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बुधवार, 18 अगस्त 2021

दंड प्रक्रिया सहिता में धारा-145 के अधीन पारित आदेश केवल पुलिस आदेश होता है तथा इसके अधीन टाइटल (हक) विषय स्थिति का विनिश्चय नहीं किया जाता है,परन्तु पुलिस अपना पिंड छुड़ाने के लिए सिविल मामले में भी सीआरपीसी (CrPC) की धारा- 145 करती है,कार्यवाही

आईये जाने सीआरपीसी की धारा-145क्या है...???


अचल संपत्ति को लेकर होने वाले विवाद में क्या हैं,कार्यपालक मजिस्ट्रेट की शक्तियां...???


दंड प्रक्रिया संहिता का दुरूपयोग...

दंड प्रक्रिया सहिता में “जहां भूमि या जल से संबद्ध विवादों से परिशांति भंग होना संभाव्य है,वहां प्रक्रिया“ का प्रावधान सीआरपीसी (CrPC) की धारा- 145 में किया गया है यहाँ हम आपको ये बताने का प्रयास करेंगे कि दंड प्रक्रिया सहिता (CrPC) की धारा- 145 किस तरह अप्लाई होगी ? दंड प्रक्रिया सहिता यानि कि CrPC की धारा 145 क्या है ? इसके सभी पहलुओं के बारे में विस्तार से यहाँ समझने का प्रयास करेंगे

CrPC (दंड प्रक्रिया संहिता की धारा ) की धारा 145 के अनुसार :- जहां भूमि या जल से संबद्ध विवादों से परिशांति भंग होना संभाव्य है, वहां सम्बन्धित थाने के प्रभारी द्वारा सीआरपीसी की धारा- 145 के अंतर्गत सम्बन्धित एसडीम के यहाँ रिपोर्ट प्रेषित की जाती है, जिसके बाद एसडीएम कोर्ट द्वारा सीआरपीसी (CrPC) की धारा- 145 की प्रक्रिया अपनाई जाती है। जिस पक्ष में शांति भंग की आशंका रहती है, उस पक्ष को नोटिस तामील करके सुनवाई के लिए एसडीम कोर्ट में तलब किये जाने की ब्यवस्था है

किसी स्थावर संपत्ति जैसे भूमि या जल को लेकर विवाद उत्पन्न होते रहते हैं। इससे उत्पन्न विवादों से समाज के भीतर शांति भंग होने और लोक व्यवस्था भंग होने का खतरा होता है। ऐसे खतरे से निपटने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता में धारा 145, 146, 147 का प्रावधान किया गया है। इस धारा में स्थावर संपत्ति विषयक विवादों के संबंध में जिससे लोक शांति भंग होने की संभावना हो, निस्तारण की प्रक्रिया का उल्लेख है। धारा 145 की उपधारा (1) के अनुसार इस संबंध में रिपोर्ट पर या किसी अन्य प्रकार से प्राप्त इत्तिला के आधार पर स्वयं का समाधान हो जाने पर कार्यपालक मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट/सूचना दी जा सकेगी।
इस धारा के अधीन कार्यवाही करने के लिए यह आवश्यक होगा कि भूमि या जल से संबंधित कोई विवाद ऐसा हो, जिससे लोक शांति भंग होने की संभावना है। कार्यपालक मजिस्ट्रेट अपनी शक्ति का उपयोग उस समय ही कर सकता है, जिस समय उस भूमि या जल से संबंधित किसी विवाद के कारण लोक शांति भंग हो जाने का बड़ा खतरा है। ऐसे मामले में कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा कोई न्यायिक निर्णय नहीं दिया जाता है, वास्तव में यह एक निवारक कार्य है, जिसके माध्यम से कार्यपालक मजिस्ट्रेट विवाद के कारण उत्पन्न होने वाली अशांति और लोक व्यवस्था के खराब होने के दुष्परिणाम से बचने के लिए उपयोग करता है।

