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गुरुवार, 23 दिसंबर 2021

विधानसभा चुनाव-2022 में कांग्रेस की अभेद दुर्ग कही जाने वाली विधानसभा सीट रामपुरखास पर क्या भाजपा सेंधमारी कर पायेगी...???

कांग्रेस का कथित दिग्गज नेता प्रमोद कुमार और रत्ना सिंह जो कभी एक सिक्के को दो पहलू की तरह माने जाते थे। क्या अपने राजनीतिक उत्तराधिकारियों के भविष्य के सामने अपने सम्बंधों को ताक पर रखकर एक दूसरे को मंच से जहर उगलने का कार्य करेंगे...???


सूबे में किसी विधानसभा में विधानसभा चुनाव की तैयारी हो रही हो या नहीं ! परन्तु प्रतापगढ़ की रामपुरखास विधानसभा में अभी से ही शुरू हो चुकी है, तैयारियां। भाजपा को शिकस्त देने के लिए कांग्रेस की विधायक आराधना मिश्रा "मोना" और प्रमोद कुमार भी रणनीति बनाकर शुरू कर दिए हैं,चुनाव की तैयारी...!!!

पूर्व सांसद राजकुमारी रत्ना सिंह और पूर्व सांसद प्रमोद कुमार... 

अपनी सीट सुरक्षित रखने के लिए प्रमोद कुमार पूरे प्रदेश में कांग्रेस का सूपड़ा साफ करवाने और पार्टी को हासिये पर लाने में महती भूमिका के निर्वहन का आरोप झेलते हुए इस बार क्या अपनी बेटी की सीट बचा पाने में सक्षम होंगे या भाजपा इस बार प्रमोद कुमार के तीर से ही उन्हें धराशायी करने में सफल होगी ? फिलहाल प्रतापगढ़ की राजनीति में वॉलीवुड की तरह अपनी वंशबेल को आगे बढ़ाने के लिए अपने संतानों को आगेकर अपनी राजनीतिक विरासत की बागड़ोर सौंपने का सपना कई राजनीतिक दिग्गज देख रहे हैं। परन्तु उनमें कोई सफल हुआ तो सिर्फ और सिर्फ रामपुरखास विधानसभा को गिनीज बुक में नाम दर्ज कराने वाले प्रमोद कुमार जो समय रहते रामपुरखास विधानसभा सीट से अपना उत्तराधिकारी अपनी बड़ी बेटी आराधना मिश्रा "मोना" को सौंपकर स्वयं प्रदेश के राजनीतिक अखाड़े से सन्यास लेने की ओर अग्रसर हो चुके हैं। 

रामपुरखास विधानसभा को गिनीज बुक तक में इंट्री करवाने वाले प्रमोद कुमार के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में रामपुरखास विधानसभा की कमान संभालने वाली उनकी लड़की आराधना मिश्रा "मोना" के लिए विधानसभा आम चुनाव-2022 की घेराबंदी अभी से शुरू हो गई है। इस घेराबंदी में प्रमुख भूमिका का निर्वहन करने वाली उनकी कभी खास रहने वाली प्रतापगढ़ की सांसद रत्ना सिंह हैं, जिन्हें प्रमोद कुमार ने एक बार नहीं बल्कि तीन बार अपनी रामपुरखास विधानसभा से इतनी लीड दिलाई को वो सांसद बन गई। जबकि रत्ना सिंह प्रतापगढ़ से 3 बार चुनाव हारने का भी खिताब जीत चुकी हैं। रत्ना सिंह एक बार चुनाव जीतती थी तो दूसरी बार हार जाती थी। जिसकी मुख्य वजह चुनाव जीतने के बाद क्षेत्र में उनकी मौजूदगी का न होना प्रमुख होता था। साथ ही रामपुरखास विधानसभा को छोड़ दें तो चार अन्य विधानसभा भी विकास कार्यों से वंचित रह जाती थी

प्रमोद कुमार रूपी वैशाखी के सहारे रत्ना सिंह प्रतापगढ़ की तीन बार सांसद बनी। परन्तु कांग्रेस में रहते प्रमोद कुमार जैसे ही राज्यसभा में सपा के खाते से सदस्य बने और रामपुरखास विधानसभा सीट खाली हुई तो उस सीट पर प्रमोद कुमार अपने राजनैतिक उत्तराधिकारी के रूप में अपनी विरासत को आगे ले जाने के लिए पर्दे के पीछे से कार्य देखने वाली आराधना मिश्रा "मोना" को कांग्रेस का उम्मीदवार बनाकर रामपुरखास की बागडोर पूरी तरह उन्हें सौंप दी। इस उप चुनाव में लोकसभा का आम चुनाव-2014 भी सम्पन्न हुआ। जिसमें रत्ना सिंह बुरी तरह परास्त हुई। हालांकि रामपुरखास विधानसभा से रत्ना सिंह सबसे अधिक मत पायी थी। फिर भी अंदर ही अंदर आराधना मिश्रा "मोना" और उनकी टीम से कांग्रेस की लोकसभा उम्मीदवार रत्ना सिंह और उनके राजनैतिक उत्तराधिकारी उनके पुत्र भुवन्यु से मनमुटाव की नींव पड़ गई। 

