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रविवार, 1 अगस्त 2021

उत्तर प्रदेश की राजनीति में कल्याण सिंह के बाद भाजपा में ब्राह्मणों की स्थिति हो गई बद से बद्तर

विधानसभा चुनाव की शंखनाद बजने से पहले ही राजनीतिक दलों की बज जाती हैं,पुंगी...!!!


UPमें ब्राह्मण मतदाताओं को रिझाने के लिए अपनाये जा रहे हैं,सभी राजनैतिक दलों द्वारा नए-नए फार्मूले...!!! 


उत्तर प्रदेश की सियासत में ब्राह्मणों का वजूद...

उत्तर प्रदेश की सियासत में आजादी के बाद से ही ब्राह्मण और क्षत्रियों में बुनियादी तौर पर मतभेद रहा। आपस में सामाजिक तौर पर घनिष्ठ रहे, परन्तु सियासत में आमने-सामने रहे। अस्सी के दशक में कांग्रेस इन दोनों जातियों को साधने के चक्कर में दोनों से उपेक्षित हो गयी। विश्वम्भर नाथ पाण्डेय और वीपी सिंह के बीच प्रतिस्पर्धा रही हो या वीर बहादुर सिंह और नारायण दत्त तिवारी के बीच सियासी उठापटक रहा हो। यह सब इस तथ्य की पुष्टि करता है। मंडल और कमंडल के बाद उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण व क्षत्रिय भाजपा के साथ चले गए। राम मंदिर आंदोलन के बाद कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री की कुर्सी का परित्याग करके दोनों जातियों में अमिट छवि बना ली। 


BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अमित शाह वर्ष-2017में ब्राह्मण मतों को पाने के लिए की थी,नौटंकी...

कलराज मिश्र ब्राह्मणों को साधते तो राजनाथ सिंह क्षत्रियों के नेता रहे। व्यापारी वर्ग भाजपा का बुनियादी वोट रहा। कल्याण सिंह स्वयं अति पिछड़ों के बड़े नेता रहे। अंततः इक्कीसवीं सदी के लगते ही कल्याण सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी में मतभेद हुआ तो उत्तर प्रदेश की सियासत से कल्याण सिंह गायब हुए और केंद्र की सियासत से अटल बिहारी वाजपेयी भी गायब हो गए। राजनाथ सिंह के मुख्यमंत्री बनते ही ब्राह्मण और क्षत्रिय पुनः दो रास्ते के राही बनने की तरफ अग्रसर हुए। विधान सभा चुनाव में बीजेपी बहुमत न पा सकी। बसपा और भाजपा की गठबंधन की सरकार बनी। मायावती ने कुंडा के बाहुबली विधायक रघुराज प्रताप सिंह "राजा भईया" पर राष्ट्रद्रोह के लिए बने कानून "पोटा" लगाकर स्वयं को डिक्टेटर घोषित करने से पीछे न रही। 


चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मत पाने के लिए सभी दल परेशान हैं...

राजनाथ सिंह दिल्ली जाते इस इरादे से कि मायावती से समर्थन वापस ले लिया जाए, लेकिन वाजपेयी जी से कुछ कह न पाते और पैर छूकर चले आते। अन्ततः क्षत्रियों पर मायावती की अति के बाद राजनाथ सिंह के प्रयास से बीजेपी ने बसपा से समर्थन वापस ले लिया। उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग गया। कुछ समय बाद प्रधानमंत्री की उदारता के कारण सपा मुखिया मुलायम सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के लिए विधानसभा अध्यक्ष केसरी नाथ त्रिपाठी के कन्धों पर इसकी जिम्मेवारी सौंपी विधानसभा अध्यक्ष केसरी नाथ त्रिपाठी की वजह से मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। उन्होंने राजा भईया के ऊपर से पोटा हटाया और अमर सिंह और राजा भईया के कारण क्षत्रिय सपा से जुड़ गए और वर्ष- 2004 के लोकसभा चुनाव में सपा ने उत्तर प्रदेश में पैंतीस सीट और उत्तराखंड में एक सीट पर सफलता पायी। राजनाथ सिंह ब्राह्मण क्षत्रियों को एकजुट करने में नाकाम रहे। 


उत्तर प्रदेश में सीएम की कुर्सी पाने को हैं,सारे दल के नेता वेताब...

