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सोमवार, 3 मई 2021

राज्य निर्वाचन आयोग, उत्तर प्रदेश की लाचारी देख आती हैं,तरस

पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव करने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग का होता है,गठन...!!!

संवैधानिक संस्था होने के बाद भी सरकार का रहता है,दबाव क्योंकि राज्य निर्वाचन आयुक्त के पद पर बैठा ब्यक्ति सरकार की कृपा पर ही होता है,आसीन...!!!

राज्य निर्वाचन आयोग में अधिकारियों का है,अकाल ! कुछ सेटिंगबाज़ अधिकारी दशकों से कुर्सी पर फेवीक्विक लगाकर चिपक चुके हैं,उन्हें हटाने की नहीं है,सरकार को सुध...!!!

माया सरकार और अखिलेश सरकार के बाद योगी सरकार में भी राज्य निर्वाचन आयोग में HOD एवं सहायक आयुक्त वेद प्रकाश वर्मा और जय प्रकाश सिंह ऑफिस ऑन स्पेशल ड्यूटी/सचिव ही आयोग को कर रहे हैं,दशकों से संचालित...!!!

राज्य निर्वाचन आयोग, उत्तर प्रदेश...

राज्य निर्वाचन आयोग की शक्ति और उसके संगठनात्मक स्वरूप को देखना बहुत आवश्यक है। राज्य निर्वाचन में सबसे महत्वपूर्ण पद आयुक्त का है जो एक पद होता है। फिर दूसरे नम्बर पर आते हैं। दूसरे स्थान पर विभागाध्यक्ष/अपर निर्वाचन आयुक्त का पद होता है और यह पद भी एक ही होता है। तीसरे स्थान पर संयुक्त आयुक्त का पद होता हैसंयुक्त आयुक्त का तीन पद सृजित है और मजे की बात है कि तीनों खाली हैं चौथे स्थान पर उपायुक्त का पद है और उसकी संख्या है,दो ! ये भी दोनों पद रिक्त हैं। साथ ही उपायुक्त के समकक्ष एक पद सचिव का है। वह भी रिक्त है। अब आते हैं पांचवें पायदान पर सहायक आयुक्त का दो पद सृजित है और यह भी दोनों पद रिक्त है। इसी के समकक्ष तीन पद उप सचिव का सृजित है और मजेदार बात यह है कि वह भी तीनों पद रिक्त है। अब आप समझ सकते हो कि जब सारे पद रिक्त ही हैं तो कैसा राज्य निर्वाचन आयोग है, जो अपने सारे महत्वपूर्ण पद को रिक्त रखते हुए राज्य में त्रिस्तरीय चुनाव सम्पन्न करा लेने की कूबत रखता है

गंगोत्री जहाँ से गंगा निकलती हैं,वहीं इतनी गंदगी है तो संगम आते-आते गंगा की पवित्रता पर सवाल तो उठेगा ही कहने का आशय यह है कि जब राज्य निर्वाचन आयोग में इतनी शक्ति नहीं कि वह अपने यहाँ पद के सापेक्ष कम से कम चुनाव के समय मुख्यालय पर तो पदों पर तैनाती कर ले। यदि नहीं करता तो उसकी शक्ति और अधिकार दोनों पर सवालिया निशान लगने तय हैं राज्य निर्वाचन आयोग की विवशता देखते ही बन रही है। जो संवैधानिक संस्था अपने मुख्यालय पर सृजत पद के सापेक्ष उस पर तैनाती नहीं करा सकता,उस संवैधानिक संस्था से आप फरियाद करके न्याय पाने की उम्मीद लगाये बैठे हो संवैधानिक संस्थाओं को सरकार ने इतना कमजोर और निरीह कर दिया कि उस संवैधानिक पद पर आसीन होना वाला ब्यक्ति सिर्फ रबर स्टैम्प की तरह होता है। देशी कहावत में ऐसे पदों पर आसीन होने वाले को काठ का उल्लू भी कहा गया है। अब तो संवैधानिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर वही ब्यक्ति बैठाया जाता है,जिसको बढ़िया से मख्खनबाजी आती हो और जो कार्य बताया और समझाया जाए उसे बिना न नुकुर किये कर दिया जाए। ऐसे ही ब्यक्ति को बाद में भी तरक्की मिलती है। जिन्हें भरोसा न हो वह सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश और भारत निर्वाचन आयोग के मुख्य निर्वाचन आयुक्त के नाम पर अपनी यादाश्त सही कर सकता है

