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मंगलवार, 28 सितंबर 2021

क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह युगद्रष्टा की जयंती पर श्रद्धावत नमन

"क्रांति के लिए खूनी लड़ाइयां अनिवार्य नहीं हैं और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान है। वह बम और पिस्तौल की संस्कृति नहीं है। क्रांति से हमारा अभिप्राय है, अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज-व्यवस्था में आमूल परिवर्तन "


क्रांति क्या है ?


प्रखर बुद्धि, वैचारिक रूप से सुदृढ़ इस जांबाज युवक ने मात्र 23 साल की उम्र में अपने प्राणों की आहुति देश की आजादी के लिए देने का अमर इतिहास रचा। इस अमर बलिदानी के क्रांति पर विचार पढ़िए एवं ये भी जानिए कि उन्हें फाँसी की सजा क्यों हुई थी...???

 

अमर बलिदानी भगत सिंह...

अमर बलिदानी भगत सिंह का कहना है कि किसी को 'क्रांति' शब्द की व्याख्या शाब्दिक अर्थ में नहीं करनी चाहिए। जो लोग इस शब्द का उपयोग या दुरुपयोग करते हैं, उनके फायदे के हिसाब से इसे अलग अर्थ और अभिप्राय दिए जाते हैं। बदलाव की जरूरत पर बल देते हुए भगत सिंह ने कहा कि 'आमतौर पर लोग जैसे जीते हैं, उसी के वो आदी हो जाते हैं और बदलाव के विचार से ही काँपने लगते हैं। हमें इस निष्क्रियता की भावना को क्रांतिकारी भावना से बदलने की जरूरत है।'


क्रान्ति क्या है ? भारत के राष्ट्रीय हलकों में इसके बारे में एक बड़ी गलत धारणा बनी हुई है। आमतौर पर क्रान्ति को बम, रिवॉल्वर और गुप्त संस्थाओं से जोड़ दिया जाता है। बहरहाल, क्रान्ति एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है, जो वर्तमान जड़तामूलक युग का अन्त कर उसके स्थान पर स्वंतत्रता, समानता, बंधुत्व व सामाजिक न्याय पर आधारित एक नये युग का शुभारम्भ करती है। चूँकि रूढ़ियों के साये में पल रहे और जड़ बन चुके समाज के प्रतिनिधि या दलाल, आर्थिक वर्ग और राजनीतिक संस्थाएँ, जो उस समाज में प्रचलित हालात से लाभान्वित होते रहे हैं, एक भयानक प्रतिरोध के बगैर ऐसा कोई परिवर्तन नहीं होने देते। वे नहीं चाहते कि उनके प्रभुत्व का अन्त हो जाये। इसीलिए आमतौर पर राजनीतिक हिंसा और सामाजिक उथल-पुथल ‘क्रान्ति’ कहलाने वाली ऐतिहासिक घटना के अंग बन जाते हैं।


भगत सिंह व उनके क्रान्तिकारी साथी मनुष्य द्वारा मनुष्य के और एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र के शोषण से मुक्त वर्गहीन समाज के पक्ष में थे। उन्होंने एलान किया कि उनकी लड़ाई सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खि़लाफ ही नहीं है, बल्कि विश्व साम्राज्यवादी व्यवस्था के खि़लाफ है। उनका विश्वास था कि क्रान्ति के बाद जो सरकार बनेगी उसका रूप एक प्रकार की सर्वहारा वर्ग की सर्वोच्चता का होगा। क्रान्ति के सम्बन्ध में भगत सिंह के विचार बहुत स्पष्ट थे। उन पर चल रहे मुकदमें के दौरान निचली अदालत में जब उनसे पूछा गया कि क्रान्ति शब्द से उनका क्या मतलब है, तो प्रश्न उत्तर में उन्होंने कहा था, "क्रांति के लिए खूनी लड़ाइयां अनिवार्य नहीं हैं और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान है। वह बम और पिस्तौल की संस्कृति नहीं है। क्रांति से हमारा अभिप्राय है, अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज-व्यवस्था में आमूल परिवर्तन।


समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूंजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मोहताज हैं। दुनिया भर के बाजारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढंकने-भर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुंदर महलों का निर्माण करने वाले मिस्त्री, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गंदे बाड़ों में रहकर ही अपना जीवन बसर करते हैं और मर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूंजीपति अपनी सनक पर लाखों रुपये व्यय कर देते हैं। यह भयानक असमानता और जबर्दस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिए जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सकती। स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियां मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं।