अटल बिहारी वाजपेयी ने जो कल्याण सिंह के साथ किया, वही उनके भी साथ हो गया और उन्होंने राजनीति को अलविदा कह दिया। ब्राह्मणों ने लोकसभा चुनाव- 2004 में भाजपा को ही वोट दिया था, मगर क्षत्रियों को सपा में देखकर और इसका हिसाब चुकाने के लिए वर्ष- 2007 के विधानसभा चुनाव में सतीश चंद्र मिश्र की तमाम रैलियां देखकर बसपा की सोशल इंजीनियरिंग को चार चांद लगा दिया। मायावती मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन सतीश चंद्र मिश्र राजनीति के पटल से गायब हो गए। उन्होंने मात्र अपना व्यक्तिगत हित ही साधने में पांच वर्ष बिताया। उन्होंने माता के नाम पर विश्वविद्यालय बनवाया और रिश्तेदारों को न्यायालय में डेलीगेट बनवाया तो मायावती मूर्ति बनवाने में व्यस्त रहीं। लोकसभा चुनाव- 2009 में ब्राह्मण विभाजित रहा, परन्तु कांग्रेस के साथ अधिक मात्रा में रहा। मगर कांग्रेस भी उसे सहेजने में असफल रही। 

UPब्राह्मणों की योगी सरकार से नाराजगी...

वहीं उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव वर्ष- 2012 में ब्राह्मणों ने अपनी जाति के प्रत्याशियों को अधिक महत्व दिया, ब्राह्मण जिस भी दल से उम्मीदवार रहा, उसे ब्राह्मण मतदाताओं ने सर्वोपरी स्थान देते हुए अपना मतदान उसके पक्ष में किया, जिसका परिणाम यह रहा कि हर पार्टी से ब्राह्मण प्रत्याशी विजयी हुए। युवाओं ने अखिलेश यादव पर अधिक भरोसा जताया था। सपा के चुनावी वादों पर उत्तर प्रदेश के युवा लट्टू हो गए और झूम कर मतदान किया। इस तरह सपा को प्रचंड बहुमत मिला और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी। वर्ष- 2012 के चुनाव के दौरान मैंने एक ब्राह्मण लड़के से पूंछा कि किसे वोट दोगे तो उसने बताया कि जब एक बटन दबाने से लैपटॉप मिलने वाला हो तो आखिर हम किसे वोट देंगे ? वर्ष-2012 में क्षत्रिय मतदाताओं का रुझान भी अधिकतर सपा के पक्ष में रहा, उन्होंने सपा का परित्याग नहीं किया था। देश में मोदी लहर गति ले रही थी, कांग्रेस के विरुद्ध पूरे देश में शोर था। 


UP में योगी सरकार से नाराज है,ब्राह्मण...

भाजपा के पास उत्तर प्रदेश में कोई जनाधार नहीं था। क्षेत्र में न ही कोई नेता सक्रिय था और न ही बूथ पर भाजपा के लिए मतदान दिलाने वाला कार्यकर्ता ही था। अचानक मोदी के नाम पर उत्तर प्रदेश की जनता मोदीमय हो गयी। लोकसभा चुनाव- 2014 में ब्राह्मण, क्षत्रिय समेत समस्त हिन्दू (यादव, जाटव को छोड़कर) भाजपाई हो गए। मुस्लिम मतदाता सपा, बसपा और कांग्रेस में विभाजित हो गए। भाजपा की चहुँओर जय-जयकार होने लगी। बसपा को शून्य सीट, कांग्रेस को दो सीट और सपा को पांच सीट ही मिल सकी। अपना दल ने भी भाजपा के सहयोग से दो सीट जीत लिया था। शेष समस्त सीट भाजपा जीत गयी। इस तरह उत्तर प्रदेश की बदौलत नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। उत्तर प्रदेश में वर्ष-2017 का विधानसभा चुनाव बगैर चेहरे के नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लड़ा गया और ब्राह्मण बीजेपी के साथ रहा। चुनाव में भाजपा सवा तीन सौ सीट जीत गयी। 


BJP के किरायेदार ब्राह्मण नेता से उत्तर प्रदेश में कितना प्रभावित होता है,ब्राह्मण मतदाता...