अब बात करते हैं उत्तर प्रदेश में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की। बहुत न नुकुर के बाद उच्च न्यायालय के हंटर मारने के बाद त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव का बिगुल बजा और चुनाव हुआ और 2 मई से मतगणना भी कराई जा रही है मतगणना की जरा हकीकत आप सब भी जान समझ लें मतदान के बाद मतगणना का ही नम्बर आता है मतगणना में जिला पंचायत सदस्य, क्षेत्र पंचायत सदस्य और ग्राम प्रधान के पद का परिणाम आने के बाद आरओ अथवा एआरओ द्वारा उस सीट के परिणाम का एनाउंसमेंट कराने के बाद परिणाम को आयोग के साइट पर फीड कराने की जिम्मेदारी उनको दी गई थी। राज्य निर्वाचन आयोग की साइट पर इलेक्शन लाइव की ब्यवस्था भी साइट खोलने पर दिख रही है,परन्तु अधिकतर जिले अपने यहाँ के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव परिणाम को तीसरे दिन भी लाइव नहीं करा सके हैं। जबकि चुनाव में चुनाव कराने से लेकर चुनाव मतदान की गणना की ट्रेनिंग दी जाती है,परन्तु वह ट्रेनिंग सिर्फ कागज पर कर ली जाती है और हकीकत में ट्रेनिंग कराई नहीं जाती। नतीजा यह होता है कि मतदान से लेकर मतगणना तक जमकर अब्यवस्था देखने को मिलती है। चुनाव ड्यूटी में लगे कर्मचारियों को मतगणना चार्ट बनाना तक नहीं आता, जिससे यह समस्या उत्पन्न हुई है

जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत सदस्य और ग्राम प्रधान पद का चुनाव एक साथ कराया गया और प्रत्येक बूथ पर जितने मतदाता मतदान करने पहुँचे उन्हें तीन बैलेट पेपर दिए गए और तीनों पर अपनी पसंद के उम्मीदवार के चुनाव निशान पर मुहर लगाकर अपना मतदान करना था। गड़बड़ी की शुरुवात यहीं से होती है। कम पढ़े लिखे और अनपढ़ मतदाता जो समझ नहीं पाता उसको गुमराह करके मतदान केंद्र के अंदर बैठा ब्यक्ति खेला कर जाता है। यह खेला उस अशिक्षित मतदाता से पूँछ कर खेला जाता है,परन्तु वह समझ नहीं पाता। इसकी सहमति तो ली जाती है परन्तु मतदान की मुहर लगते समय मदद करने वाला खेल कर जाता है। मतदान केंद्र पर बैठा पीठासीन अधिकारी और अन्य चुनाव ड्यूटी में लगे कर्मचारी यह खेल समझाते रहते हैं,परन्तु मतदान केंद्र पर पहुँचने से पहले ही उनकी खातिरदारी इतनी कर दी जाती है कि वह इतनी छूट के लिए तैयार हो जाते हैं कि ऐसे मतदाता का मतदान उसका परिचित कराने में उसकी मदद कर दे। अब मदद की आड़ में जो गड़बड़ी करनी हो कर ले

मतदान जब बूथ पर खत्म होता है तो उम्मीदवारों के अभिकर्ताओं की मौजूदगी में मतपेटिका सील की जाती है और सभी अभिकर्ताओं को बताया जाता है कि उसके अन्दर कुल कितने मतदाताओं ने मतदान किये हैं। उसकी गिनती का चार्ट बनता है और वही चार्ट जिला निर्वाचन कार्यालय सहित राज्य निर्वाचन आयोग को भेजा जाता है। अब बारी आती है मतगणना की तो मतगणना के लिए प्रत्येक उम्मीदवार मतगणना स्थल पर अपना अभिकर्ता तैनात करके मतगणना कराते हैं। मतगणना के समय तीनों बैलेट पेपर अलग किये जाते हैं और फिर तीनों की गिनती शुरू की जाती है। चक्रानुसार मतगणना की ब्यवस्था होती है। मतगणना के समय ऐसे बैलेट पेपर मिलते हैं जो अवैध मत के रूप में गिने जाते हैं। चूँकि मतदान करने वाला अपनी मुहर ऐसे जगह लगाया रहता है कि उसकी गणना किसी उम्मीदवार के पक्ष में नहीं की जा सकती। मतगणना के अंत में जब जीत हार का अंतर कम होता है तो उम्मीदवार का अभिकर्ता अथवा उम्मीदवार स्वयं फिर से मतगणना की माँग आरओ और एआरओ से करता है

दबाव और प्रलोभन में कभी-कभी आरओ और एआरओ फिर से मतगणना करा देते हैं और वहीं से खेल शुरू होता है। यह खेल 10 से 20 मत के अंतर पर खेला जाता रहा,परन्तु अब तो सत्ता का दबाव ऐसा होता है कि सैकड़ों मतों के अंतर को भी नगल जाने की माद्दा रखने को तैयार रहते हैं,पंचायत के उम्मीदवार कमजोर और शासन सत्ता की हनक के आगे सारे उम्मीदवार तो टिक नहीं पाते और जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए खेल हो जाता है। एक बार यदि किसी को प्रमाण पत्र मिल गया तो चुनावी याचिकाओं के प्रकरण में न्यायालय इतना देर से न्याय देती हैं कि न्याय आते आते 5 वर्ष का कार्यकाल ही पूरा हो जाता है। घाघ और घूंसखोर किस्म का अधिकारी जिसे पेन लेने की आदत होती है वह खेल करने के लिए तैयार भी हो जाता है और खेल कर भी देता है। जिस उम्मीदवार के साथ खेला किया जाता है वह थक हारकर सिस्टम को कोसते हुए मन मसोस कर शांत हो जाने में अपनी भलाई समझता है। यही है हमारे लोकतंत्र की असली हकीकत। जब खेल किया जाता है तो ये सारे अधिकारी अपना फोन CUG तक उठाना मुनासिब नहीं समझते। इनके खिलाफ कोई एक्शन भी नहीं लिया जाता।

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