लोकसभा आम चुनाव के साथ प्रतापगढ़ जनपद में उप चुनाव-2014 में विश्वनाथगंज विधानसभा चुनाव लड़ने हेतु जब कांग्रेस के पास कोई उम्मीदवार नहीं मिल रहा था तो कांग्रेस की लोकसभा उम्मीदवार रत्ना सिंह अपने चुनाव को प्रभावी बनाने के लिए भाजपा से टिकट न पाने से नाराज सुशील कुमार सिंह को कांग्रेस में शामिल कराकर उम्मीदवार बनवाया था। चुनाव के खर्च वहन का भी भरोसा दिलाया था। रत्ना सिंह को लग रहा था कि विश्वानगंज विधानसभा में उसके उम्मीदवार को जितना मत मिलेगा वह मत लोकसभा उम्मीदवार के रूप में उसे भी मिल जायेंगे। परन्तु ऐसा न हो सका। कांग्रेस में विश्वनाथगंज विधानसभा से कांग्रेस उम्मीदवार सुशील कुमार सिंह को जितने वोट मिले उतने वोट लोकसभा उम्मीदवार रत्ना सिंह को नहीं मिले। सुशील कुमार सिंह चुनाव परिणाम बाद भाजपा में वापस चले गए। 

वर्ष-2017 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा के आम चुनाव में लोकसभा चुनाव में अपनी जमानत तक न बचा पाने वाली 3 बार की सांसद रत्ना सिंह से कांग्रेस हाईकमान विश्वनाथगंज विधानसभा की उम्मीदवारी की बात की तो वो ये कहते हुए उम्मीदवारी से मना कर दिया कि उनके परिवार में उनके पिता स्व दिनेश सिंह से लेकर वो स्वयं कभी लोकसभा के नीचे उम्मीदवारी नहीं स्वीकार की। यानि केंद्र की राजनीति के अलावा राज्य में विधानसभा के चुनाव में कभी भागीदारी का निर्वहन नहीं किया। कांग्रेस हाईकमान ने रत्ना सिंह के बेटे भुवन्यु सिंह पर भी उम्मीदवाररी की आजमाइश करने के लिए तैयार था। क्योंकि विधानसभा चुनाव- 2017 में सपा और कांग्रेस का गठबंधन था। विश्वनाथगंज विधानसभा सीट कांग्रेस के खाते में गई थी। 

प्रतापगढ़ से 3 बार सांसद रही रत्ना सिंह बड़ी बेरूखी दिखाते हुए विदेश यात्रा पर चली गई। इसी बीच कांग्रेस में टिकट दिलाने के नाम पर सौदेबाजी शुरू हुई। सूत्रों की माने तो 2 करोड़ रुपये टिकट का दाम लग गया। डेढ़ करोड़ तक देने के लिए तीन उम्मीदवार नोटो का बंडल लेकर टिकट के सौदागरों के चक्कर काटने लगे। एक उम्मीदवार भाजपा को लात मारकर रातोंरात कांग्रेसी बन गया। बकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाजपा को पानी पी पीकर गाली दिया। भाजपा को सबसे बड़ी भ्रष्ट पार्टी तक कह डाला। परन्तु कांग्रेस ने जब विश्वनाथगंज विधानसभा का टिकट नहीं दिया। तब वह उम्मीदवार एक चरित्रहीन ब्यक्ति की तरह 248-सदर विधानसभा से निर्दलीय नामांकन कर भाजपा को ब्लैकमेल करना शुरू किया। अंतिम दिन नामांकन वापस लेकर खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाली कहावत को चरितार्थ किया। 

सपा से विश्वानगंज विधानसभा चुनाव-2017 के प्रबल उम्मीदवार संजय पांडेय रहे। उप चुनाव-2014 में संजय पांडेय ने अपनी पिता स्व राजाराम पांडेय की मृत्यु से खाली हुई सीट विश्वनाथगंज विधानसभा से अच्छा प्रदर्शन किया था। सो सपा की पहली पसन्द संजय पांडेय रहे। परन्तु सीट समझौते में चली गई सो उम्मीदवारी का चयन कांग्रेस के अधिकार क्षेत्र में चला गया। जब सपा सुप्रीमों अखिलेश यादव को इस बात की जानकारी हुई कि कांग्रेस में उम्मीदवार का टोंटा है। वहाँ टिकटार्थियों की तलाश है। टिकट दिलाने के लिए दलाल सक्रिय है तो अखिलेश यादव, अहमद हसन और प्रियंका वाड्रा सहित कांग्रेस युवराज राहुल गाँधी से बात करके सपा सुप्रीमों अखिलेश यादव ने संजय पांडेय को कांग्रेस का उम्मीदवार बनवा दिया। फिलहाल संजय पांडेय चुनाव में शिकस्त खाने के बाद सपा में वापस आ गए। 