अपनी बात को और भी स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा था, "सभ्यता का यह महल यदि समय रहते संभाला न गया तो शीघ्र ही चरमराकर बैठ जाएगा। देश को एक आमूलचूर्ण परिवर्तन की आवश्यकता है जो लोग इस बात को महसूस करते हैं, उनका कर्त्तव्य है कि साम्यवादी सिद्धांतों पर समाज का पुनर्निर्माण करें। जब तक यह नहीं किया जाता और मनुष्य द्वारा मनुष्य का तथा एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण, जिसे साम्राज्यवाद कहते हैं, समाप्त नहीं कर दिया जाता, तब तक मानवता को उसके क्लेशों से छुटकारा मिलना असंभव है। तब तक युद्धों को समाप्त कर विश्व-शांति के युग का प्रादुर्भाव करने की सारी बातें महज ढोंग के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं। क्रांति से हमारा मतलब अन्ततोगत्वा एक ऐसी समाज-व्यवस्था की स्थापना से है, जो इस प्रकार के संकटों से बरी होगी और जिसमें सर्वहारा वर्ग का आधिपत्य सर्वमान्य होगा तथा जिसके फलस्वरूप स्थापित होेने वाला विश्व-संघ पीड़ित मानवता को पूंजीवाद के बंधनों से और साम्राज्यवादी युद्ध की तबाही और मुसीबतों से छुटकारा दिलाने में समर्थ हो सकेगा।


यह है, हमारा आदर्श और इसी आदर्श से प्रेरणा लेकर हमने एक सही तथा पुरजोर चेतावनी दी है। लेकिन अगर हमारी इस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया गया और वर्तमान शासन-व्यवस्था उठती हुई जनशक्ति के मार्ग में रोड़े अटकाने से बाज न आई तो क्रांति के इस आदर्श की पूर्ति के लिए एक भयंकर युद्ध का छिड़ना अनिवार्य है। सभी बाधाओं को रौंदकर आगे बढ़ते हुए उस युद्ध के फलस्वरूप सर्वहारा वर्ग के अधिनायकतंत्र की स्थापना होगी। यह अधिनायकतंत्र क्रांति के आदर्शों की पूर्ति के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा। क्रांति मानवजाति का जन्मजात अधिकार है, जिसका अपहरण नहीं किया जा सकता। स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। श्रमिक वर्ग ही समाज का वास्तविक पोषक है और जनता की सर्वोपरि सत्ता की स्थापना ही श्रमिक वर्ग का अंतिम लक्ष्य है। इन आदर्शों के लिए और इस विश्वास के लिए हमें जो भी दंड दिया जाएगा, हम उसका सहर्ष स्वागत करेंगे। क्रांति की इस वेदी पर हम अपना यौवन नैवेद्य के रूप में लाए हैं, क्योंकि ऐसे महान आदर्श के लिए बड़े से बड़ा त्याग भी कम है। हम संतुष्ट हैं और क्रांति के आगमन की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा कर रहे हैं।


इंक़लाब ज़िंदाबाद...


क्रांतिकारी भगत सिंह तो फांसी के फंदे को 'विचार का मंच' मानते थे...

“इन्कलाब जिंदाबाद से हमारा अभिप्राय क्या है?” शीर्षक से लिखे लेख में वे क्रांति के अपने स्वप्न को भी स्पष्ट करते हैं- “क्रान्ति शब्द का अर्थ प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना और आकांक्षा है।” इस प्रगति को जो स्वप्न उन्होंने देखा उसका उल्लेख बहुत स्पष्ट रूप से उन्होंने अपने लेखन में किया है।