धारा-145 दंड प्रक्रिया संहिता- फकीर चंद्र बनाम मानाराम एआईआर 1957 पंजाब 304 के मामले में कहा है- इस धारा का मूल उद्देश्य ऐसे विवादों का शीघ्रता से निपटारा करने के लिए प्रक्रिया निर्धारित करना है जो कि भूमि या जल से संबंधित है तथा जिनसे लोक शांति भंग होना संभव है। इस धारा के प्रयोजन के लिए दो मुख्य कारण हैं (1)- विवाद किसी स्थावर संपत्ति भूमि या जल से संबंधित होना चाहिए। (2)- उस विवाद से लोक शांति भंग होने की संभावना हो।

किसी स्थावर संपत्ति जैसे भूमि या जल को लेकर विवाद उत्पन्न होते रहते हैं। इससे उत्पन्न विवादों से समाज के भीतर शांति भंग होने और लोक व्यवस्था भंग होने का खतरा होता है। ऐसे खतरे से निपटने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता में धारा-145, 146, 147 का प्रावधान किया गया है। इस धारा में स्थावर संपत्ति विषयक विवादों के संबंध में जिससे लोक शांति भंग होने की संभावना हो, निस्तारण की प्रक्रिया का उल्लेख है। धारा-145 की उपधारा (1) के अनुसार इस संबंध में रिपोर्ट पर या किसी अन्य प्रकार से प्राप्त इत्तिला के आधार पर स्वयं का समाधान हो जाने पर कार्यपालक मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट/सूचना दी जा सकेगी।
इस धारा के अधीन कार्यवाही करने के लिए यह आवश्यक होगा कि भूमि या जल से संबंधित कोई विवाद ऐसा हो, जिससे लोक शांति भंग होने की संभावना है। कार्यपालक मजिस्ट्रेट अपनी शक्ति का उपयोग उस समय ही कर सकता है, जिस समय उस भूमि या जल से संबंधित किसी विवाद के कारण लोक शांति भंग हो जाने का बड़ा खतरा है। ऐसे मामले में कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा कोई न्यायिक निर्णय नहीं दिया जाता है, वास्तव में यह एक निवारक कार्य है, जिसके माध्यम से कार्यपालक मजिस्ट्रेट विवाद के कारण उत्पन्न होने वाली अशांति और लोक व्यवस्था के खराब होने के दुष्परिणाम से बचने के लिए उपयोग करता है। धारा-145 के अधीन जांचकर्ता कार्यपालक दंडाधिकारी को स्पष्ट रूप से तय करना चाहिए कि प्रथमिक आदेश के दिन यह प्राथमिक आदेश पारित किए जाने के पूर्व के 2 माह की अवधि में कौन सा पक्षकार आधिपत्य में था।

आधिपत्य का प्रश्न अधिपत्य धारण करने के अधिकार की वैधता से परे हटकर वास्तविक आधिपत्य होने के आधार पर हल किया जाना चाहिए। धारा-145 की जांच में कार्यपालक दंडाधिकारी को प्रकरण में प्रस्तुत सभी दस्तावेजों एवं शपथ पत्रों का अच्छे से परीक्षण अपने विवेक का पूर्ण प्रयोग करते हुए करना चाहिए। जहां विवादित भूमि या जल के संबंध में पक्षकारों के मध्य कोई विवाद सिविल न्यायालय में लंबित हो, ऐसी दशा में धारा-145 के अधीन कार्यवाही कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। जहां अचल संपत्ति के कब्जे के बारे में पक्षकारों में कोई विवाद किसी न्यायालय में लंबित हो तो उस दशा में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-145 के अधीन कार्यवाही विधि के अनुकूल नहीं है।