चुनाव परिणाम बाद भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने आरएसएस के दबाव में हिंदुत्व छवि के रूप में ख्याति प्राप्त  गोरक्षनाथ पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ जी को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया। केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा उपमुख्यमंत्री बने। लोकसभा चुनाव वर्ष- 2019 में भी ब्राह्मण भाजपा के साथ रहा और नरेंद्र मोदी ने सत्ता में वापसी की। विधानसभा चुनाव के लिहाज से क्या महंत योगी आदित्यनाथ जी ब्राह्मण, क्षत्रियों को एकजुट करने में सफल रहे हैं अथवा राजनाथ सिंह का इतिहास दुहराया है ? जो गलती बीजेपी ने वर्ष- 2003 के दौर में की थी, उसे क्षत्रिय के लिहाज से दोहराना नहीं चाहती थी इसलिए काफी हंगामे के बाद भी मुख्यमंत्री परिवर्तन नहीं किया। जिससे कि क्षत्रिय बीजेपी में बना रहे। मगर क्या ब्राह्मण को खुश करने में भाजपा सफल रही है ? इसका परिणाम तो बस कुछ महीने में ज्ञात होने वाला है। 


उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव-2022 में क्या हो पायेगी योगी की वापसी...

मगर ऐसा प्रतीत होता है कि जिस तरह से कल्याण सिंह ने भाजपा में सभी को एकजुट किया था, उस तरह से एकजुट करने में योगी आदित्यनाथ सफल नहीं रहे हैं। राजनाथ सिंह की कुछ गलतियों को दोहराया गया है। अब देखना होगा कि उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण मतदाता योगी आदित्यनाथ जी में एक हिंदूवादी नेता की छवि देखते हैं कि उनके संन्यासी बनने के पूर्व की जाति देखते हैं। वर्ष- 2014, 2017 और वर्ष- 2019 के चुनाव में ब्राह्मणों ने सपा, बसपा और कांग्रेस के ब्राह्मण प्रत्याशियों को भी नकार दिया था मगर वर्ष- 2022 के चुनाव में अपनी जाति के ही प्रत्याशियों को अधिक तवज्जो दे सकते हैं। इस वक़्त सपा और कांग्रेस ब्राह्मण प्रेम दिखाने में व्यस्त हैं तो सतीश चंद्र मिश्र पुनः वर्ष- 2007 वाली काठ की हांडी जगह-जगह चढ़ा रहे हैं। जबकि यह विदित है कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है, मगर जहाँ अन्य पार्टियों से ब्राह्मण प्रत्याशी नहीं होगा, वहाँ बसपा के ब्राह्मण प्रत्याशी को तवज्जों मिल सकता है।


उत्तर प्रदेश की सत्ता पाने को बेकरार हैं, योगी, अखिलेश, प्रियंका और माया...