असेम्बली बमकांड और उसकी पृष्ठभूमि 


भगत सिंह ने नास्तिक क्रांतिकारी विचारकों को पढ़ा और उनका झुकाव क्रांतिकारी विचारधारा की तरफ होने लगा। उनको ऐसे क्रांतिकारियों ने सर्वाधिक प्रभावित किये जो अपनी जान की बाजी लगाकर अपने सिद्धांतों का प्रचार दुश्मन की अदालत में खड़े होकर किया करते थे। भगत सिंह के मन, मस्तिष्क पर 'अराजकतावादी' पुस्तक के अध्याय 'हिंसा का मनोविज्ञान' का गहन प्रभाव पड़ा। इसमें फ्रांस के अराजकतावादी नवयुवक 'वेलां' का बयान लिखा हुआ था, जो उसने फ्रांस में गिरफ्तार होने के बाद अदालत के सामने दिया था। श्रमजीवियों तथा मेहनतकश श्रमिकों के शोषण पर कायम पूंजीवादी समाज के कर्णधारों की उदासीनता से उद्विग्न होकर 'वेलां' के मन में एक विचार उठा कि क्यों न फ्रांस की असेंबली में बम धमाका किया जाए, जिससे बहरे शासक जाग जाएं। बहरों को सुनाने के लिए ऊंची आवाज की जरूरत होती है। यही सोचकर उसने असेंबली में बम विस्फोट किया। इस पुस्तक को भगत सिंह ने लाइब्रेरी से लगभग 64 बार निर्गमित करवा कर पढ़ा। वेलां के बयान को भगत सिंह ने याद कर लिया और उससे प्रेरणा लेकर ठान लिया कि अवसर आने पर मैं भी ऐसा ही करूंगा।


'बहरे कानों सुनाने के लिए धमाके की जरूरत होती है।' वेलां का यह कथन भगत सिंह के दिमाग में बार-बार कौंधता रहता था। आखिरकार एक दिन भगत सिंह ने अद्भुत साहसिक, वीरोचित निर्णय ले लिया। समझौतावादी दृष्टिकोण को दुत्कारते हुए उसने खुद को बलिदान करने का फैसला ले लिया था। ये फैसला था जान की बाज़ी लगाकर असेंबली में बम विस्फोट करना। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने कश्मीरी गेट पर रामनाथ नाम के फोटोग्राफर से 3 या 4 अप्रैल, 1929 को एक तस्वीर भी खिंचवाई थी। फेल्ट हैट पहने हुए भगत सिंह की वो तस्वीर ऐतिहासिक बन गयी और भारतीय जन मानस पर हमेशा-हमेशा के लिए अंकित हो गई। नई दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेंट्रल एसेम्बली के सभागार में 8 अप्रैल, 1929 को भगतसिंह ने क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर अंग्रेज सरकार को जगाने के लिए बम और पर्चे फेंके। दोनों नौजवान खाकी शर्ट और शॉर्ट्स में थे। भगत सिंह ने फेल्ट हैट पहना हुआ था। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी। 


असेंबली में बम फेंकने के लिए जो दिन चुना गया उस दिन सरकार कुछ दमनात्मक बिल पास करने वाली थी। क्रांतिकारियों का विचार था कि जनता तक पहुंचने का एकमात्र माध्यम बम है, जिससे बहरे कान भी सुन सकेंगे। भगत सिंह तो फांसी के फंदे को 'विचार का मंच' मानते थे। असेम्बली को जब सर जॉर्ज शुल्टर ने सूचित किया कि वायसराय ने बिल पेश कर दिया है तो भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त दर्शक दीर्घा से उठ खड़े हुए। पहला बम भगत सिंह ने फेंका, दूसरा दत्त ने। बम फेंकने के बाद ये दोनों युवक 'इंकलाब जिंदाबाद' तथा 'साम्राज्यवाद का नाश हो' ( Down with Imperialism) के नारे लगाते रहे। ये नारे भारत में पहली बार इन्हीं युवकों द्वारा लगाए गए थे। धमाका इतनी जोर से हुआ कि सारी असेम्बली थर्रा गई। डर के मारे कुछ सदस्य बाहर भागे। कुछ गैलरी और बाथरूम में जा छिपे। भगत सिंह ने रिवाल्वर निकाला और हवा में दो फायर किए और लाल पर्चे बिखेर दिए। उनका तीसरा साथी जयदेव कपूर इस धमाके के तुरंत बाद ही हॉल से निकल गया और किसी असेम्बली सदस्य से प्राप्त उन पासों को जला दिया जिसके जरिये वे सभी असेम्बली में घुसे थे। 


