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बुधवार, 30 जून 2021

जिला पंचायत अध्यक्ष पद हेतु खरीद फरोख्त वाले निर्वाचन में कब होगा सुधार ?

देश में महज कहने के लिए समानता का अधिकार है, असल में हर जगह असमानता ही असमानता दिखा करता है...!!!


सूबे के 53जिलों में जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए सदस्यों की खरीद फरोख्त में लाखों करोड़ों रुपये किये जा रहे हैं,खर्च...!!!


राज्य निर्वाचन आयोग में कब होगा निर्वाचन प्रक्रिया में सुधार...!!!


देश में निर्वाचन के लिए दो ब्यवस्थाएं  हैं। लोकसभा और विधानसभा एवं विधान परिषद् के चुनाव के लिए भारत निर्वाचन आयोग का गठन किया गया है और प्रत्येक राज्य में एक मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पद का सृजन किया गया है और प्रत्येक जिले में जिला निर्वाचन कार्यालय की स्थापना की गई है। जिलाधिकारी ही जिला निर्वाचन अधिकारी के दायित्वों का निर्वहन करता है। जिला निर्वाचन कार्यालय पर एक सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी की तैनाती होती है। निर्वाचन कार्यालयों की दयनीय दशा देखकर तरस आता है


जिस दफ्तर से लोकसभा और राज्यसभा एवं विधानसभा और विधान परिषद् सदस्य निर्वाचित होते हों और वही सदस्य सरकार बनाते हों ! उन कार्यालयों की दयनीय दशा से इन माननीयों का कोई लेना लादना नहीं रहता। सच तो यह है कि चुनाव के समय भी जो नेता चुनाव लड़ता है वह कभी चुनाव कार्यालय नहीं जाता। चुनाव कार्यालय जाता है तो उसका चुनाव संचालन करने वाला चुनाव अभिकर्ता जाते हैं। इसलिए इन माननीयों को चुनाव कार्यालयों की दशा और दिशा का ज्ञान ही नहीं पाता। फिर जिस माननीय को यह भी न पता हो कि जिस दफ्तर ने उसे माननीय बनने का प्रमाण पत्र दिया है उसकी दशा अति दयनीय है


उत्तर प्रदेश के 75 जिले में 35 जिले ऐसे हैं, जहाँ एक अदद सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी की तैनाती तक नहीं है। जिला निर्वाचन कार्यालयों में जितने पदों का सृजन किया गया है उसके आधे पदों पर राज्य सरकारें तैनाती नहीं कर पाती और किसी तरह से रो धोकर कार्य संपादित होता है। कई जनपद तो ऐसे हैं जहाँ पर विना सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी की तैनाती किये ही बाबुओं के भरोसे वर्ष-2017 का विधानसभा और वर्ष-2019 का लोकसभा चुनाव संपन्न कराया गया। अब वर्ष-2022 का विधानसभा चुनाव होना है और अभी भी ऐसे बहुत से जनपद हैं जहाँ पर सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी की तैनाती नहीं की जा सकी है। आधे अधूरे पटल प्रभारी बीसों बरस से फेविकोल लगाकर कुर्सी से चिपके हुए हैं। उन्हें कोई पूँछने वाला नहीं है


भारत का संविधान दुनिया के सभी देशों से बड़ा है और संसदीय लोकतंत्र की परम्परा का हिमायती है। देश के अंदर प्रत्येक वर्ष कोई न कोई चुनाव सम्पन्न होते हैं, फिर भी देश की 75फीसदी जनता को यह भी पता नहीं होता कि जिस चुनाव में वह मतदान कर रहा है वह कौन सा चुनाव है ? 75 वर्ष की स्वतंत्रता के बाद शिक्षा के बढ़ते स्तर ने यह छोटी सी खाईं को पाट न सका। ये तो रही बात भारत निर्वाचन आयोग की ! अब बात करते हैं राज्य निर्वाचन आयोग उत्तर प्रदेश की ! प्रत्येक राज्य में राज्य निर्वाचन आयोग का गठन राज्य सरकार करती है और राज्य निर्वाचन का कार्य राज्य में निकाय और पंचायत का निर्वाचन कराना होता है। राज्य निर्वाचन आयोग तो राज्य सरकार के हाथ की कठपुतली होकर रह गई है। अपनी जेब का रिटायर्ड नौकरशाह राज्य निर्वाचन आयोग का मुख्य निर्वाचन आयुक्त बना दिया जाता है और राज्य सरकार के इशारे पर नाचता है


ऐसी ब्यवस्था जानबूझकर सरकारें करती हैं। भारत निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पद पर टी एन शेशन जब आसीन हुए तो वह केंद्र की सरकार और राज्य की सरकारों को इस बात का एहसास कराये कि संवैधानिक संस्था भारत निर्वाचन आयोग के पास कितनी शक्ति विद्यमान है ? टी एन शेशन के बाद फिर तो भारत निर्वाचन आयोग पुनः अपने ढर्रे पर चल पड़ा। आज भी वैसे चल रहा है। उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव सम्पन्न होने के बाद अब जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए नामांकन प्रक्रिया सम्पन्न हो चुकी है। 3 जुलाई को मतदान होना है। 75 जनपदों में से 22 जनपदों में निर्विरोध की प्रक्रिया सम्पन्न हुई। शेष 53 जनपदों में चुनाव होना है। खुलेआम सदस्यों की खरीद फरोख्त का कार्य चाल रहा है। एक सदस्य को 10 से 15लाख रूपये तक देकर अपने पक्ष में किया जा रहा है


आयकर विभाग और ED प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारीगण कुम्भकरनी नींद में सोये हुए हैं। कहीं कोई छापेमारी नहीं की जा रही है। जबकि जिला पंचायत सदस्यों की खरीद फरोख्त दिन रात की जा रही है। यही देश के स्वस्थ लोकतंत्र की असलियत है। वैसे तो देश में न्यायपालिका की सर्वोच्च संस्था सुप्रीम कोर्ट है जो ऐसे मामले में स्वतः संज्ञान लेकर नोटिस जारी करती है और अपना निर्णय सुनाकर देश की जनता को यह एहसास कराती है कि देश में कोई गलत कार्य नहीं होने दिया जायेगा। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव होने के बाद जिला पंचायत अध्यक्ष और क्षेत्र पंचायत प्रमुख पद के चुनाव में जिस तरह अंधेरगर्दी शासन सत्ता द्वारा करके कुर्सी पर कब्जा किया जाता है वह स्वस्थ लोकतंत्र को शर्मशार करता है। फिर यह मुद्दा उठता है कि जिला पंचायत अध्यक्ष और प्रमुख पद का चुनाव भी निकाय के चुनाव सरीखे सीधे जनता से कराया जाएगा, परन्तु यह बातें कुछ ही दिनों में समाप्त हो जाती हैं

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