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सोमवार, 2 अगस्त 2021

सेना में शहीद हुए जवान की शहादत भी राजनीति का शिकार हो गई, प्रतापगढ़ जनपद में शहीद की श्रद्धांजलि में जनप्रतिनिधियों और जिला प्रशासन ने किया भेदभाव

ओ देश मेरे तू जीता रहे, तूने शेर के बच्चे पाले हैं, एक लाल हुआ बलिदान तो क्या सौ लाल तेरे रखवाले हैं...!!!


योगी सरकार का ब्राह्मण विरोधी चेहरा फिर उजागर, शाहीद जवान चंद्रलोक तिवारी की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हुआ जनप्रतिनिधियों की टोली व प्रशासनिक अमला, अपनों के ही चंद आंसुओं के साथ विदा हो गए, शहीद चंद्रलोक तिवारी...!!!


सेना के जवान की शहादत के प्रति जनपद के जनप्रतिनिधियों और जिला प्रशासन की बेरुखी से शहीद हुए जवान के परिजनों में रोष, क्षेत्रीय जनता ने जवान की शहादत पर दोहरा चरित्र पेश करने वाले जनप्रतिनिधियों और जिला प्रशासन के प्रति जताई गहरी नाराजगी...!!!


SDM रानीगंज अंतिम समय में सेना के जवान चंद्रलोक तिवारी को श्रधांजलि देने पहुँचे...

प्रतापगढ़ में कंधई थाना क्षेत्र के सराय नानकार गांव निवासी सेना के जवान चंद्रलोक तिवारी (26) का शुक्रवार को निधन हो गया था। दिल्ली के आर्मी हास्पिटल में उनका उपचार हो रहा था। वहां आर्मी हेड क्वार्टर पर जवानों ने सलामी देने के बाद पार्थिव शरीर प्रतापगढ़ स्थित उनके पैतृक गांव सराय नानकार ले आए। रविवार को सैनिक चंद्रलोक तिवारी की अंतिम यात्रा थीउम्मीद थी कि क्षेत्रीय विधायक प्रशासनिक अमला और गणमान्य लोगों की उपस्थिति में देश की मिट्टी के लिए सेवा करने वाले जवान को भावभीनी श्रद्धांजलि दी जाएगी, लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा न हो सका। शासन-प्रशासन की निगाह में चंद्रलोक तिवारी की इलाज के दौरान स्वाभाविक मौत हुई, जिसकी वजह से वह शहीद कहलाने का हक नहीं रखते। 

प्रतापगढ़ में दो जवान शहीद होते हैं,एक ताबूत में तो दूसरा तिख्ती पर...


सेना के जवान की शहादत पर भी वोटबैंक और अगड़ी-पिछड़ी जाति की भावना ने मानवता और एक जवान की शहादत में भेदभाव करके मानवीय गुणों और आदर्शो को चकनाचूर कर दिया। समाज के लोगों ने ऐसा कभी सोचा भी नहीं रहा होगा कि दो जवान शहीद होंगे तो उनकी शहादत में उनकी जाति देखकर उनके अंतिम संस्कार में भेदभाव करते हुए समाज को नई दिशा दी जायेगी। सेना का जवान यदि ड्यूटी के दौरान शहीद होता है तो वह शहीद कहलाता है और यदि इलाज के दौरान उसकी साँसे थमती है तो वह शहीद की पात्रता नहीं रखता। दोनों में बहुत कंफ्यूजन है। लोग जानने के लिए वेताब हैं कि यदि रितेश पाल ड्यूटी के दौरान बर्फ के टुकड़े की चपेट में आने पर यदि मौके पर मौत न हुई होती और कुछ दिन जख्मी हालत में इलाज के दौरान मौत होती तो क्या शहीद का दर्जा उन्हें न मिलता ?


प्रतापगढ़ में शहीदों के अलग-अलग मापदंड...

वाह रे, शासन-प्रशासन ! मान गये आपकी राजनीति को ! एक जवान के लिए इतना सारा प्रबन्ध, जबकि दूसरे जवान की कीमत आपको पता ही नहीं ! क्या यही है, हमारा निकम्मा प्रशासन और शासन ? क्या सिर्फ वोट बैंक के लिए ही सरकारें और राजनीतिक दल के नेता करते हैं, काम। प्रतापगढ़ के विधायक, सांसद और मंत्री इंसानियत का बहुत ही खूब सूरत फर्ज निभाया है जनप्रतिनिधियों की बची खुची कमी पूरी कर दिया प्रतापगढ़ का जिला प्रशासन मानवीय मूल्यों और आदर्शों की बातें करनी वाली विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा को अपने ऐसे कृत्यों के प्रति शर्मिन्दगी भी नहीं आई होगी। 


जिला प्रशासन ने शहीद चंद्रलोक तिवारी के लिए नहीं की कोई ब्यवस्था...