भाजपा पहले हिंदुत्व कार्ड खेलकर सभी हिन्दुओं के एक मंच पर लाने में सफल रही और वर्ष-2014 से अभी तक अपनी प्रत्येक चाल में सफल रही। भाजपा में चाणक्य की भूमिका का निर्वहन करने वाले देश के गृहमंत्री अमित शाह जो पीएम मोदी के अति करीबियों में से हैं। मोदी के राजनीति से विदा होने की दशा में अमित शाह स्वयं को उनका उत्तराधिकारी समझते हैं। लोकसभा चुनाव-2019 के पहले पीएम मोदी ने सुप्रीम कोर्ट से एससी/एसटी कानून को खत्म करने के बाद पुनः संसद के दोनों सदनों से पारित कर अगड़ी और पिछड़ी जातियों के लिए देश की सर्वोच्च अदालत से खत्म हुई कोढ़ को जीवित करने से देश की जनता में पीएम मोदी और भाजपा से नाराजगी बढ़ी थी। पीएम मोदी ने दलित वोटबैंक को साधने के लिए यह सब किया और जब सवर्णों में नाराजगी बढ़ी तो 10%गरीब सवर्णों को आरक्षण देकर उनके जख्मों पर मलहम लगाने का कार्य किया। इसीबीच पुलवामा घटना हुई तो देश में राष्ट्रवाद की आँधी चल पड़ी और उस आँधी में मोदी लोकसभा चुनाव-2019 में प्रचंड बहुमत पाकर फिर से प्रधानमंत्री बन गए 


NEET में OBC को आरक्षण देना भाजपा को कहीं UPचुनाव में भारी न पड़ जाए...

देश में पांच विधानसभाओं के बाद उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड और पंजाब आदि राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और देश के पीएम मोदी ने एक बार वही गलती फिर से दोहराई है। एससी/एसटी कानून को पुनः लागू करने से सवर्ण जाति के लोगों के पीठ पर लात लगा था, परन्तु NEET में OBC को आरक्षण देकर पीएम मोदी ने सवर्णों के बच्चों के पेट पर लात मारा है जिसे सवर्ण जाति आसानी से नहीं भूल सकती। भाजपा हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को लेकर चलती थी और उसका ध्वज वाहक आरएसएस हुआ करता था। परन्तु मोदी-शाह की जोड़ी ने हिंदुत्व के साथ-साथ भाजपा में पिछड़ी जाति का बोलबाला स्थापित करके पूरे देश में पिछड़ी जातियों का डंका बजवाना चाहते हैं और सवर्ण जाति के नेता उनके पिछलग्गू बनकर जयकारा लगाते रहे। अब यह चाल पीएम मोदी को कहीं पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की तरह भारी न पड़ जाए। 


मोबाइल में ठिठोली करती मोदी-शाह की जोड़ी का दांव कहीं UPमें उल्टा न पड़ जाए...

वर्तमान में मोदी-शाह की जोड़ी को यह लगने लगा है कि बसपा और सपा दोनों क्षेत्रीय पार्टियां हैं और दोनों में सवर्ण जाति के मतदाता अपना ठौर नहीं बना सकते कांग्रेस में नेतृत्व का अभाव है और अंततः भाजपा में मतदान करना सवर्णों की मजबूरी है। इसी का फायदा भाजपा और वर्तमान मोदी-शाह की जोड़ी उठाना चाहती है। परन्तु मोदी-शाह की जोड़ी को यह भी नहीं भुलाना चाहिए कि सवर्णों में ब्राह्मण को प्रबुद्ध वर्ग माना गया है। जब ब्राह्मण खाने को नहीं पाता तो वह उसे अड़ा यानि गिरा देता है अर्थात न खुद खाता है और न ही दूसरे को खाने देता है। देश के गृहमंत्री अमित शाह अपने को यदि राजनीति का चाणक्य समझते हैं तो उन्हें याद रखना चाहिए कि चाणक्य भी ब्राह्मण था और वह नंद वंश का सत्यानाश करने की प्रतिज्ञा की थी, जिसे वह साकार करके ही दम लिया था नन्द वंश का अंत और मौर्य वंश की स्थापना करने पर ही कौटिल्य को चाणक्य की उपाधि मिली थी। इस बार उत्तर प्रदेश के चुनाव में असल में चाणक्य की भूमिका में ब्राह्मण ही होगा फिलहाल वर्ष- 2022 चुनाव परिणाम ब्राह्मणों की सियासत का महत्वपूर्ण परिणाम होगा कि ब्राम्हणों का भविष्य में उत्तर प्रदेश की सियासत में क्या ठौर होगा...??? 


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