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सोमवार, 10 अगस्त 2020

9 अगस्त का एक इतिहास यह भी है

9अगस्त, 1925 को हुई इस घटना के ऊपर शहीद-ए-आज़म भगत सिंह ने काफी विस्तार से लिखा है उन दिनों छपने वाली पंजाबी पत्रिका किरती में भगत सिंह ने एक सीरीज़ शुरू की थी, जिसमें वो काकोरी कांड के हीरो का परिचय पंजाबी भाषा में लोगों से करवाते थे...

किस्सा काकोरी कांड का (सांकेतिक तस्वीर)
अमर बलिदानी क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में क्रान्तिकारियों ने 9 अगस्त, 1925 को लखनऊ के निकट काकोरी में ट्रेन रोक कर सरकारी खजाना लूट लिया था। भारतीय स्वतंत्रता के लिए क्रांतिकारियों के सशस्त्र संग्राम के इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ है,काकोरी कांड इसके 17 वर्ष पश्चात 9 अगस्त 1942 को ही भारत छोड़ो आंदोलन भी शुरू हुआ था लेकिन आजादी के बाद 67 बरस तक हर वर्ष 9 अगस्त को सरकारी रकम फूंक कर भारत छोड़ो आंदोलन का गुणगान तो जमकर होता रहा, स्कूलों और सरकारी कार्यालयों में नेहरू गांधी के भजन गाए जाते रहे पर काकोरी कांड की चर्चा कभी नहीं हुई उसकी स्मृतियां गुमनामी और उपेक्षा के अंधकार में ही रहीं, जबकि दोनों घटनाओं में जमीन आसमान का सा अन्तर है

काकोरी कांड के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने राम प्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी अशफाक उल्ला खाँ व रोशन सिंह को सज़ा ए मौत दी थी। शचीन्द्र नाथ सान्याल, योगेशचन्द्र चटर्जी, मुकुन्दी लाल व गोविन्दचरण कार को उम्र-कैद की सज़ा दी थी। मन्मथनाथ गुप्त को 14 वर्ष कठोर कारावास की सज़ा दी थी। सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य व विष्णुशरण दुब्लिश को 10 वर्ष कठोर कारावास की सज़ा दी थी। जबकि भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के लिए कांग्रेस के सबसे बड़े नेता मोहनदास करमचंद गांधी को ब्रिटिश हुकूमत ने 1 साल 10 महीने के लिए जेल में बंद किया था। कांग्रेस के दूसरे सबसे बड़े नेता जवाहरलाल नेहरू को 2 साल 9 महीने के लिए जेल में बंद किया था। कांग्रेस के शेष अन्य छोटे बड़े नेता भी इसी तरह साल डेढ़ साल के लिए जेल में बंद किये गए थे।

यहां यह भी उल्लेख आवश्यक है कि ब्रिटिश हुकूमत ने गांधी को किसी जेल के बजाय आगा खां के आलीशान महल में बंद किया था। और नेहरू को अहमद नगर के राजा के किले में सोफा कुर्सी टेबिल और गद्देदार पलंग वाले कमरे में कैद किया गया था। लेकिन देश के गणमान्य नागरिकों द्वारा उसी ब्रिटिश हुकूमत से की गयी रामप्रसाद बिस्मिल और उनके साथियों के मृत्युदण्ड को क्षमा करने की अपील को तत्कालीन ब्रिटिश सम्राट की तरफ से यह कहते हुए खारिज़ कर दिया गया था कि..."राम प्रसाद 'बिस्मिल' बड़ा ही खतरनाक और पेशेवर अपराधी है उसे यदि क्षमादान दिया गया तो वह भविष्य में इससे भी बड़ा और भयंकर काण्ड कर सकता है। उस स्थिति में बरतानिया सरकार को हिन्दुस्तान में हुकूमत करना असम्भव हो जाएगा।"

ज्ञात रहे कि 1956 में भारत आए तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लीमेंट ऐटली ने गांधी नेहरू की जोड़ी के भारत छोड़ो आंदोलन की व्याख्या इन शब्दों में बयान की थी कि वर्ष-"1947 में जिस समय भारत को स्वतंत्रता मिली उस समय गांधी का भारत छोड़ो आंदोलन पूरी तरह मर चुका था और उसकी ऐसी कोई प्रासंगिकता या भूमिका नहीं रह गयी थी, जिसने अंग्रेज़ों को भारत छोड़ने पर मजबूर किया हो। इसके बजाय नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज़ की गतिविधियों/कार्रवाइयों, जिसने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को बुरी तरह हिला दिया था तथा तत्कालीन भारतीय नौसेना के बगावती तेवरों ने ब्रिटिश शासकों को यह अहसास करा दिया था कि, अब उनके दिन पूरे हो चुके हैं।"

ध्यान रहे कि यह स्वीकारोक्ति किसी ऐरे-गैरे नत्थू खैरे या किसी संघी इतिहासकार की नहीं है। बल्कि 1947 में ब्रिटेन की जिस सरकार ने ब्रिटिश संसद में भारत को आज़ादी देने का फैसला किया था उस ब्रिटिश सरकार के मुखिया, ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली की है। भारत में एटली की इस स्वीकारोक्ति के गवाह कलकत्ता हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश और 1956 में बंगाल के गवर्नर रहे पीवी चक्रवर्ती थे। जस्टिस पीवी चक्रवर्ती के हवाले से प्रधानमंत्री एटली की यह स्वीकारोक्ति अखबारों की सुर्खियों में छा गई थी उपरोक्त तथ्य हमे इस सच से परिचित कराते हैं कि... ब्रिटिश हुकूमत को गांधी नेहरू और उनके साथी कांग्रेसी नेताओं से डर लगता था...?

....या फिर आज़ाद भगत बिस्मिल अशफ़ाक़ और उनके साथियों से डर लगता था ? लेकिन आजादी के बाद 67 सालों तक हर वर्ष 9 अगस्त को भारत छोड़ो आंदोलन की बरसी धूमधाम से क्यों मनायी जाती रहीं और काकोरी कांड की स्मृतियां उपेक्षित क्यों रहीं ? कहीं इसकी वजह यह तो नहीं कि ककोरी काण्ड में जिन दो सरकारी गवाहों बनारसी और बनवारी की गवाही के कारण क्रांतिकारियों को फांसी और उम्रकैद की सजाएं मिली थीं, उनमें से एक बनवारीलाल श्रीवास्तव तत्कालीन जिला कांग्रेस कमेटी का महामंत्री भी था।
प्रस्तुति : - सतीश मिश्र...

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