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सोमवार, 13 जुलाई 2020

अफगानिस्तान और पाकिस्तान से संदर्भित ये सन्देश जरुर पढ़े

ये वक्त सोचने का नहीं कुछ करने का है, सोचने-सोचते कहीं देर न हो जाये वर्ना आने वाली नस्लें आपको कभी माफ नहीं करेंगी...

 अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बदतर होते हालात...
➤काबुल गुरुद्वारा हमले में 25 सिख मारे गए।
➤अफगानिस्तान के जलालाबाद में आत्मघाती हमले में 13 सिख मारे गए।
➤पेशावर में सिख कार्यकर्ता चरणजीत सिंह की गोली मारकर हत्या।
➤पाकिस्तान में तालिबान द्वारा जसपाल सिंह की सर काट कर हत्या।
➤पाकिस्तान के फाटा इलाके में सिखों को जज़िया देने के लिए मजबूर किया गया।
➤नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में सिखों की दुकानें लूट ली गई। उन्हें भागकर पेशावर आना पड़ा।
➤हाफ़िज़ सईद के रिश्तेदार अब्दुल रहमान मक्की द्वारा एक प्रेस कांफ्रेंस में गुरु नानक की निंदा की गई।
➤अफगानिस्तान में कोई सिख अगर मर जाता है तो उसकी शव यात्रा पर स्थानीय लोग पत्थर फैंकते है।
➤लेसिस्टर, ब्रिटेन में 40-50 सिखों ने मुग़ल दरबार रेस्तरा में घुसकर एक 15 साल की सिख लड़की की इज्जत से खिलवाड़ करने वाले मुस्लिम गैंग से मारपीट की।

पाकिस्तान शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सदस्य गोपाल सिंह चावला द्वारा हाफिद सईद को ननकाना साहिब में भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया। कनाडा में कुछ गुरुद्वारों द्वारा भारतीय दूतावास के अधिकारियों का आधिकारिक रूप से गुरुद्वारों में प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। 26 जनवरी को लंदन के भारतीय दूतावास के सामने पाकिस्तानी मुसलमानों के साथ मिलकर कुछ सिखों द्वारा कश्मीर और खालिस्तान की आज़ादी के नारे लगाए गए। बर्मा से निकाले गए रोहिंग्या मुसलमानों के लिए खालसा ऐड द्वारा लंगर और राहत शिविर लगाया गया।प्रधानमंत्री मोदी जी की ब्रिटेन यात्रा के दौरान उनके विरोध में क्कुह सिखों द्वारा विरोधी नारे लगाए गए और पाकिस्तानी मुसलमानों के साथ मिलकर भारत का झंडा उतार दिया गया। 

दिल्ली के शाहीन बाग CAA विरोधियों के लिए कुछ सिखों द्वारा लंगर लगाना। पहले वाली घटनाओं में एक बात समान है कि जिनका दमन हो रहा हैं वो सिख हैं और जो दमन कर रहे है। वह पाकिस्तानी या अफगानी मुसलमान है। दूसरी घटनाओं में कुछ सिख पाकिस्तानी मुसलमानों के साथ मिलकर हम हिन्दू नहीं है का सन्देश देना चाहते हैं। पहले वाली घटनाओं में सिखों के आगे केवल दो ही विकल्प हैं। या तो भारत भाग जाओ। या फिर इस्लाम स्वीकार कर लो दूसरी घटनाओं में गुरुद्वारों का प्रयोग अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए किया जा रहा हैं। पहले वाली घटनाओं पर कोई विदेश में बैठा सिख दो शब्द भी कभी पाकिस्तानी/अफगानी सिखों के हितों की रक्षा के लिए नहीं बोलते।

दूसरी घटनाओं में विदेश में बैठा सिख अपने धन-बल का प्रयोग केवल हम हिन्दू नहीं है और हिन्दू और सिखों के साँझा इतिहास को झुठलाने की कोशिश करने में लगा हैं। इन गलतियों का क्या दूरगामी परिणाम होगा? यह एक अंग्रेज लेखक के शब्दों में जानना उचित रहेगा।वर्ष-2005 में समाजशास्त्री डा. पीटर हैमंड ने गहरे शोध के बाद इस्लाम धर्म के मानने वालों की दुनियाभर में प्रवृत्ति पर एक पुस्तक लिखी, जिसका शीर्षक है ‘स्लेवरी, टैररिज्म एंड इस्लाम-द हिस्टोरिकल रूट्स एंड कंटेम्पररी थ्रैट’। इसके साथ ही ‘द हज’के लेखक लियोन यूरिस ने भी इस विषय पर अपनी पुस्तक में विस्तार से प्रकाश डाला है। जो तथ्य निकल करआए हैं, वे न सिर्फ चौंकाने वाले हैं, बल्कि चिंताजनक हैं।

उपरोक्त शोध ग्रंथों के अनुसार जब तक मुसलमानों की जनसंख्या किसी देश-प्रदेश क्षेत्र में लगभग 2 प्रतिशत के आसपास होती है, तब वे एकदम शांतिप्रिय, कानूनपसंद अल्पसंख्यक बन कर रहते हैं और किसी को विशेष शिकायत का मौका नहीं देते। जैसे अमरीका में वे (0.6 प्रतिशत) हैं, आस्ट्रेलिया में 1.5, कनाडा में 1.9, चीन में 1.8, इटली में 1.5 और नॉर्वे में मुसलमानों की संख्या 1.8 प्रतिशत है। इसलिए यहां मुसलमानों से किसी को कोई परेशानी नहीं है। जब मुसलमानों की जनसंख्या 2 से 5 प्रतिशत के बीच तक पहुंच जाती है, तब वे अन्य धर्मावलंबियों में अपना धर्मप्रचार शुरू कर देते हैं। जैसा कि डेनमार्क, जर्मनी, ब्रिटेन, स्पेन और थाईलैंड में जहां क्रमश: 2, 3.7, 2.7, 4 और 4.6 प्रतिशत मुसलमान हैं।