इस सिद्धांत का अर्थ यह है कि अचानक से उत्पन्न होने वाले विवाद में ही कार्यपालक मजिस्ट्रेट ऐसे किसी आदेश को धारा-145 के अंतर्गत जारी करें। यदि कोई विवाद पहले से ही न्यायालय में चल रहा है और उसके लिए सिविल प्रकरण लंबित है तो ऐसी परिस्थिति में कार्यपालक मजिस्ट्रेट को धारा-145 की कार्यवाही करना ठीक नहीं है। यदि फिर भी वह वैसी कार्यवाही करता है तो यह विधि के अनुकूल नहीं होगी। धारा-145 के अंतर्गत जारी आदेश को न्यायालय में चुनौती- दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-145 के अंतर्गत पारित किसी आदेश को किसी भी सेशन कोर्ट में अथवा हाईकोर्ट में चुनौती दी जाती है तो ऐसी चुनौती पुनरीक्षण के लिए रखी जाएगी। पीड़ित पक्षकार सिविल न्यायालय में सिविल वाद दायर करके भी उपचार प्राप्त कर सकता है।

यदि कोई विवाद ऐसा है, जिसमें लोक शांति भंग होने की संभावना नगण्य है तो ऐसी परिस्थिति में धारा-145 का उपयोग नहीं किया जा सकता। धारा-145 का उपयोग तब ही किया जा सकता है, जब किसी भूमि या स्थावर संपत्ति के विवाद से प्रबल लोक शांति भंग हो जाने का खतरा है। समाज में किसी स्थावर संपत्ति को लेकर अनेक ऐसे विवाद सामने आते हैं, जिनके कारण लोक शांति भंग हो जाने की प्रबल संभावना होती है। जैसे किसी खेत के कब्जे को लेकर दो पक्षकार आपस में भिड़ गए और भिड़ंत से समाज में भय फैल जाना तथा हिंसा हो जाना तय है तो ऐसी विपत्ति से निपटने के लिए ही कार्यपालक मजिस्ट्रेट को यह शक्ति दी गई है।

(1) जब कभी किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट का, पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट से या अन्य इत्तिला पर समाधान हो जाता है कि उसकी स्थानीय अधिकारिता के अंदर किसी भूमि या जल या उसकी सीमाओं से संबद्ध ऐसा विवाद विद्यमान है, जिससे परिशांति भंग होना संभाव्य है, तब वह अपना ऐसा समाधान होने के आधारों का कथन करते हुए और ऐसे विवाद से संबद्ध पक्षकारों से यह अपेक्षा करते हुए लिखित आदेश देगा कि वे विनिर्दिष्ट तारीख और समय पर स्वयं या प्लीडर द्वारा उसके न्यायालय में हाजिर हों और विवाद की विषयवस्तु पर वास्तविक कब्जे के तथ्य के बारे में अपने-अपने दावों का लिखित कथन पेश करें।

(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए “भूमि या जल” पद के अंतर्गत भवन, बाजार, मीनक्षेत्र, फसलें, भूमि की अन्य उपज और ऐसी किसी संपत्ति के भाटक या लाभ भी हैं।

(3) इस आदेश की एक प्रति की तामील इस संहिता द्वारा समनों की तामील के लिए उपबंधित रीति से ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों पर की जाएगी, जिन्हें मजिस्ट्रेट निदिष्ट करे और कम से कम एक प्रति विवाद की विषयवस्तु पर या उसके निकट किसी सह्जदृश्य स्थान पर लगाकर प्रकाशित की जाएगी।

(4) मजिस्ट्रेट तब विवाद की विषयवस्तु को पक्षकारों में से किसी के भी कब्जे में रखने के अधिकार के गुणागुण या दाबे के प्रति निर्देश किए बिना उन कथनों का, जो ऐसे पेश किए गए हैं, परिशीलन करेगा, पक्षकारों को सुनेगा और ऐसा सभी साक्ष्य लेगा जो उनके द्वारा प्रस्तुत किया जाए, ऐसा अतिरिक्त साक्ष्य, यदि कोई हो लेगा जैसा वह आवश्यक समझे और यदि संभव हो तो यह विनिश्चित करेगा कि क्या उन पक्षकारों में से कोई उपधारा (1) के अधीन उसके द्वारा दिए गए आदेश की तारीख पर विवाद की विषयवस्तु पर कब्जा रखता था और यदि रखता था तो वह कौन सा पक्षकार था

