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सोमवार, 20 जुलाई 2020

आईपीसी की धारा 498-ए सुप्रीम कोर्ट ने समझौते के आधार पर खारिज किए वैवाहिक क्रूरता के आरोप

"विवाह एक पवित्र रिश्ता है, जिसका मुख्य उद्देश्य युवा दंपति को अपना घर बसाने और शांति से रहने के लिए सक्षम बनाना है। परंतु कई बार छोटी सी वैवाहिक झड़पें अचानक से बड़ा रूप ले लेती हैं, जो अक्सर गंभीर अपराधों का कारण बन जाती हैं..."
आईपीसी की धारा 498-ए पर सुप्रीम कोर्ट का अहम् फैसला...
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक पत्नी द्वारा अपने पति के एक रिश्तेदार के खिलाफ लगाए क्रूरता के आरोपों को खारिज कर दिया है क्योंकि इस मामले में पति-पत्नी के बीच पहले ही एक सौहार्दपूर्ण समझौता हो चुका है।मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे और न्यायमूर्ति आर भानुमति की पीठ ने कहा कि शिकायतकर्ता पत्नी और आरोपी पति ने पहले ही इस मामले में समझौता कर लिया है। इसलिए आपराधिक मामले में धारा-498-ए, 506, 323 और 406 के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द किया जा रहा है।

⚫इसके अलावा अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले में अपीलकर्ता पति -पत्नी का दूर के रिश्तेदार था और इस दंपति के बीच समझौता हो चुका है। ऐसे में अपीलकर्ता जो दूर का रिश्तेदार था और मामले में आरोपी भी है, उसके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को भी रद्द किया जा रहा है। 

पीठ ने कहा कि...
''प्रतिवादी राज्य की तरफ से पेश वकील चिटनिस ने बताया कि उसको निर्देश मिले हैं,जिनके तहत उसे बताया गया है कि पति व पत्नी के बीच समझौता हो चुका है। इसलिए राज्य को वर्तमान अपीलकर्ता के खिलाफ दर्ज की गई उपरोक्त एफआईआर को रद्द करने में कोई आपत्ति नहीं है। चूँकि पति और पत्नी ने इस मामले को आपस में निपटा लिया है और अपीलकर्ता पति -पत्नी का दूर रिश्तेदार है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए रेगुलर क्रिमिनल केस नंबर- 653/2015 से संबंधित एफआईआर संख्या- 26/2015 को अपीलकर्ता-जयराज के संबंध में खारिज किया जा रहा है।''

'बी.एस. जोशी बनाम हरियाणा राज्य' मामले में शीर्ष न्यायालय ने पूर्व में जो फैसला दिया था, उसमें न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद-226 के साथ सीआरपीसी की धारा-482 के तहत हाईकोर्ट की निहित शक्तियों की व्याख्या की थी। न्यायालय ने इस सवाल पर निर्णय लिया था कि क्या आईपीसी की धारा-498-ए और 406 के तहत पत्नी द्वारा दायर आपराधिक कार्यवाही या एफआईआर या शिकायत को यह कहते हुए खारिज करने से इंकार किया जा सकता है कि क्योंकि अपराध गैर-शमनीय हैं ? क्या अदालत को इस बात की अनुमति होगी कि वह पति-पत्नी द्वारा आपस में विवाद को निपटाने के बाद आपराधिक कार्यवाही या शिकायत को खत्म कर सके ?

इस सवाल का सकारात्मक जवाब देते हुए जस्टिस वाई के सभरवाल और जस्टिस एचके सेमा की पीठ ने उन टिप्पणियों को दोहराया था,जो 'जी.वी. राॅव बनाम एल.एच.वी. प्रसाद व अन्य (2000) 3 एससीसी 693' के मामले में की गई थी, इस मामले में न्यायालय ने यह निर्धारित किया था कि वैवाहिक विवाद के मामलों में अदालतों को किस तरह का दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। '' कहा गया था कि हाल के दिनों में वैवाहिक विवाद के मामले काफी तेजी से बढ़े हैं। विवाह एक पवित्र रिश्ता है, जिसका मुख्य उद्देश्य युवा दंपति को अपना घर बसाने और शांति से रहने के लिए सक्षम बनाना है। परंतु कई बार छोटी सी वैवाहिक झड़पें अचानक से बड़ा रूप ले लेती हैं, जो अक्सर गंभीर अपराधों का कारण बन जाती हैं। 

जिनमें घर के बुजुर्ग लोगों को भी शामिल कर लिया जाता है। इसके नतीजे यह होते हैं कि जो लोग मामले को सुलझाने के लिए काउंसलिंग कर सकते थे और मामले को निपटाने के लिए आपस में बात कर सकते थे, वो भी असहाय हो जाते है क्योंकि आपराधिक मामलों में उनको भी आरोपी बना दिया जाता है। कई अन्य कारण हैं, जिनका उल्लेख यहां पर नहीं किया जाना चाहिए ताकि वैवाहिक मुकदमेबाजी को प्रोत्साहन न मिलें और दोनों पक्षकार अपनी गलतियों पर विचार कर सकें। वहीं आपसी विवादों को सौहार्दपूर्ण समझौते के जरिए समाप्त कर सकें, न कि इसके लिए उनको कानून की अदालत में लड़ना पड़े। 

चूंकि कानून की अदालतों में मामलों में कुछ भी निष्कर्ष निकलने में कई साल का समय लग जाता है। जिस कारण पक्षकार अपनी यंग लाइफ को विभिन्न केसों के लिए अदालतों के चक्कर काटने में जाया कर देते हैं। इसके प्रकाश में, कोर्ट ने कहा था कि आईपीसी में धारा-498-ए को लागू करने का उद्देश्य यह था कि एक महिला को उसके पति या उसके पति के रिश्तेदारों की यातना से बचाया जा सकें। हालांकि इस संबंध में ''अति-तकनीकी या हाईपर-टेक्निकल दृष्टिकोण अपनाने से इसका गलत प्रभाव पड़ेगा। वहीं यह महिलाओं के हित और उस उद्देश्य के खिलाफ काम करेगा,जिसके चलते यह प्रावधान जोड़ा गया था।'' 

इसलिए, न्यायालय ने हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया था,जिसमें अपीलकर्ता को राहत देने से इंकार कर दिया गया था। अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर उसके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की मांग की थी। हाईकोर्ट का कहना था कि आईपीसी की धारा- 498-ए और 406 के तहत किए गए अपराध गैर-शमनीय हैं। इसलिए सीआरपीसी की धारा-482 के तहत निहित शक्तियों को कोड की धारा-320 के तहत दिए गए अनिवार्य प्रावधानों को दरकिनार करते हुए लागू नहीं किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि न्याय के हित में अगर निहित शक्तियों का उपयोग कार्यवाही को रद्द करने के लिए नहीं किया गया तो यह महिलाओं को विवादों को निपटाने से रोकेगा।

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