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गुरुवार, 10 जून 2021

नेताओं को नहीं रहता मान-सम्मान और मर्यादा का ध्यान, सिर्फ पद प्रतिष्ठा और धन कमाने की रहती है,लालसा

समाज और देश की सेवा के लिए लोग जनसेवा को अपना कैरियर बना लिए हैं और उसी जनसेवा को समाजसेवा का नाम देकर जनता के हितों की बड़ी-बड़ी बातें करके जनता के विकास के लिए आये धन को बिना डकार लिए हजम कर लेना ही नेता का पहला गुण होता है। साथ ही नेता का दूसरा गुण जिसका लेना कभी न देना क्या इस जग में फिर आना है...!!!


जिला पंचायत अध्यक्ष पद और ब्लॉक प्रमुख पद के लिए सदस्यों पर पार्टी और दावत के नाम पर खर्च करने वाले उम्मीदवारों और उनके दलों के नेताओं से ऑर्डर पाने के बाद पहले उनसे 25 फीसदी धनराशि एडवांस में और कार्यक्रम खत्म होने से पहले उनसे पूरी धनराशि जमा करा लेना ही ब्यवसायिकों के लिए बेहतर होगा। नहीं तो कार्यक्रम खत्म होने के बाद आयोजक को ढूढ़ते रह जाओगे। चुनाव में उनकी जीत होती है तो संकोच में उनसे धन माँगने के लिए सोचना पड़ता है कि नेताजी कहीं नाराज न हो जाएं और नाराज होकर उसका नुकसान न करने लगे कहीं नेताजी हार जाते हैं तो संकोच में अपना ही धन मांगने में हिचकिचाहट होती है कि नेताजी चुनाव में शिकस्त खाएं हैं, कैसे इनसे तकादा करें ? इसी उहापोह में एक ब्यवसायी नेताजी के चक्कर लगाने के लिए विवश होता है क्योंकि आधुनिक नेता भी वह कहावत चरितार्थ करने में पीछे नहीं रहते कि भये बियाह मोर करब्या क्या...???

नेताओं का बिगड़ता मिजाज़... 

पूरे सूबे में जिला पंचायत अध्यक्ष पद और ब्लॉक प्रमुख पद का चुनाव होना है और इस चुनाव में जिला पंचायत सदस्य अपने जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। इसी तरह बीडीसी यानि क्षेत्र पंचायत सदस्य अपने प्रमुख का चुनाव करते हैं। इन सदस्यों की सेवा चुनाव संपन्न होने तक इतनी की जाती है कि लोग अपने दामाद और बहनोई की उतनी सेवा नहीं करते। सेवा के साथ-साथ मेवा और पूरे चुनाव में हुए खर्च को जोड़कर मय सूत ब्याज सहित अगले पांच वर्ष तक चुप रहने के लिए एक निर्धारित धनराशि भी दी जाती है। चुनाव परिणाम बाद जिला पंचायत अध्यक्ष और प्रमुख फिर आवंटित बजट पर डकैती डालने का कार्य शुरू करते हैं तो पांच वर्ष तक यह खेल शुरू रहता है। एक तरह से यह कहना गलत न होगा कि यदि 2 करोड़ रूपये लगाकर कोई जिला पंचायत अध्यक्ष बनता है तो वह 20 करोड़ रूपये उसी जिला पंचायत से कमाता भी है। ठीक इसी तरह 50लाख से 1करोड़ खर्च कर कोई प्रमुख बनता है तो पांच वर्ष में वह उसी विकास खण्ड से 5 करोड़ रूपये वसूलता है। 