असेम्बली में बिखरे लाल पर्चे का शीर्षक था- "बहरों को सुनाने के लिए धमाकों की जरूरत होती है।" यह कोटेशन फ्रेंच क्रन्तिकारी वेलां का है, जिसने इस धमाके के चार दशक पहले कुछ इसी प्रकार की कार्यवाही को फ़्रांस की संसद में अंजाम दिया था और उन्हें इस कार्यवाही के लिए मौत की सजा दी गयी थी। पर्चे असेंबली में पत्तों की तरह बिखरे पड़े थे। भगत सिंह ने पुलिस कप्तान जॉनसन से कहा, 'चिंता मत करो, हम सारे संसार को बता देंगे, यह हमने किया है और क्यों किया है ? भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त दोनों ने खुद को पुलिस के हवाले कर दियाअसेम्बली भवन में बम फेंकने के बाद सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त, ये दोनों युवक चाहते तो वहां से भाग सकते थे, परन्तु उन्होंने निर्भीकता की अनूठी मिसाल कायम करते हुए पुलिस के हाथों आत्मसमर्पण कर दिया। उनके पास लोडेड रिवॉल्वर थे। यदि वे चाहते तो वे उन सरकारी अफसरों पर गोलियां दाग सकते थे, जो बम फटने के बाद भयाक्रांत होकर इधर-उधर भाग रहे थे।


असेम्बली में बम क्यों फेंका,इसका जबाब सरदार भगत सिंह ने यूँ दिया 


'If the deaf are to hear ,the sound has to be very loud. When we dropped the bomb, it was not our intention to kill anybody. We have bombed the British government . The British must quit India and make her free.'


'यदि बहरों को सुनाना है तो आवाज तेज करनी होगी। जब हमने बम फेंका था, तब हमारा इरादा किसी को जान से मारने का नहीं था। हमने ब्रिटिश सरकार पर बम फेंका था। ब्रिटिश सरकार को भारत छोड़ना होगा और उसे स्वतंत्र करना होगा।' थाने में पुलिस ने भगत सिंह और दत्त से बहुत कुछ जानने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने निडरता से कहा कि हमें जो कुछ कहना है, हम अदालत में ही कहेंगे। सेशन जज की अदालत में सरकारी गवाहों के बयानों के बाद भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने 6 जून को एक ऐतिहासिक बयान दिया था कि हमने स्वयं अपने आप को दंड पाने के लिए स्वेच्छा से प्रस्तुत कर दिया था और साम्राज्यवादियों-शोषकों को यह बता दिया कि वे व्यक्तियों को तो कुचल सकते हैं, विचारों की हत्या नहीं कर सकते। दो महत्वहीन/ नगण्य इकाइयों को कुचल देने से राष्ट्र नहीं कुचला जा सकता षड्यंत्रों का भेद खोलने, जोरदार शब्दों में निंदा करने व महज आदर्शों का स्वप्न देखने वाले सभी नौजवानों को फांसी के तख्ते पर चढ़ा देने से भी क्रांति की गति अवरुद्ध नहीं की जा सकती।"


12 जून, 1929 को कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया जिसके अनुसार भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त दोनों क्रांतिकारियों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई गयी। इस निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गयी, लेकिन उसे 13 जनवरी, 1930 को खारिज कर दिया और सजा को जारी रखा। इस फैसले में जस्टिस एफ फोर्ड ने लिखा था कि यह बयान ( कहना ) कोई गलत नहीं होगा कि यह लोग दिल की गहराइयों और आवेगो के साथ वर्तमान समाज के ढांचे को बदलने की इच्छा से प्रेरित थे। भगत सिंह एक ईमानदार और सच्चा क्रांतिकारी है। मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं कि वे इस स्वप्न को लेकर पूरी सच्चाई से खड़े हैं कि दुनिया का सुधार वर्तमान सामाजिक ढांचे को तोड़कर ही हो सकता है। वे कानून के ढांचे की जगह मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा को स्थापित करना चाहते हैं। अराजकतावादियों की यही मान्यता है, परंतु जो आरोप इन पर तथा उनके साथियों पर लगा है, यह कोई इसकी सफाई नहीं है।"


फांसी ही क्यों ?