परंतु यदि मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि कोई पक्षकार उस तारीख के, जिसको पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट या अन्य इत्तिला मजिस्ट्रेट को प्राप्त हुई, ठीक पूर्व दो मास के अंदर या उस तारीख के पश्चात् और उपधारा (1) के अधीन उसके आदेश की तारीख के पूर्व बलात् और सदोष रूप से बेकब्जा किया गया है तो वह यह मान सकेगा कि उस प्रकार बेकब्जा किया गया पक्षकार उपधारा (1) के अधीन उसके आदेश की तारीख को कब्जा रखता था।

(5) इस धारा की कोई बात, हाजिर होने के लिए ऐसे अपेक्षित किसी पक्षकार को या किसी अन्य हितबद्ध व्यक्ति को यह दर्शित करने से नहीं रोकेगी कि कोई पूर्वोक्त प्रकार का विवाद वर्तमान नहीं है या नहीं रहा है और ऐसी दशा में मजिस्ट्रेट अपने उक्त आदेश को रद्द कर देगा और उस पर आगे की सब कार्यवाहियां रोक दी जाएंगी, किंतु उपधारा (1) के अधीन मजिस्ट्रेट का आदेश ऐसे रद्दकरण के अधीन रहते हुए अंतिम होगा।

(6) (क) यदि मजिस्ट्रेट यह विनिश्चय करता है कि पक्षकारों में से एक का उक्त विषयवस्तु पर ऐसा कब्जा था या उपधारा (4) के परंतुक के अधीन ऐसा कब्जा माना जाना चाहिए तो वह यह घोषणा करने वाला कि ऐसा पक्षकार उस पर तब तक कब्जा रखने का हकदार है, जब तक उसे विधि के सम्यक् अनुक्रम में बेदखल न कर दिया जाए और या निषेध करने वाला कि जब तक ऐसी बेदखली न कर दी जाए, तब तक ऐसे कब्जे में कोई विघ्न न डाला जाए, आदेश जारी करेगा और जब वह उपधारा (4) के परंतुक के अधीन कार्यवाही करता है तब उस पक्षकार को, जो बलात् और सदोष बेकब्जा किया गया है, कब्जा लौटा सकता है।

(ख) इस उपधारा के अधीन दिया गया आदेश उपधारा (3) में अधिकथित रीति से तामील और प्रकाशित किया जाएगा।

(7) जब किसी ऐसी कार्यवाही के पक्षकार की मृत्यु हो जाती है, तब मजिस्ट्रेट मृत पक्षकार के विधिक प्रतिनिधि को कार्यवाही का पक्षकार बनवा सकेगा और फिर जांच चालू रखेगा और यदि इस बारे में कोई प्रश्न उत्पन्न होता है कि मृत पक्षकार का ऐसी कार्यवाही के प्रयोजन के लिए विधिक प्रतिनिधि कौन है तो मृत पक्षकार का प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले सब व्यक्तियों को उस कार्यवाही का पक्षकार बना लिया जाएगा।

(8) यदि मजिस्ट्रेट की यह राय है कि उस संपत्ति की, जो इस धारा के अधीन उसके समक्ष लंबित कार्यवाही में विवाद की विषयवस्तु है कोई फसल या अन्य उपज शीघ्रतया और प्रकृत्या क्षयशील है तो वह ऐसी संपत्ति की उचित अभिरक्षा या विक्रय के लिए आदेश दे सकता है और जांच के समाप्त होने पर ऐसी संपत्ति के या उसके विक्रय के आगमों के व्ययन के लिए ऐसा आदेश दे सकता है, जो वह ठीक समझे।

(9) यदि मजिस्ट्रेट ठीक समझे तो वह इस धारा के अधीन कार्यवाहियों के किसी प्रक्रम में पक्षकारों में से किसी के आवेदन पर किसी साक्षी के नाम समन यह निदेश देते हुए जारी कर सकता है कि वह हाजिर हो या कोई दस्तावेज या चीज पेश करे।

(10) इस धारा की कोई बात धारा-107 के अधीन कार्यवाही करने की मजिस्ट्रेट की शक्तियों का अल्पीकरण करने वाली नहीं समझी जाएगी।

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