एक जिले में दो सेना के जवान शहीद होकर एक ही दिन पहुँचते हैं। एक का शव ताबूत में आता है और घर पर रखने की ब्यवस्था न होते हुए उसका पार्थिव शरीर मोर्चरी हाउस में राजकीय सम्मान के साथ उप जिलाधिकारी की मौजूदगी में रखवाया जाता है तो दूसरे जवान का शव साधारण तरीके से उसके पैतृक घर पहुँचता है। ऐसी ब्यवस्था से नफरत हो जाती है। दोगलेपन की भी एक सीमा होती है। कम से कम सेना के जवान की शहादत को तो राजनीति और वोटबैंक की तराजू पर चढ़ने से रोक लिए होते। शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की इस बेरुखी का जवाब उन्हें शहीद के परिजन तो अकेले नहीं दे सकेंगे, परन्तु उनकी आत्मा की पुकार ऐसे शासन-प्रशासन एवं जनप्रतिनिधियों की सत्ता का सत्यानाश करने के लिए पर्याप्त होगी। 


UP में शहीद चंद्रलोक तिवारी को मिली ब्राह्मण होने की सजा, नहीं मिला शहीद का दर्जा...


प्रतापगढ़ के लोग शासन-प्रशासन एवं जिले के पक्ष व विपक्ष के नेताओं से सवाल कर रहे हैं कि क्या चन्द्रलोक तिवारी सेना का जवान नहीं था ? क्या वह किसी का बाप, बेटा, भाई, देश का लाल नहीं था ? ऐसे शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को क्या संज्ञा दी जाय ? जिस देश में जाति देखकर सेना के जवानों की शहादत में राजकीय सम्मान और सुविधा दी जाती हो, उस देश का क्या होगा ? जनपद प्रतापगढ़ के कंधई थाना क्षेत्र के सरायनानकार में जन्मे साधारण किसान विजय नारायण तिवारी के चार पुत्रों में सबसे छोटे बेटे चंद्रलोक तिवारी, जिन्होंने देश सेवा के जज्बे के साथ भारतीय सेना में जाने का निर्णय लिया बचपन से ही मेधावी और मिलनसार स्वभाव के थे। चंद्रलोक तिवारी 20 वर्ष की उम्र में ही भारतीय सेना में नौकरी प्राप्त कर लिए थे 


शहीद पिता चन्द्रलोक का शव देखकर गुमसुम नजर आया ढाई वर्ष का बेटा,शिव...

इन दिनों चंद्रलोक राजस्थान के जोधापुर में तैनात थे। ड्यूटी के दौरान ही उनकी तबीयत खराब हो गई इनको मिलिट्री हॉस्पिटल में भर्ती किया गया हालत में सुधार न होने पर इलाज दिल्ली में चल रहा था 30 जुलाई को उन्होंने अंतिम सांस ली और शहीद हो गए इनके शहादत की खबर घर पर पहुंची तो परिजन अवाक रह गए कि उनकी पत्नी छोटे बच्चे, माता-पिता एवं भाई अपने लाल के खोने का दुःख सहन नहीं कर सके और बदहवास हो गए जैसे ही या खबर गांव में पहुंची लोग शहीद जवान के घर पर जमा होने लगे लगभग 48 घंटे के बाद शहीद जवान का पार्थिव शरीर शनिवार की देर रात उनके घर पहुंचा तो अंतिम दर्शन के लिए लोगों की भारी भीड़ उनके घर एकत्र होने लगी 


हर कोई शहीद जवान के अंतिम यात्रा में शामिल होना चाहता था। रात भर परिजन शहीद जवान के पार्थिव शरीर को पन्नी के सहारे बारिश से बचाने का प्रयास करते रहे सुबह 10:00 बजे परशुराम सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रदीप शुक्ल, प्रतापगढ़ के जिलाध्यक्ष अनिल पांडे एडवोकेट शहीद जवान को श्रद्धांजलि देने भीगते हुए पहुंचे उन्होंने श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद परिजनों को ढांढस बधाया। शहीद जवान के भाई वरुण तिवारी ने बताया कि देर रात मेरे भाई का पार्थिक शरीर घर पर आ गया था अभी तक मेरे घर पर जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन सहित जिले के जनप्रतिनिधियों में से कोई भी नहीं पहुंचा जिससे परिवार वाले अत्यंत ही दुखी हैं बारिश के बीच अपने निजी व्यवस्था से बस की छत पर रख कर अपने भाई के अंतिम संस्कार को प्रयागराज जाने को मजबूर दिखे  