भगत सिंह को फांसी एसेम्बली बमकांड के लिए नहीं हुई थी, इस कांड में बटुकेश्वर दत्त एवं उन्हें आजीवन कारावास हुआ था। भगत सिंह को फांसी दिलवाने में उनके हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' के क्रांतिकारी साथियों, जय गोपाल और हंसराज वोहरा का हाथ था, जो सैण्डर्स हत्याकाण्ड में सरकारी गवाह बन गये थे। लेकिन इसकी चर्चा प्राय: नहीं होती है। भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों को पूरी तरह फंसाने के लिए अंग्रेजी सरकार ने पुराने केस खंगालने शुरू कर दिए। असेंबली कांड से करीब 3 महीने पहले हुई साण्डर्स की हत्या में शामिल होने के आरोप में भगत सिंह और उनके दो साथियों राजगुरू और सुखदेव पर देशद्रोह के साथ-साथ हत्या का भी मुकदमा चला जो लाहौर षडयंत्र केस के नाम से जाना जाता है।


लाहौर षड्यंत्र केस 


30 अक्टूबर, 1928 को साइमन कमीशन लाहौर पहुंचा। इस कमीशन के ख़िलाफ़ एक विरोध मार्च का नेतृत्व करते हुए लाला लाजपत राय को अंग्रेज पुलिस अफसर सांडर्स ने लाठियों से वार कर चोटिल किया, जिसके कारण 17 नवम्बर को लाला लाजपत राय जी का देहांत हो गया। लाला जी की मौत से क्रांतिकारी आक्रोशित हो गए। तय हुआ कि बदला लिया जाएगा। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद समेत कई क्रांतिकारियों ने मिलकर लाठीचार्ज का आदेश देने वाले अंग्रेज पुलिस अफसर जेम्स स्कॉट को मारकर लाला लाजपत राय जी की मौत का बदला लेने की ठान ली।


17 दिसंबर, 1928 को सांडर्स जब लाहौर के पुलिस हेडक्वार्टर से बाहर निकल रहे थे, तभी भगत सिंह और राजगुरु ने उन पर गोली चला दी। वैसे इरादा स्कॉट की हत्या का था, लेकिन निशानदेही में थोड़ी चूक होने से स्कॉट की जगह असिस्टेंट सुप्रीटेंडेंट ऑफ पुलिस जॉन पी सांडर्स क्रांतिकारियों का निशाना बन गए। इस कार्रवाई में क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद ने उनकी पूरी मदद की थी। 7 अक्टूबर, 1930 को ट्रिब्यूनल ने लाहौर षड्यंत्र केस का अपना फैसला सुना दिया। फैसला था कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी। इसके खिलाफ प्रिवी काउंसिल से की गयी अपील भी फरवरी, 1931 को खारिज कर दी गयी। अंततः इन तीनों को 23 मार्च, 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई।


यहाँ ये भी जान लें कि बटुकेश्वर दत्त को भगत सिंह के साथ असेम्बली में बम फेंकने के जुर्म पर आजीवन  कारावास की सजा सुनाई गई। गांधी जी के प्रयासों से बटुकेश्वर दत्त की 1938 में जेल से रिहाई  हुई थी। फिर यही बटुकेश्वर दत्त 1942  में गांधीजी  के अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए। इस पर उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया। चार साल बाद 1945 में वे रिहा हुए और बाद में पटना में रहने लगे। सन 1965 में बीमारी के कारण अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली में उनका देहांत हो गया। 


भगत सिंह पर असली दावेदारी किसकी ? 'भगत' मतलब शोषित के हक की लड़ाई लड़ना है 


भगत सिंह का सम्मान करने का अर्थ है : नास्तिकता, तर्कवाद और वैज्ञानिक सोच का झंडा बुलंद करना और जब तक एक भी व्यक्ति शोषित है, तब तक व्यवस्था बदलने का सतत प्रयास करना क्योंकि भगत सिंह ने मजदूर, किसान, वंचित, दलित और हर पीड़ित के हक के लिए लड़ाई लड़ने का आह्वान किया है। भगत सिंह पर असली दावेदारी किसकी है ? इस सवाल पर प्रो. चमनलाल कहते हैं, ‘भगत सिंह भारत के कामगार, मजदूर, किसान, दलित और निचले वर्ग के साथ थे। वर्ष-1929 से 1931 के दौरान जब भगत सिंह के केस का ट्रायल चल रहा था, उस वक्त सभी अखबार वामपंथी और ‘समाजवादी क्रांतिकारी’ लिख रहे थे।'


