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शनिवार, 4 जुलाई 2020

प्रतापगढ़ जिला प्रशासन की तानाशाही, साप्ताहिक बंदी के नाम पर महामारी अधिनियम का काटा जा रहा है,चालान

जिला प्रशासन के तुगलकी फरमान से चाय-पान और पटरी दुकानदार भुखमरी के कगार पर... 

साप्ताहिक अवकाश अधिनियम-1942

साप्ताहिक अवकाश अधिनियम, 1942 एक केन्द्रीय अधिनियम है लेकिन इसे संबंधित राज्य सरकारों द्वारा लागू किया जा रहा है। इस अधिनियम में दुकानों, रेस्तरां और थिएटर में कार्यरत व्यक्तियों के लिए साप्ताहिक छुट्टियों के अनुदान का प्रावधान किया गया है...
बाबागंज शहर में शनिवार की दुकानें खुली थी तो पुलिस ने महामारी अधिनियम के लिखा मुकदमा...
" साप्ताहिक बंदी में स्वास्थ्य सेवाएं, सब्जी की दुकानें, चाय-नाश्ता व पान की दुकानें सहित होटल और रेस्टोरेंट संचालित करने की छूट श्रम विभाग पहले से ही दे रखा है, फिर भी जिला प्रशासन अपनी मनमानी पर उतारू होकर पुलिस द्वारा जबरन डंडा मारकर उन दुकानों को भी बंद करा देता है, जो दुकानें खुली मिलती हैं उन पर महामारी अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर उनका चालान कर दिया जाता है। किसी की मजाल नहीं कि जिला प्रशासन से कोई पूँछ ले कि वो ऐसा क्यों कर रहा है ? प्रतापगढ़ के विधायक, सांसद और मंत्री सबके सब फिसड्डी बने हुए हैं। सत्ताधारी दल के नेता यानि पार्टी पदाधिकारी सिर्फ चुनाव में वोट माँगने दिखते हैं। सत्ताधारी संगठन के नेता भी सिर्फ अपने कार्य के लिए ही मानो राजनीति करते हैं..."

                                          बेईमानी साबित हो रहा है,प्रतापगढ़ में साप्ताहिक बंदी...

कोरोना संक्रमण काल में साप्ताहिक बंदी के नियम और कानून में कोई बदलाव नहीं हुआ, फिर जिला प्रशासन प्रतापगढ़ के द्वारा सभी तरह की दुकानों के लिए तुगलकी फरमान जारी कर साप्ताहिक बंदी का आदेश देकर तुगलक के शासन की याद दिला रहा है सप्ताह में एक दिन बंदी का नियम है वो भी लेबर एक्ट के तहत ये बंदी करने की ब्यवस्था है। इस बंदी का इतना ही मतलब है कि सप्ताह में एक दिन उसे अपने निजी कार्य करने का अवसर मिलना चाहिये ताकि वह अपना व अपने परिवार का कार्य उस एक दिन की छुट्टी में कर सके निजी कार्य का आशय जैसे बाल कटाना, कपड़ा धोना अपने इलाज के लिए चिकित्सक से मिलना, बैंक आदि का कार्य सम्मिलित है जबकि चौक घंटाघर के सामने राजगीर और मजदूर सुबह 8 बजे ही आकर सैकड़ो की संख्या में खड़े हो जाते हैं, जिनका श्रम विभाग में न तो रजिस्ट्रेशन है और न ही बीमा। क्या इन पर श्रम कानून लागू नहीं होता ? अधिकारियों के सामने नाबालिक बच्चे जो ई-रिक्शा चलाते रहते हैं और अधिकारीगण देख कर भी अपना मुँह घुमा लेते हैं। यही श्रम विभाग की असलियत है। 

प्रतापगढ़ में जिला प्रशासन मनमानी पर उतर गया है। हर जगह अलग-अलग इलाको में अलग-अलग दिनों में साप्ताहिक बंदी होती है, लेकिन जिला प्रशासन ने मनमाना निर्णय लेते हुए पूरे जिले में एक ही दिन शनिवार को बंदी लागू कर दी। जिसके चलते चाय नास्ते के और खाने पीने की दुकानों तक को बन्द कर दिया गया जिससे यात्रियों के सामने गम्भीर संकट खड़ा हो गया है राहगीर पानी तक को तरस रहे हैं तो वहीं चाय-पान के छोटे दुकानदार जो रोज कुआं खोदने और रोज पानी पीने वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए अपनी और अपने परिवार के जीविकोपार्जन हेतु हड्डी तोड़ मेहनत करके अपना गुजर बसर करते हैं। जिनकी गृहस्थी का सिर्फ यही एक मात्र सहारा है यदि पापी पेट की खातिर मजबूरी में दुकान खोल भी लेते हैं तो महामारी एक्ट में उनका चालान कर दिया जाता है और इनकी हैसियत से अधिक जुर्माना ठोक दिया जाता है। ऐसे में सवाल है कि जिले के आलाधिकारी कब समझेंगे कोरोना के सताए हुए गरीबों व मजलूमों की समस्या ? आखिर कैसे चलेगी इनके गृहस्थी की गाड़ी।

सूबे की योगी सरकार एक तरफ प्रवासी मजदूरों के लिए दिल खोलकर उन पर धन वर्षा और अनाज वर्षा करने का ढिढोरा पीट रही है और उन्हें अब फिर से दूसरे राज्य में जाकर खाना बदोशी जीवन बिताने के लिए मजबूर न होना पड़े, इसके लिए योगी सरकार सवा सौ करोड़ लोगों को रोजगार मुहैया करने के दावे भी कर रही है परन्तु उनके लिए योगी सरकार और उनका सिस्टम पूरी तरह दुश्मन बना बैठा है जिन्होंने अपने जिले और अपने प्रदेश में रहते हुए जीविकोपार्जन का अपना स्वयं का रोजगार तैयार किया। क्या योगी सरकार और उनके सिस्टम द्वारा ऐसे लोगों को हैरान व परेशां करना कहीं से उचित प्रतीत होता है ? जो ब्यक्ति अपना जीवन अपने जिले और प्रदेश में बिता दिया और दूसरे राज्यों में जाना अपने राज्य और जिले की तौहीन समझा। अपना नैतिक दायित्व समझकर अपने जिले और राज्य का मान बढ़ाना यदि अपराध है तो कोई बात नहीं। यदि कोरोना काल में सारी योजना प्रवासी मजदूरों के लिए ही है फिर तो जो अपने जिले और राज्य में अभी तक रहकर उसका मान व सम्मान बढ़ाए हैं, उन्हें जीना का हक़ नहीं है उन्हें अपने परिवार सहित भूखे मर जाना ही ठीक होगा  

1 टिप्पणी:

  1. व्यापार मंडल. श्रम अधिकारी व जिलाधिकारी को समस्या से अवगत कराये आपातकाल की तरह शासन नही चलेगा

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