देश में मोदी लहर के बीच सभी राजनीतिक दलों की जड़ें अंदर तक हिल जाने के बाद लोकसभा चुनाव- 2019 में भाजपा के आगे सभी राजनीतिक दलों की स्थिति सुधर न सकी और अपना राजनीतिक वजूद बचाने के लिए विपक्षी राजनीतिक दलों में भगदड़ मच गई। लोकसभा चुनाव में प्रतापगढ़ से कांग्रेस ने उम्मीदवारों की अपनी प्रथम सूची में प्रतापगढ़ से रत्ना सिंह के नाम की घोषणा की थी। जबकि रत्ना सिंह राजधानी दिल्ली में जमी थी। मीडिया में खबरें और अटकलों का दौर शुरू हुआ तो रत्ना सिंह भागकर प्रतापगढ़ पहुँची और एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके पुनः दिल्ली चली गई। रत्ना सिंह के लिए राजनीतिक पंडित और चुनावी विश्लेषक मान रहे थे कि वो भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के सम्पर्क में हैं और भाजपा की उम्मीदवार बनना चाह रही थी। 

इधर भाजपा और जनसत्ता दल लोकतान्त्रिक के बीच गठबंधन की बातचीत का दौर अंतिम दौर में चल रहा था। रत्ना सिंह उहापोह में रह गई और फैसला न कर सकी कि उनका राजनीतिक भविष्य अब कांग्रेस में सुरक्षित नहीं है। अब प्रमोद कुमार का दौर खत्म हो गया। अब दौर मोना का है और मोना किसी भी दशा में रत्ना सिंह को प्रमोद कुमार की तरह सहयोग नहीं कर सकती। लोकसभा चुनाव में पहली बार कांग्रेस उम्मीदवार रत्ना सिंह कांग्रेस के गढ़ रामपुरखास में मुंह की खा गई और भाजपा यहाँ भी जीत हासिल की। ये बात कांग्रेस उम्मीदवार रत्ना सिंह को अखर गई। चुनाव परिणाम से बुरी तरह तिलमिलाई रत्ना सिंह अपने बेटे भुवन्यु सिंह की जिद के आगे भाजपा में उस वक्त बेटे समेत दर्जनों समर्थकों संग शामिल हो गई, जब प्रतापगढ़ की धरती पर सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ योगी आये हुए थे। 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के मंच पर रत्ना सिंह भाजपा में। शामिल हुई और उसी दिन रामपुरखास विधानसभा को भाजपा प्रमोद कुमार और उनकी लड़की जो रामपुरखास विधानसभा से विधायक मोना से छीन लेने की योजना की नींव डाली गई। उस योजना पर भाजपा अपनी रणनीति के तहत अब कार्य करती भी नजर आ रही है। देश में कृषि कानून के खिलाफ किसानों के आंदोलन के बीच प्रतापगढ़ में प्रभारी मंत्री डॉ नीलकंठ त्रिपाठी जी रामपुरखास विधानसभा में एक जनसभा का आयोजन करके पूरी ताकत के साथ किसानों को संदेश दिए। इस आयोजन की रूपरेखा रत्ना सिंह और उनके बेटे भुवन्यु सिंह ने तैयार की थी। तभी से ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या विधानसभा चुनाव- 2022 में रामपुरखास विधानसभा से भाजपा के उम्मीदवार भुवन्यु सिंह होंगे ? 

त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में राजकुमारी रत्ना सिंह इसी योजना के तहत अपनी बेटी तनु श्री को जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ाया ताकि जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव में महिला सीट होने की वजह से भाजपा ने यह दाँव चला था,परन्तु दाँव उल्टा पड़ गया। प्रमोद और विधायक मोना मिश्रा किसी भी दशा में यह नहीं चाहते थे कि जिला पंचायत सदस्य पद पर राजकुमारी रत्ना सिंह की बेटी तनुश्री जीत दर्ज कर सकें। प्रतापगढ़ सांसद संगम लाल गुप्त ने रामपुरखास विधानसभा में दखल देना शुरू किया और स्थिति यह हुई कि एक दिन सांगीपुर ब्लॉक परिसर में सांसद संगम लाल गुप्त और उनके समर्थकों के बीच विधायक मोना मिश्रा और प्रमोद कुमार एवं उनके समर्थकों के बीच जमकर मारपीट हो गई 

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