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गुरुवार, 29 जुलाई 2021

साधना का अर्थ है, स्वयं के स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के लिए, राष्ट्र के लिए त्याग करना- सेवानिधी गौरांग दास जी महराज

धर्म आवरण नहीं आचरण है। धर्मं चर्चा नहीं चर्या है। अर्थात अपने सनातन धर्म को अपने जीवन के दैनिक चर्या में लागू करना चाहिए- सेवानिधी गौरांग दास, श्री श्री जगन्नाथ मंदिर ग्राम:- गोईं, पट्टी प्रतापगढ़...!!!


सेवानिधी गौरांग दास जी महराज.... 

त्याग बिना साधना की पूर्ति नहीं हो सकती। त्याग से ही तपस्या का रास्ता प्रशस्त होता है। इसलिए जीवन में प्रत्येक ब्यक्ति को अपने मन में त्याग की भावना रखनी चाहिए। ताकि जीवन का असली आनंद प्राप्त हो सके। जीवन में त्याग कई तरह से किया जा सकता है। मोह, माया का त्याग, धन का त्याग, परिवार का त्याग और जीवन में भौतिकतावाद का त्याग एवं भोग विलास के जीवन से त्याग करने वाले भी इस धरती पर बहुत सारे ब्यक्ति हैं, जिनके लिए जीवन में त्याग ही उनका जीवन होता है।  


जीवन में वस्त्रों का त्याग साधना नहीं हो सकता, लेकिन किसी वस्त्रहीन को देखकर अपना वस्त्र देकर उसके तन को ढक देना यह अवश्य साधना है। ऐसे ही भोजन का त्याग भी साधना नहीं है किसी भूखे की भूख मिटाने के लिए भोजन का त्याग ही साधना है। साधना का अर्थ है, स्वयं के स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के लिए, राष्ट्र के लिए त्याग करना। दूसरों के लिए विष तक पी जाने की भावना के कारण ही तो भगवान शिव महादेव बने। जो स्वयं के लिए जीये वो देव जो सबके लिए जीये वो महादेव। आज का आदमी धर्म को जीने की बजाय खोजने में लगा है। धर्म न तो सुनने का विषय है न बोलने का सुनते-बोलते धर्ममय हो जाना है।  


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