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शुक्रवार, 25 जून 2021

पाश्चात्य सभ्यता के आगे विलुप्त होती भारतीय संस्कृति और सभ्यता

इसे किस जिहाद का नाम दें,जिसके जनक हम स्वयं हैं...!!!

इतनी आजादी ठीक नहीं जो सभ्य समाज में सीना तानकर जीने में समस्या खड़ी कर दे...!!!

परिवार में लड़कियों की इतनी स्वतंत्रता ठीक नहीं...

 सदाचार के सम्बन्ध में संस्कृत भाषा में एक श्लोक सबकुछ कह देता है । "वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमेति च याति च । अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः॥ उक्त श्लोक का भाव है कि चरित्र की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए। धन तो आता-जाता रहता है। धन के नष्ट होने पर भी चरित्र सुरक्षित रहता है, लेकिन चरित्र नष्ट होने पर सबकुछ नष्ट हो जाता है।

भारत में हावी होती पाश्चात्य सभ्यता... 

प्रतापगढ़ जैसे शहर में आप भी यदि सजगता और जागरूकता से देखना चाहेंगे तो आपको भी दिख जाएगा कि जिन बस और टैम्पू अड्डो पर घर से निकल कर महिलाओं अथवा लड़कियों को उन बस और टैम्पू अड्डो पर बैठाकर अथवा छोड़कर वापस चले जाते हैं तो उनके जाते ही वो महिला उस बस अथवा टैम्पू वाहन से उतर कर किसी मोटर साइकिल अथवा कार सवार ब्यक्ति के साथ बैठकर चली जाती है और लोग देखते रह जाते है। बस अथवा टैम्पू पर सवार कोई स्वछन्द ब्यक्ति बैठा है तो इतना तो जरुर कह देता है कि गजब बदल गया जमाना। लोकलज्जा धोकर पी जाने जैसी घटना करने में भी लोग अपना सम्मान समझते हैं। 

ऐसे कुकृत्यों से यदि उस परिवार को पता चल जाता है तो उस पर क्या गुजरती होगी ? निश्चित तौर पर उस परिवार में उस मुद्दे को लेकर अशांति होगी। इसलिए ऐसे परिवार के लोगों को सुझाव है कि वह अपने घर की महिलाओं पर नजर रखे कि वो अपनी स्वछंदता की आड़ में पूरे परिवार का समाज में बेड़ागर्क करा रही हैं यही नहीं हम उस सच्चाई को सुनकर दंग रह गये जब उद्योग विहीन जनपद में शाम को देहात से आने वाली महिलाओं के सम्बन्ध में यह बताया गया कि कुछ महिलाएं शहर में आकर रात्रि गुजारती हैं। इस आरोप का सत्यापन किया तो आरोप सच साबित हुआ 

यक्ष प्रश्न है कि शहर में जो महिलाएं आती हैं, वह रात्रि में कहाँ रहती हैं ? फ़िलहाल इस यक्ष प्रश्न का तो समाधान नहीं हो सका, परन्तु इतना स्पष्ट जरुर तय हुआ कि जो शहर में जो महिलाएं जिस क्षेत्र से आती हैं उस टैम्पू अड्डे पर सत्यापन किया तो वही महिला सुबह उसी बस अथवा टैम्पू अड्डे पर साधन के इन्तजार में खड़ी मिलेगी। आखिर ये क्या सिद्ध करता है ? यह दृश्य अक्सर आपको दिखेगा। कोई एकदिन की बात नहीं है। सभ्य समाज के लोगों को इसकी जानकारी है या नहीं ! कह नहीं सकता क्या इस विषय पर कभी विचार किसी ने विचार किया  कि सभ्य समाज के लिए यह ब्यवस्था ठीक नहीं

समाज में अच्छाइयां और बुराइयां सदैव रही हैं,परन्तु आधुनिकता की चकाचौध में आज मानव अपनी सभ्यता और संस्कृति को ही भूल चुका है, तभी तो वह अपने आचरण पर नियंत्रण नहीं रख पा रहा है पहले इंसान को समाज से इस कदर डरता था कि वह कोई भी गलत कार्य करता था तो बहुत ही छिपाकर करता था  नहीं तो समाज में जनकारी होने पर उसका हुक्का पानी पानी बंद होने का खतरा रहता था परन्तु आज के दौर में सारे गलत कार्य खुलेआम किये जा रहे हैं गलत कार्य करने वालों को कानून का डर नहीं रहा, समाज की डर की बात करना ही ब्यर्थ है     

हम बात कर रहे हैं, मानव समाज में इंसानों के क्षीण होते संस्कारों की जब हमने परिवार में झूठ बोलकर गलत कार्य करते हैं और उस झूठ का जब पर्दाफाश होता है तो वह झूठ बोलने वाला ब्यक्ति अपनी ही नजरों में शर्म से गिर जाता है और कभी-कभी तो आत्मघाती निर्णय ले ल्रेता है जो बहुत ही निकृष्ट कार्य में आता है हमारे समाज में स्त्रियों का आभूषण लज्जा और शर्म माना गया है,परन्तु आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में पाश्चात्य सभ्यता इस कदर हावी हुई कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति का सत्यानाश होता जा रहा है   

आज हम बात करते हैं उस परिवार की जहाँ महिलाएं खुलेआम अकेले अपने आप पूरी स्वछंदता के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना रोक टोक भ्रमण करती हैं बहुत अच्छी बात है कि हमारे समाज में महिलाएं भी आगे बढ़े और अपने जीवन के हर समस्या के निराकरण के सम्बन्ध में वह स्वयं स्वतंत्र होकर निर्णय लें,परन्तु वह स्वतंत्रता वहीं तक रहे जहाँ तक परिवार में अशांति न पैदा हो। अक्सर जब किसी के घर से  महिलाएं अथवा अविवाहित लड़कियां अपनी दहलीज से बाहर कदम रखती हैं तो उनके साथ घर का कोई न कोई सदस्य उनकी सुरक्षा के लिए उनके साथ हो लेता है बहुत कम परिवार है जो महिलाओं को खुलेआम मनमर्जी तरीके से घूमने टहलने की आजादी दे रखी हो !

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