शासन-प्रशासन से किसी तरह की सहायता नहीं मिली जिलाध्यक्ष अनिल पांडे एडवोकेट ने जिलाधिकारी व पुलिस कप्तान को फोन के माध्यम से जानकारी देते हुए परिजनों की समस्या को देखते हुए सरकारी एंबुलेंस उपलब्ध कराने का निवेदन किया उन्होंने तत्काल मदद का आश्वासन दिया लगभग 1:00 बजे तक इंतजार करने के बाद रानीगंज उपजिलाधिकारी के पहुंचने के बाद भी कुछ व्यवस्था नहीं हो सकी तो परिजन मजबूर होकर अंतिम यात्रा के लिए निजी साधन से प्रयागराज के लिए रवाना हुए। जिलाध्यक्ष अनिल पाण्डेय एडवोकेट ने उपजिलाधिकारी रानीगंज के सहित परिजनों की मांगों को संबोधित ज्ञापन सौंपा। अंतिम यात्रा से कुछ समय पहले प्रयागराज से आए सेना की बटालियन के अधिकारियों ने शहीद जवान को सलामी दी लोगों ने भारत माता की जय, चंद्रलोक तिवारी अमर रहे, वंदे मातरम के नारों के साथ अमर शहीद जवान को नमन आंखों से अंतिम विदाई दी हर कोई यह चर्चा करते हुए नजर आया कि जवानों की शहादत में भेदभाव क्यों हो रहा है ?   


सैनिक की शहादत और उसके सम्मान में भी होने लगा वोट बैंक की राजनीति...


सैनिक चंद्रलोक तिवारी को राजकीय सम्मान से इसलिए वंचित रहना पड़ा, क्योंकि इस समय सरकार की प्राथमिकता पिछड़ों का हमदर्द बताने की चल रही है। सरकार या उसके रणनीतिकारों को लगता है कि ब्राह्मणों पर भरोसा ठीक नहीं है यही कारण है कि चंद्रलोक तिवारी की अंतिम यात्रा से स्थानीय विधायक और सांसद भी नदारद रहे। लगता है विधानसभा चुनाव-2022 में विधायकों को ब्राह्मण मतदाताओं की जरुरत नहीं रह गई है। इसलिए उनके साथ ऐसा ब्यवहार जिले के विधायक, सांसद और मंत्री कर रहे हैं


एक शहीद के यहाँ डटे रहे डीएम, एसपी, सांसद और विधायक और दूसरे के यहाँ नहीं गया कोई... 


शहीद रितेश पाल को पचास लाख रुपए, परिवार के एक सदस्य को नौकरी एवं गाँव में शहीद जवान के नाम पर एक सड़क और चंद्रलोक तिवारी को फूटी कौड़ी भी नहीं...


शहीद रितेश पाल के लिए जहां गगनभेदी नारे लगे उनके परिजनों को 5000000/ पचास लाख रुपए राज्य सरकार ने देने की घोषणा की साथ ही साथ उनके परिवार में एक व्यक्ति को नौकरी देने की भी बात की गई और गाँव में एक सड़क शहीद के नाम पर बनाने की घोषणा स्वयं सूबे की योगी सरकार ने की वहीं जनपद में दूसरे जवान की शहादत पर शासन, प्रशासन और जनपद के विधायक, सांसद और मंत्री न तो संवेदना ब्यक्त किया और न ही शहीद के घर पहुँचकर परिजनों को सांत्वना दिया। अंतिम संस्कार में शामिल होना और श्रद्धांजलि देने की बात तो दूर रही। सेना के जवान चंद्रलोक तिवारी के लिए हमदर्दी के एक बोल भी नहीं, न तो शासन द्वारा और न ही स्थानीय प्रशासन की ओर से कोई पहल की गई। अंतिम यात्रा में जिस प्रकार से भेदभाव किया गया, उससे सरकार के दामन पर एक बार फिर ब्राह्मण विरोधी होने का दाग लग गया है, जो आसानी से छूटने वाला नहीं है।

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