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सोमवार, 3 अगस्त 2020

सत्ताधारी दल के पार्टी पदाधिकारियों की बढ़ती उपेक्षाओं से कार्यकर्ताओं में उत्पन्न हो रही है,घोर निराशा

राजनीति में आ चुकी है,भारी गिरावट ! राजनीतिक दलों में पार्टी के मूल वर्कर की हो रही है,घोर उपेक्षा...
दूसरे दलों से आये आयातित नेताओं और सत्ता की दलाली में सक्रिय लोगों के आगे पार्टी के मूल वर्कर की नहीं होती कोई पूँछ....
 राजनीतिक दलों में पार्टी के मूल वर्कर की हो रही है,घोर उपेक्षा...
भाजपा, प्रतापगढ़ की जिला इकाई में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। कुछ युवा कार्यकर्ता पार्टी के मीडिया प्रभारी से नाराज हैं। कहा जा रहा है कि उन्होंने प्रदेश के उपमुख्यमंत्री के विरुद्ध अपमानजनक टिप्पणी की है। यदपि जिलाध्यक्ष ने सफाई दिया था, लेकिन यह बात युवा नेताओं के गले नहीं उतरी। इस मुद्दे पर बात इतनी बढ़ गयी कि मामला कोतवाली पहुंच गया।
       
भाजपा के युवा नेताओं का आग्रह था कि पुलिस इस मामले में विधिक कार्यवाही करे। किन्तु पुलिस तो खैर पुलिस ही है। उसे पता नहीं कब समझ में आयेगा कि वह कानून का हाथ है। कानून उसके हाथ में नहीं है। उसे विधिक प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी। फिलहाल, शायद पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं किया। कोई बेबस, लाचार होता तो बेचारा अपना मुंह लेकर लौट ही जाता, लेकिन बात सत्ता पक्ष की थी, इसलिए बात बिगड़ गयी। युवा नेता कह रहे हैं कि पुलिस ने दुर्व्यवहार किया, पुलिस कह रही है कि युवा नेताओं ने धक्का मुक्की किया। खैर सीओ साहब ने पहुंच कर किसी तरह बात संभाली। 
         
यह तो सिर्फ एक घटना है, जो कुछ दिन पहले, अपने जिले में घटी है। इस तरह की घटनाएं अक्सर घटती रहती हैं। कोई न कोई साथी, इसका शिकार भी होता ही रहता है। कुछ दिनो के बाद मामला आया राम, गया राम हो जाता है। इस प्रकरण के माध्यम से मैं कोई दलगत राजनीति की बात नहीं करना चाहता। लगभग सभी दलों में ऐसा ही व्यवहार है। चौकी पर कुछ और है, चौके में कुछ और। इस घटना के कई निहितार्थ हैं। जिस पर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ। मेरी कोशिश सिर्फ इतनी है कि समाज उचित और अनुचित पर बात भले ही न करे लेकिन चिंतन तो करे ही।
      
राजनीति का खेल बड़ा विचित्र होता है। यह जितना मैदान में होता है, उससे ज्यादा मैदान के बाहर होता है। नेता और कार्यकर्ता मैदान में जोर आजमाइश करते हैं। मैदान के बाहर कुछ व्यापारी, दलाल और चाटुकार टाइप के लोग अपने हथकंडे आजमाते हैं। राजनीतिक दलों में कार्यकर्ताओ की कई पंक्तियां होती है। पहली पंक्ति के कार्यकर्ता आर्थिक रूप से काफी मजबूत होते हैं और वह सीधे चुनाव लड़ने की योजना के साथ किसी दल के साथ जुड़ते हैं।
          
दूसरी पंक्ति के कार्यकर्ता, राजनीतिक दलों के मुख्य सिपाही होते हैं, जो आपको हर गली के नुक्कड़ पर, चाय की दुकानों में और चौराहे की बैठकों पर, आपस में कुर्तक और बहस करते हुए मिल जायेंगे। इनमें से कुछ साथी, अपने नेता और कुछ दल के प्रति बड़े ईमानदार होते हैं। यह किसी बड़े बाप के बेटे नहीं होते। प्रायः सामान्य परिवारों से निकल कर आते हैं। अपनी मेहनत के दम पर एक पहचान और मुकाम बनाते हैं। थोड़ा आदर्शवादी भी होते हैं। इसलिए सही को सही और गलत को गलत कह देने की गलती करते रहते हैं। परिश्रम और संघर्ष करते-करते इनमें से कुछ लोग, पार्टी के संगठन में महत्वपूर्ण स्थान बना लेते हैं। कुछ चुनाव के लिए टिकट भी पा जाते हैं। ऐसे साथियों की सफलता ही इनकी प्रेरणा होती है।

राजनीति के मैदान में आमने सामने का संघर्ष इन्हीं के हिस्से में आता है। टाट बिछाने से लेकर मंच सजाने तक, सब कुछ यही करते हैं। इसके बाद पहली पंक्ति और स्थापित नेता, बड़ी चतुराई से मंच पर कब्जा जमा लेते हैं। तात्पर्य यह है कि सत्ता का सुख, इनकी बदौलत ही हासिल होता है और सत्ता मिलने के बाद ही असली खेल शुरू होता है। अब इसमें मैदान के बाहर रहने वाले खिलाड़ी इंट्री मारते हैं। इनके दांव पेंच इतने जबरदस्त होते हैं कि सामान्य और प्रतिबद्ध कार्यकर्ता चारो खाने चित्त गिर जाता है। उस दिन कोतवाली प्रतापगढ़ में भी इसी तरह का दांव चला गया था।
          