प्रो. चमन लाल आगे कहते हैं, ‘एक वक्त पर भगत सिंह, चंद्रशेखर और उनके साथियों ने ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाया था, लेकिन सितंबर, 1928 में अपने संगठन के नाम में सोशलिस्ट शब्द जोड़ने के बाद ‘इंकलाब जिंदाबाद’ व ‘साम्राज्यवाद का नाश हो’ के नारे को अपनाया। 2 फरवरी, 1931 को लिखे ‘युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं को पत्र’ में उन्होंने स्पष्ट रूप से ‘समाजवादी सिद्धांत’ को भारतीय स्वतंत्रता का रास्ता बताया है। कोई भी व्यक्ति जिसने ऐतिहासिक दस्तावेज पढ़े हैं, वह भगत सिंह के मार्क्सवादी सिद्धांत पर आधारित ‘समाजवादी क्रांतिकारी राष्ट्रवादी’ होने से इनकार नहीं कर सकता।’


पगड़ी-प्रकरण 


आजादी के बाद हमारे देशी शासक भी भगत सिंह के विचारों से उतना ही भयभीत हैं, जितना अंग्रेज थे। इसलिए भगत सिंह की भ्रांतिपूर्ण, मनगढ़ंत छवि पेश करने की साज़िश को अमलीजामा पहनाया जा रहा है। भगत सिंह पर महत्वपूर्ण शोधकार्य करने वाले प्रो. चमन लाल कहते हैं कि भगत सिंह की असल तस्वीरों को बिगाड़ने की होड़ सी मच गई है। मीडिया में बार-बार भगत सिंह को किस अनजान चित्रकार की बनाई पीली पगड़ी वाली तस्वीर में दिखाया जा रहा है। सच तो यह है कि भगत सिंह की अब तक ज्ञात चार वास्तविक तस्वीरें ही उपलब्ध हैं। पहली तस्वीर 11 साल की उम्र में घर पर सफेद कपड़ों में खिंचाई गई थी। दूसरी तस्वीर तब की है, जब भगत सिंह करीब 16 साल के थे। उस तस्वीर में लाहौर के नेशनल कॉलेज के ड्रामा ग्रुप के सदस्य के रूप में भगत सिंह सफेद पगड़ी और कुर्ता-पायजामा पहने हुए दिख रहे हैं। 


तीसरी तस्वीर 1927 की है, जब भगतसिंह की उम्र करीब 20 साल थी। तस्वीर में भगतसिंह बिना पगड़ी के खुले बालों के साथ चारपाई पर बैठे हुए हैं। चौथी और आखिरी इंग्लिश हैट वाली तस्वीर दिल्ली में ली गई है, तब भगत सिंह की उम्र 22 साल से थोड़ी ही कम थी। इनके अलावा भगत सिंह की कोई अन्य प्रामाणिक तस्वीर नहीं मिली है। उनकी उपलब्ध तस्वीरों में से इंग्लिश हैट वाली तस्वीर सबसे ज्यादा चर्चित है, जिसे फोटोग्राफर श्याम लाल ने दिल्ली के कश्मीरी गेट पर 3 अप्रैल, 1929 को खींची थी। इस बारे में श्याम लाल का बयान लाहौर षडयंत्र मामले की अदालती कार्यवाही में दर्ज है। 15 अगस्त, 2008 को संसद भवन में भगत सिंह की प्रतिमा प्रतिष्ठापित की गई, जिसमें उन्हें पगड़ी पहने हुए दिखाया गया है। शोधकर्ता कहते हैं कि भगत सिंह ने वर्ष-1928 से 23 मार्च, 1931 को फांसी दिए जाने तक पगड़ी नहीं पहनी। वे तो अक्सर यूरोपियन स्टाइल की हैट पहनते थे। प्रो. चमनलाल तो यहां तक कहते हैं कि उन्हें हैट में न दिखाना अक्षम्य है।


