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शुक्रवार, 10 दिसंबर 2021

गोयल रेजीडेंसी होटल में 10मृतकों की आज अदालत में तारीख है और छः वर्षों में नहीं शुरू हो सका ट्रायल, मिलती है तो सिर्फ तारीख पर तारीख

सुनील गोयल जैसे सफेदपोश अपराधियों के सामने शासन-प्रशासन भी टेक देते हैं,घुटने...

दस निर्दोष ब्यक्तियों की जिंदा जल मरने के बाद भी शासन-प्रशासन के कान में नहीं रेंगी जूं,पुलिस द्वारा धारा-82 की कार्यवाही कराने के बाद भी रेखा गोयल और पार्वती गोयल अपनी जमानत नहीं कराई और न ही पुलिस उन्हें गिरफ्तार किया, क्योंकि सुनील गोयल अब भाजपा में जिला संयोजक, ब्यापार प्रकोष्ठ जो हैं...
 
गोयल रेजीडेंसी में आग लगने के बाद जुटी थी,भीड़...

जिले में हजारों सामाजिक संगठनों ने घटना के समय न्याय दिलाने का किया था, परन्तु वादा पर दूसरे साल ही भूल गए अपना वादा। गोयल रेजीडेंसी से जिला अस्पताल तक रोने की चीत्कार से काँप उठा था, कलेजा। अमर उजाला समाचार पत्र के सर्कुलेशन मैनेजर मनोज शर्मा की भी गई थी, गोयल रेजीडेंसी में जान। जिले के पत्रकारों ने भी खूब प्रकाशित की थी, खबरें। परन्तु सिस्टम में बैठे आकाओं ने सबके इरादों पर फेर दिया पानी और चाँदी का जूता मारकर गोयल रेजीडेंसी का मालिक सुनील गोयल ने नाम बदल कर उसी बिल्डिंग में फिर से होटल। यही है भारत के कानून और संविधान की हकीकत कि 90फीसदी लोगों को नहीं मिल पाता न्याय। थक हारकर जाते हैं, बैठ। गोयल रेजीडेंसी में अग्निकांड के बाद जूनियर बार पुरातन के अध्यक्ष रहे विनोद पाण्डेय ने लखनऊ उच्च न्यायालय में दाखिल की थी, जनहित याचिका। फिर भी नहीं मिला न्याय। आज भी पेंडिग है, उच्च न्यायालय में दाखिल जनहित याचिका। सिस्टम ही बिका हुआ है। सारे लोग धन के आगे खींस निपोर देते हैं। बिकने के लिए 90 फीसदी लोग तैयार बैठे रहते हैं, सुनील गोयल जैसा खरीददार का उन्हें सिर्फ इंतजार रहता है।   


 18जून की रात वर्ष-2015में गोयल रेसीडेंसी में लगी आग... (फाइल फोटो)

19 जून को भोर में साढ़े चार बजे कोतवाली नगर प्रतापगढ़ के बीचोंबीच हॉट प्लेस बाबागंज में गोयल रेजीडेंसी में रहस्यमय तरीके से आग लगने की सूचना मिली। ये सूचना तब मिली जब लखनऊ और कानपुर जाने के लिए इंटर सिटी ट्रेन पकड़ने हेतु रेलवे स्टेशन प्रतापगढ़ जा रहे थे। उस समय गोयल रेजीडेंसी में आग की लपटें और धुएं देखकर लोग आवाक रह गए थे। पुलिस प्रशासन और फायर ब्रिगेड के आने और बचाव कार्य करने से पहले ही दस लोग मृत हो गए थे। दो दर्जनों से अधिक घायल भी हुए थे। इनमें से कई मरणासन्न की स्थिति में थे। परन्तु जिला अस्पताल से रेफर होने के बाद से आज तक उनकी कोई हाल चाल नहीं मिल सकी। जो गोयल रेजीडेंसी में दस लोग मृत हुए थे। आज उनके परिजनों की दशा की भी कोई जानकारी किसी को नहीं है। उन्हें होटल मालिक की तरफ से मुआवजा और सरकार की तरफ से उन्हें किसी प्रकार की आर्थिक मदद मिली भी कि नहीं। इसकी भी कोई पुष्टि नहीं हुई। जो मरणासन्न थे, उनमें कितने दम तोड़े ? इसकी भी अधिकृत जानकारी किसी के पास नहीं है। चूँकि होटल मालिक आज तक पुलिस को ये नहीं बताया कि उसके होटल में कुल कितने लोग 18जून की रात्रि में ठहरे हुए थे।

गोयल रेजीडेंसी का कथित स्वामी सुनील गोयल...

जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन प्रतापगढ़ सहित सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ जी की सरकार को हृदय से बधाई कि जिस बिल्डिंग को मानक के विपरीत मानकर तत्कालीन मुख्य सचिव उत्तर प्रदेश, आलोक सिन्हा के आदेश पर मंडलायुक्त प्रयागराज राजन शुक्ल की देखरेख में त्रिस्तरीय जाँच कमेटी गठित करके जाँच कराई गई थी। त्रिस्तरीय जाँच रिपोर्ट में सत्यता की कसौटी पर तत्कालीन जाँच अधिकारी अपर आयुक्त, प्रयागराज कनक त्रिपाठी ने जिलाधकारी, अपर जिलाधिकारी सहित उप जिलाधिकारी सदर एवं विनियमित क्षेत्र के अवर अभियंता, नगरपालिका के अधिशासी अधिकारी, अग्निश्मन विभाग और विजली विभाग के अधिकारियों को दोषी पाते हुए मंडलायुक्त प्रयागराज को अपनी रिपोर्ट प्रेषित की थी जिसे देखते ही मंडलायुक्त प्रयागराज राजन शुक्ल की भृगुटी तन गई। आनन-फानन में रिपोर्ट बदलवाई गई। जाँच कमेटी की मुख्य जाँच अधिकारी कनक त्रिपाठी का तवादला कराया गया। तब जाँच रिपोर्ट की लीपापोती कर सबको बचाया गया। क्योंकि आईएएस लॉबी जब उसकी गोट फंसती है तो वह एकजुट होकर अपने दूसरे साथी को जी जान से बचाने की कोशिश करता है और बचाता भी है। 

गोयल रेजीडेंसी अग्निकांड की जाँच रिपोर्ट में भी यही हुआ। आईएएस लॉबी ने तत्कालीन उपजिलाधिकारी जे पी मिश्र के आईएएस बेटे के दबाव में तत्कालीन जिलाधिकारी अमृत त्रिपाठी और मंडलायुक्त राजन शुक्ल ने पूरी जाँच की ऐसी की तैसी कर डाली और सभी को बचाते हुए पूरी घटना को पचा गए। चूँकि कुछ ही दिनों बाद उसी बिल्डिंग को पुनः उसी दशा में सुनील गोयल को होटल संचालित करने की शासन प्रशासन ने छूट दे दी, जिसे तत्कलीन जिलाधकारी प्रतापगढ़ अमृत त्रिपाठी ने ध्वस्त करने का आदेश जारी किया था। सच में चाँदी के जूते में बड़ी ताकत होती है। जिसे मारो वही नरम हो जाता है और बुरा भी नहीं मानता। बिगड़े काम बनाने का सबसे उपर्युक्त विधान चाँदी के जूते में होती है। ये बात गोयल रेजीडेंसी होटल के स्वामी सुनील गोयल ने सिद्ध कर दिखाया। क्योंकि जिस जाँच रिपोर्ट में यह बताया गया कि होटल संचालन की कमियों से होटल में आग लगी और जानमाल का नुकसान हुआ। दो दराज लोग जो मरणासन्न हुए थे, उनकी सुधि लेने वाला कोई नहीं है और न ही मृतक हुए परिवार के बारे में कोई सोचने वाला है कि उनके परिवार वाले किस दशा में जीवनयापन करते होंगे ? सिर्फ कहने के लिए लोग कह देते हैं कि हम आपके साथ तन-मन-धन से हैं। असल में कोई साथ नहीं देता।  