यह जो मैदान के बाहर वाले खिलाड़ी हैं, इनकी गणित बहुत अच्छी होती है। गणित अच्छी हो तो कमेस्ट्री भी अच्छी हो जाती है। पढाई वाली नहीं, आज कल जो राजनीति हो रही है, उसमें हो जाती है। दरअसल इनका जुड़ाव सिर्फ सत्ता से होता है। यह सत्ता में बैठे व्यक्ति से सम्पर्क बनाते हैं। इनके पास ऐसी लच्छेदार बातें और सुनहरी योजनाएं होती हैं कि आदमी कितना भी होशियार हो, इनकी बातों में फंस ही जाता है। इन्हें कितना भी उपेक्षित करिए, मगर यह लोग आसानी से हार नहीं मानते। यदि नेता के यहां दाल नहीं गल रही हो तो दूसरी पंक्ति वाले कार्यकर्ता के यहां रिश्तेदारी ढूंढ़ लेते हैं। बात नहीं बनी तो उसे पार्टनर बनाने का लालच देते हैं। 

कार्यकर्ता जिसके जीवन का एक बड़ा हिस्सा जिंदाबाद और मुर्दाबाद करते हुए निकल चुका है, बच्चे बड़े हो रहे हैं, जरूरतें मुंह बाये खड़ी हैं। वह झांसे में आ ही जाता है। कार्यकर्ता के माध्यम से या दूसरे किसी तरीके से यह सत्ताधारी तक पहुंच बना लेते हैं। उसके बाद का कौशल तो इन्हें आता ही है। नेता जी के ड्राइंगरूम से लेकर किचन तक जो भी जरूरत हो, बिना मांगे हाजिर कर देते हैं। धीरे-धीरे सब मैनेज करने लगते हैं। यदि कोई पहले से मैनेज करने में लगा है तो उसके सहयोगी बन जाते हैं।

ऐसे लोग सत्ता में बैठे नेता के यहां उस समय पहुंचते हैं, जब कार्यकर्ता या तो लौट चुका होता है या तो अभी पहुंचने के जुगाड़ में लगा होता है। अमूमन तो इनके लिए एक चोर दरवाजा भी बन जाता है, जिसमें से सिर्फ ऐसे ही लोग जा पाते हैं। सत्ता के लगभग चार साल यह मलाई काटते हैं। इनके आगे कार्यकर्ता की चल नहीं पाती। क्योंकि वह तो मेहनत करने वाला बंदा है। इसलिए न तो सही गणित लगा पाता है और ना ही केमिस्ट्री बना पाता है। उपेक्षित होता है तो नाराज होकर बैठ जाता है। लड़ना बंद कर देता है। नेताजी का माहौल बिगाड़ने लगता है। क्योंकि अब उनके लिए कार्यकर्ता बोल नहीं रहा है। विरोध में नहीं है, लेकिन चुप हो गया है। विरोधी पक्ष मुखर रहता है तो जनमत धीरे धीरे उसकी ओर उन्मुख हो जाता है। 

नेताजी का माहौल खराब हो चुका है। इसको भी सबसे पहले यह मैदान के बाहर वाला खिलाड़ी ही भांपता है। मौका देखकर निकल लेता है और उस विरोधी खेमे से मिलने के सूत्र तलाशने लगता है, जिसके पक्ष में सत्ता जाती हुई दिख रही है। चुनाव में चंदा देने के बहाने अपना रजिस्ट्रेशन करवा लेता है। चुनाव में जीत मिलने के बाद वह फिर अपना खेल खेलने लगता है। इस तरह सत्ता, चाहे जिसके पास हो, मगर बाहर वाले खिलाड़ी वही रहते हैं। चार पांच महीने में ऐसे लोग पीआरओ और मीडिया प्रभारी बन जाते हैं, किन्तु कार्यकर्ता की निष्ठा संदिग्ध ही रहती है। उसकी अग्नि परीक्षा कभी समाप्त ही नहीं होती।
          
सत्ता के दलाल सदैव सत्ता से जुड़े होने के कारण आर्थिक रूप से मजबूत होते चले जाते हैं और पहली पंक्ति में जाकर खड़े हो जाते हैं। चुनाव लड़ते हैं, नेता हो जाते हैं। कार्यकर्ता चाहे जिस दल का हो, वह हमेशा ठगा ही जाता है। अंततः निराश होकर मैदान छोड़ देता है। देश में आबादी बढ़ ही रही तो उसकी जगह नए लोग आ जाते हैं। यह खेल इसी तरह चलता रहता है। इसलिए या तो पहली पंक्ति के लायक बनिए नहीं तो धीरे से निकल लीजिए। उम्र  निकल गयी तो कुछ भी हांथ नहीं लगेगा। यही राजनीति का असल खेल है जो समय रहते सीख लिया वो इस खेल में जीत हासिल कर आगे बढ़ जाता है और जो नहीं सीख पाता वो निराश होकर अपने आपको और अपनी किस्मत को कोसता है। जब फ्रस्ट्रेशन में होता है तो अपने नेता और पार्टी को ही गाली देता है। उसे लगता है कि उसे राजनीति में राजनीतिक लोग ठग लिए

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