जिला पंचायत और ब्लॉक पर कब्जा जमाने के लिए विधायक, सांसद और मंत्री तक अपनी इज्जत, मान सम्मान और मर्यादा सबकुछ दाँव पर लगा देते हैं। जानते हैं, क्यों ? क्योंकि इसी से विधायक और सांसद की आमदनी बढ़ती है। साथ ही क्षेत्र में राजनीति करने के लिए जिला पंचायत सदस्य, क्षेत्र पंचायत सदस्य और ग्राम प्रधानों की एक सशक्त टीम भी मिल जाती है। जिससे विधानसभा और लोकसभा चुनाव में मदद मिलती है। इसी कारण विधायक और सांसद को भी जिला पंचायत और ब्लॉक पर अपना आधिपत्य बनाएं रखने के लिए गुणा गणित लगानी पड़ती है। अपने विधानसभा एवं लोकसभा क्षेत्र में ठेका-पट्टा का कार्य तभी हो सकता है, जब जिला पंचायत और ब्लॉक पर उनका अपना कब्जा रहे। जितना विधानसभा एवं लोकसभा में बतौर सदस्य 5 साल कमाते हैं, उतना धन एक ब्लॉक प्रमुख कमा लेता है। जिला पंचायत अध्यक्ष की तो बात ही अलग है। इसलिए इनके चुनाव में यदि किसी आयोजन में कोई बुकिंग किसी नेता या नेता के समर्थकों द्वारा की जाती है तो पैसा वसूलने के लिए विशेष सतर्कता की आवश्यकता होती है, नहीं तो जो धन फंसा तो वह निकल नहीं पाता है। 


वैसे तो यह जग जाहिर है कि जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख पद के लिए सदस्यों के मतों की कीमत देनी पड़ती है। तब जाकर उम्मीदवार चुनाव जीत पाता है। मतदान से पहले सदस्यों को "दामाद" सरीखे सेवा करनी पड़ती है। उसकी हर खुशामद पूरी करनी पड़ती है। तब कहीं जाकर वह सदस्य अपना मत देता है। इस सेवा के लिए बाकायदा उनके बीच पार्टी दी जाती है और उस पार्टी का खर्च भी वही उम्मीदवार उठाता है। कभी-कभी यह कार्य पर्दे के पीछे से दूसरा ब्यक्ति भी करता है और वह उम्मीदवार उस ब्यक्ति का मोहरा बनकर पांच साल तक कार्य करता है। ये तभी संभव हो पाता है जब आरक्षण चक्रानुक्रम में सीट आरक्षित हो जाती है और आरक्षण में उस ब्यक्ति को चुनावी मैदान में उतारा जाता है जो विश्वास पात्र हो और अपने कहने सुनने में हो। चुनाव परिणाम बाद वह बदल न जाए। ऐसे ही लोंगो को मठाधीश लोग अपना उम्मीदवार बनाते हैं और उन पर दांव लगते हैं। प्रतापगढ़ जिला पंचायत इसका जीता जागता उदाहरण है। 


ऐसे में उनके होने वाले आयोजनों में जो ब्यक्ति आयोजन को सम्पन्न कराने की जिम्मेदारी ले, वह समय से अपना भुगतान भी ले ले। अन्यथा वह धन फंस जाता है और मांगने पर सम्बन्ध ही खराब होता है।वह भूल जाता है कि जिसने उसके लिए खर्च किया वह घर में नहीं पैदा होता,बल्कि खरीदकर उसकी ब्यवस्था की जाती है। कभी-कभी तो एक सदस्य यानि मतदाता एक से अधिक उम्मीदवारों से वचनबद्ध हो जाता है और बदले में धन भी ले लेता है। ऐसे सदस्यों को चुनाव परिणाम बाद कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कभी-कभी तो ऐसे लालची और दोगले सदस्य की हत्या तक हो जाती है। फिलहाल वह सदस्य समाज में मुँह दिखाने लायक नहीं बचता। अपने गाल पर तमाचा मारकर भले ही वह गाल लाल करने का दावा करे, परन्तु उसका पूरा मुँह ही काला हुआ रहता है। यह हकीकत है जो सामान्यतः नेतागण और उनके चमचे किस्म के समर्थकों को हजम नहीं होता। 

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