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बुधवार, 9 फ़रवरी 2022

लहर में भी ठहर गई बसपा की चाल, साल 2007 के बाद नहीं सुधरे हालात

पट्टी विधानसभा में बसपा की हाथी नहीं भर सकी रफ्तार,चुनाव परिणाम तक बसपा की हाथी और उसका पिलेवान हो जाता है,बेदम...

249-पट्टी विधानसभा में बसपा का लगातार बिगड़ता गया ग्राफ... 

पट्टी बहुजन समाज पार्टी अपने शुरुआती समय से ही जहां प्रदेश में अपना दमखम दिखा दे रही है, वहीं प्रतापगढ़ के पट्टी विधानसभा में उसकी दाल नहीं गल पाई है। यही कारण है कि पट्टी विधानसभा में एक बार भी बसपा जीत का परचम लहराने में सफल नहीं हो पाई है। साल 1987 के उपचुनाव में उसका सबसे अधिक बोलबाला था, लेकिन हाथी विपक्षियों की जाल में ऐसी फंसी की उबर नहीं सकी। वहीं साल 2007 में उसने ठीक-ठाक टक्कर तो दी, लेकिन पट्टी में विपक्षी के सामने बेदम हो गई तब से उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है। पट्टी विधानसभा में मोती सिंह के चचेरे भाई अजीत प्रताप सिंह उर्फ मदन सिंह भी चुनाव मैदान में उतरे, परन्तु वह भी मोती सिंह को चुनाव में पटखनी न दे सके साल 2012 में जब बसपा से मनोज तिवारी का टिकट फाइनल हुआ तो मदन सिंह चाणक्य की भूमिका में मनोज तिवारी के रणनीतिकार बने थे, परन्तु अंत में राजकुमारी रत्ना सिंह की मेहरबानी से मदन सिंह पट्टी विधानसभा से कांग्रेस के उम्मीदवार हो गए और बसपा ने मनोज तिवारी के स्थान पर उनकी पत्नी अर्चना तिवारी को अपना उम्मीदवार बनाया नतीजा यह हुआ कि मदन सिंह के चुनाव लड़ने से मोती सिंह कमजोर हुए और दो की लड़ाई में सपा के उम्मीदवार राम सिंह पटेल बाजी मार ले गए  


पट्टी विधानसभा का चुनाव हमेशा रोमांच पर रहा है कहा जाता है कि यहां पर चुनाव के नतीजे बहुत ही करीबी रहते हैं और जीत और हार का अंतर बहुत मामूली होता है। साल 1987 में जब पट्टी में विधानसभा उपचुनाव हुआ था तो उस समय बसपा का बोलबाला था, लेकिन कांग्रेस से उसे मुंह की खानी पड़ी उसके बाद फिर से हालत में कोई सुधार नहीं हुआ चौदहवीं विधानसभा- 2002 में पट्टी विधानसभा से मृत्युंजय शुक्ला चुनाव में आए, लेकिन लगभग 20 हजार से अधिक मतों से चुनाव हार गए चुनाव- 2007 में बसपा सुप्रीमो मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग के जरिए जातीय समीकरण साधा तो पूरे प्रदेश में लहर चली, लेकिन पट्टी विधानसभा में तीसरे स्थान पर रही साल 2012 में बहुजन समाज पार्टी से चुनाव लड़ने वाली अर्चना तीसरे स्थान पर खिसक गई वहीं साल 2017 के विधानसभा चुनाव में चुनाव लड़ रहे कुंवर शक्ति सिंह तीसरे नम्बर के प्रत्याशी रहे, जबकि समाजवादी पार्टी के रामसिंह पटेल जो उस समय पट्टी के विधायक थे, वह दूसरे स्थान पर रहे 


मतलब यह कि विधानसभा पट्टी में बसपा का जनाधार बढ़ने नहीं पाया, वहीं इस बार चुनाव लड़ रहे फूलचंद्र मिश्रा भले ही उत्साह से लबरेज दिखाई दे रहे हैं, लेकिन सियासी जमीन पर कुछ भी नहीं है समाजवादी पार्टी के राम सिंह पटेल जहां बसपा के परंपरागत वोट अपने पाले में मिलाने के लिए लगे हुए हैं, वही कैबिनेट मंत्री राजेंद्र प्रताप सिंह "मोती" बसपा के मूल वोटों में सेंधमारी में जुटे हैं ऐसे में फिर से बसपा अपने पुराने हालत में आती हुई दिखाई दे रही है। लोगों का कहना है कि जब साल 1987 तथा साल 2007 के लहर में बसपा चुनाव नहीं निकाल पाई तो भला इस बार वह कँहा चुनाव निकाल पाएगी ? बसपा उम्मीदवार फूलचंद्र मिश्रा क्षेत्र में अपने पक्ष में जनता से मिलकर चुनाव में वोट देकर जिताने की अपील तो कर रहे हैं, परन्तु पट्टी की जनता उन्हें सीरियस कंडीडेट और जिताऊ नहीं मान रही है पट्टी विधानसभा में सीधी लड़ाई भाजपा के दिग्गज नेता मोती सिंह और सपा उम्मीदवार रामसिंह पटेल में होती दिख रही है इस बार भी पट्टी विधानसभा में बसपा चुनावी लड़ाई से बाहर दिख रही है 

   

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