक्जिट पोल रूपी आँधी के आ जाने से उन राजनैतिक दल में अस्थिरता आ जाती है जो पूरे चुनाव में दिन रात मेहनत करके एक-एक सीट के लिए संघर्ष किये रहते हैं पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं के समर्थकों में मायूसी छा जाती है। इसलिए समय की मांग है कि मतगणना से पहले टीवी चैनलों पर दिखाए जाने वाले एक्जिट पोल पर केन्द्रीय चुनाव आयोग पूरी तरह से प्रतिबन्ध लगाना चाहिये एक्जिट पोल एक तरह से माँ के गर्भ में पलने वाले भ्रूण के लिंग परीक्षण कराने जैसा है यदि माँ के गर्भ में पल रहे भ्रूण के लिंग की जाँच कराना कानूनन जुर्म है तो मतदान जो भ्रूण की तरह ईवीएम में बंद है, उसका मतगणना से पहले यह तय करना कि किस पार्टी को कितनी सीटें मिल रही हैं ? यह भी तो भ्रूण के लिंग परीक्षण के समान है   


केन्द्रीय चुनाव आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त का किरदार निभा चुके टी एन शेषन ने चुनाव आयोग के वजूद को देश के मानचित्र पर उभारा और राजनीतिक दलों सहित सरकार और उसकी नौकरशाही के एहसास दिलाया कि संवैधानिक पद पर बैठे हुए ब्यक्ति को अपने कर्तब्य और अधिकार को याद रखना चाहिए और दोनों में सामंजस्य बैठाकर अमल में लाना चाहिए लोक प्रतिनिधत्व अधिनियम-1950 और केन्द्रीय निर्वाचन आयोग को प्रदत्त अधिकार यदि इमानदारी के साथ लागू किया जाए तो समाज और राजनीति में अमूलचूर्ण परिवर्तन हो सकता है  परन्तु केन्द्रीय चुनाव आयोग जो एक स्वायत्तशासी संवैधानिक संस्था है, फिर भी मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति से लेकर चुनाव कराने के निर्णय तक में शासन सत्ता पर काबिज दल का दबाव जब देखने को मिलता है तो मन विचलित हो जाता है। 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Top Ad

Your Ad Spot

अधिक जानें