पंथ, बिरादरी, जाति को राष्ट्रीय एकता में रोड़ा मानने वाले भगत सिंह को कोई उन्हें पगड़ी पहनाकर सिख बनाने का प्रयास कर रहा है तो कोई उन्हें जाति का गौरव घोषित करने पर तुला है। हद तो यह है कि उनकी पगड़ी का रंग भी सत्ताधीश अपने मन माफ़िक बदल रहे हैं। ये सब उनके क्रान्तिकारी विचारों पर पर्दा डालने के लिए किया जा रहा है। भगत सिंह की प्रतीकात्मक पहचान और विचारधारा से छेड़छाड़ पर चिंता जताते हुए भगत सिंह समेत दूसरे क्रांतिकारियों पर महत्वपूर्ण किताबें लिखने वाले सुधीर विद्यार्थी कहते है, "जिस व्यक्ति ने खुद कहा हो कि अभी तो मैंने केवल बाल कटवाए हैं, मैं धर्मनिरपेक्ष होने और दिखने के लिए अपने शरीर से सिखी का एक-एक नक्श मिटा देना चाहता हूं, आप उसके सिर पर फिर पगड़ी रख रहे हैं, आप कितना भी प्रयास कर लें, भगत सिंह के सिर पर पगड़ी रखने का, लेकिन 23 साल का वह युवा क्रांतिकारी इतना बड़ा हो गया है कि उस पर कोई पगड़ी अब फिट नहीं हो सकती।"


प्रासंगिकता 


भगत सिंह की राजनीतिक विरासत देश को उनके दो परस्पर पूरक नारों में अभिव्यक्त होती है- "इंकलाब जिंदाबाद' और 'साम्राज्यवाद मुर्दाबाद।" ये नारे स्वतंत्रता संग्राम में प्रचलित उस समय के लोकप्रिय 'वंदे मातरम' के उद्घोष पर इस तरह छा गए, जैसे उमड़ते बादलों पर अचानक बिजली कौंध जाती है। इससे पूर्व 'वंदे मातरम' ही हमारा राष्ट्रीय नारा था। भगत सिंह के साथी विजय कुमार सिन्हा के शब्दों में 'भगत सिंह के नारे 'इंकलाब जिंदाबाद' ने जनता का ध्यान खींचा, क्योंकि इससे बिना समझौता किए, लड़ते रहने का दृढ़ संकल्प तथा दरिद्रता एवं कष्ट को सदा के लिए दूर कर एक नवीन सामाजिक व्यवस्था को स्थापित करने की आशा व्यक्त होती थी।'


स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भगतसिंह उन इक्का-दुक्का क्रांतिकारी विचारकों में से थे, जो उस समय ही यह बात जोर देकर कह रहे थे कि केवल अंग्रेजों के भारत से चले जाने से ही आम जनता की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आएगा। बदलाव इस शोषणकारी व्यवस्था/तंत्र को बदलने से ही संभव हो सकेगा। "आजादी के मायने यह नहीं होता कि सत्ता गोरे हाथों से काले हाथों में आ जाए। यह तो सत्ता का हस्तानांतरण हुआ। असली आजादी तो तब होगी, जब वह आदमी जो खेतों में अनाज उगाता है भूखा नहीं सोयेगा, वह आदमी जो कपड़े बुनता है, स्वयं नंगा नहीं रहेगा, वह आदमी जो मकान बनाता है, खुद बेघर नहीं रहेगा।" अपने समय के सभी क्रांतिकारियों में भगत सिंह निःसंदेह सर्वश्रेष्ठ चिंतक, विचारक और दृष्टा थे। वह सिर्फ आदर्शवादी, भावुक नवयुवक ही नहीं, यथार्थवादी विचारक भी थे।


देश की मेहनती गरीब जनता के लिए भगतसिंह के क्रान्तिकारी विचार आज पहले से कहीं ज्यादा प्रासांगिक हो चले हैं। छद्म राष्ट्रवाद व आस्था के नाम पर रूढ़िवादी, संकीर्ण सोच और साम्प्रदायिक व जातीय उन्माद की तरफ़ धकेले जा रहे देश में भगतसिंह के विचारों के मर्म को समझना बेहद जरूरी हो गया है। भगत सिंह नाम है अव्वल दर्जे की बौद्धिकता का, तर्कशीलता का, दीवानगी का, बेख़ौफ जिंदगी जीने का, क्रान्ति की सोच का, दमित-शोषित की मुक्ति के आंदोलन का, साम्राज्यवादी शक्तियों से टक्कर लेने का, वतन के लिए जिंदगी वक्फ ( दान ) कर देने का, वक़्त आने पर वतन के लिए मर-मिटने का। भगत सिंह बनना आसान नहीं। ये एक आग का दरिया है, जिसमें डूबके जाना है।


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