अब प्रतापगढ़ का जिला प्रशासन और योगी सरकार क्या ये बताने का कष्ट करेगी कि किन दशाओं में पुनः बिजली का कनेक्शन सुनील गोयल को होटल संचालित करने के लिए दिया गया ? किन दशाओं में अग्नि श्मन विभाग ने अपनी एन ओ सी पुनः दिया ? सबसे मजेदार बात ये रही कि जिलाधिकारी प्रतापगढ़ ने उक्त बिल्डिंग को ध्वस्तीकरण का एक तरफ आदेश दिया और दूसरे जिलाधिकारी महोदय ने किस दबाव में होटल संचालित करने की अनुमति सुनील गोयल को उसी बिल्डिंग में दे दी ? एक तरफ सुनील गोयल हाईकोर्ट खंडपीठ लखनऊ में हलफनामा देकर जमानत लिए है न कि वह गोयल रेजीडेंसी के स्वामी नहीं हैं। उनकी पत्नी रेखा गोयल और विधवा माँ पार्वती गोयल भी कोतवाली नगर में दर्ज मुकदमों में अभियुक्त हैं सुनील गोयल की माँ पार्वती गोयल अपने बेटे सुनील गोयल के साथ ही रहती हैं। बड़ी चालाकी से सुनील गोयल हाईकोर्ट खंडपीठ लखनऊ को भी गुमराह कर अपनी जमानत लेकर अपना बंद पड़ा होटल पुनः खोल लिए और सत्ताधारी दल भाजपा में पहले सदस्य बने और पार्टी नेताओं को होटल में रोककर उन्हें सुविधाओं का भोग कराकर जिला संयोजक, ब्यापार प्रकोष्ठ बनकर अपना सारा फंसा हुआ कार्य निकाल लेने में सफल रहे।  

यह सही है कि जिस जमीन पर गोयल रेजीडेंसी का निर्माण हुआ वह रेखा गोयल के नाम पर है, परन्तु गोयल रेजीडेंसी का संचालन स्वयं सुनील गोयल द्वारा किया जाता रहा और जब आग लगी और वह जेल गए तो जमानत के लिए अधिवक्ताओं की सलाह पर उन्होंने एक हलफनामा देकर अपने को गोयल रेजीडेंसी का स्वामी न होना बताया। यह तो फिल्म ओ माई गॉड की याद ताजा कर दी है। फिलहाल गोयल रेजीडेंसी का कोई न कोई मालिक तो जरूर होगा। गोयल रेजीडेंसी फर्म को भंग करना और उसी बिल्डिंग को फिर से रिपेयर कराकर सत्यम होटल के नाम से संचालन करना यह सिद्ध करता है कि समरथ को नहीं दोष गोसाईं। तभी तो 18 जून, 2015 की घटना में अभी तक 10 लोगों की मौत के बाद भी उनके दर्ज मुकदमों में अदालत में आरोप पत्र दाखिल होने के बाद भी आज तक ट्रायल की शुरुवात न हो सकी। अदालत में चुपके से सुनील गोयल सिर्फ तारीख लेकर निकल लेते हैं।आज तक धारा-82 की कार्यवाही होने के बाद भी रेखा गोयल और पार्वती गोयल अपनी जमानत नहीं कराई और न ही पुलिस उन्हें गिरफ्तार किया। क्योंकि सुनील गोयल अब भाजपा में जिला संयोजक, ब्यापार प्रकोष्ठ जो हैं। आज भी अदालत में तारीख है और आज भी तारीख मिल जायेगी, ठीक उसी तरह जैसे फिल्म दामनी में तारीख पर तारीख मिला करती थी।   

2 टिप्‍पणियां:

  1. इसकी जाँच सीबीआई से होनी चाहिए

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  2. सीबीआई ने जियाउल हक सीओ साहेब की हत्या की जाँच की। क्या हुआ ? वैष्णवी होटल में शहर के बीचोबीच शाम को बेखौफ बदमाशों ने इंस्पेक्टर अनिल कुमार की हत्या कर दी। हाईकोर्ट से CBI जाँच कराने का आदेश हुआ। क्या हुआ ? सब मामले में CBI वाले जाँच को रोके रहते हैं। CBI सिर्फ विपक्ष के नेताओं को डराने का एक माध्यम तक अपने को सिमटा लिया है। चीफ सेक्रेटरी की देखरेख में माननीय उच्च न्यायालय की मॉनिटरिंग में गोयल रेजीडेंसी में अग्निकांड की जाँच हुई। नतीजा सबके सामने है। चाँदी का जूता जिन्दावाद।

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