जब मुसलमानों की जनसंख्या किसी देश या क्षेत्र में 5 प्रतिशत से ऊपर हो जाती है, तब वे अपने अनुपात के हिसाब से अन्य धर्मावलंबियों पर दबाव बढ़ाने लगते हैं और अपना प्रभाव जमाने की कोशिश करने लगते हैं। उदाहरण के लिए वे सरकारों और शॉपिंग मॉल पर ‘हलाल’ का मांस रखने का दबाव बनाने लगते हैं, वे कहते हैं कि ‘हलाल’ का मांस न खाने से उनकी धार्मिक मान्यताएं प्रभावित होती हैं। इस कदम से कई पश्चिमी देशों में खाद्य वस्तुओं के बाजार में मुसलमानों की तगड़ी पैठ बन गई है। उन्होंने कई देशों के सुपरमार्कीट के मालिकों पर दबाव डालकर उनके यहां ‘हलाल’ का मांस रखने को बाध्य किया। दुकानदार भी धंधे को देखते हुए उनका कहा मान लेते हैं।

इस तरह अधिक जनसंख्या होने का फैक्टर यहां से मजबूत होना शुरू हो जाता है, जिन देशों में ऐसा हो चुका है, वे फ्रांस, फिलीपींस, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड, त्रिनिदाद और टोबैगो हैं। इन देशों में मुसलमानों की संख्या क्रमश: 5 से 8 फीसदी तक है। इस स्थिति पर पहुंचकर मुसलमान उन देशों की सरकारों पर यह दबाव बनाने लगते हैं कि उन्हें उनके क्षेत्रों में शरीयत कानून (इस्लामिक कानून) के मुताबिक चलने दिया जाए। दरअसल, उनका अंतिम लक्ष्य तो यही है कि समूचा विश्व शरीयत कानून के हिसाब से चले।

जब मुस्लिम जनसंख्या किसी देश में 10 प्रतिशत से अधिक हो जाती है, तब वे उस देश, प्रदेश, राज्य, क्षेत्र विशेष में कानून-व्यवस्था के लिए परेशानी पैदा करना शुरू कर देते हैं, शिकायतें करना शुरू कर देते हैं, उनकी ‘आॢथक परिस्थिति’ का रोना लेकर बैठ जाते हैं, छोटी-छोटी बातों को सहिष्णुता से लेने की बजाय दंगे, तोड़-फोड़ आदि पर उतर आते हैं, चाहे वह फ्रांस के दंगे हों डेनमार्क का कार्टून विवाद हो या फिर एम्सटर्डम में कारों का जलाना हो, हरेक विवादको समझबूझ, बातचीत से खत्म करने की बजाय खामख्वाह और गहरा किया जाता है। ऐसा गुयाना (मुसलमान 10 प्रतिशत), इसराईल (16 प्रतिशत), केन्या (11 प्रतिशत), रूस (15 प्रतिशत) में हो चुका है।

जब किसी क्षेत्र में मुसलमानों की संख्या 20 प्रतिशत से ऊपर हो जाती है तब विभिन्न ‘सैनिक शाखाएं’ जेहाद के नारे लगाने लगती हैं, असहिष्णुता और धार्मिक हत्याओं का दौर शुरू हो जाता है, जैसा इथियोपिया (मुसलमान 32.8 प्रतिशत) और भारत (मुसलमान 22 प्रतिशत) में अक्सर देखा जाता है। मुसलमानों की जनसंख्या के 40 प्रतिशत के स्तर से ऊपर पहुंच जाने पर बड़ी संख्या में सामूहिक हत्याएं, आतंकवादी कार्रवाइयां आदि चलने लगती हैं। जैसा बोस्निया (मुसलमान 40 प्रतिशत), चाड (मुसलमान 54.2 प्रतिशत) और लेबनान (मुसलमान 59 प्रतिशत) में देखा गया है। 

शोधकर्ता और लेखक डा. पीटर हैमंड बताते हैं कि जब किसी देश में मुसलमानों की जनसंख्या 60 प्रतिशत से ऊपर हो जाती है, तब अन्य धर्मावलंबियों का ‘जातीय सफाया’ शुरू किया जाता है (उदाहरण भारत का कश्मीर), जबरिया मुस्लिम बनाना, अन्य धर्मों के धार्मिक स्थल तोडऩा, जजिया जैसा कोई अन्य कर वसूलना आदि किया जाता है। जैसे अल्बानिया (मुसलमान 70 प्रतिशत), कतर (मुसलमान 78 प्रतिशत) व सूडान (मुसलमान 75 प्रतिशत) में देखा गया है।

किसी देश में जब मुसलमान बाकी आबादी का 80 प्रतिशत हो जाते हैं, तो उस देश में सत्ता या शासन प्रायोजित जातीय सफाई की जाती है। अन्य धर्मों के अल्पसंख्यकों को उनके मूल नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाता है। सभी प्रकार के हथकंडे अपनाकर जनसंख्या को 100 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा जाता है। जैसे बंगलादेश (मुसलमान 83 प्रतिशत), मिस्र (90 प्रतिशत), गाजापट्टी (98 प्रतिशत), ईरान (98 प्रतिशत), ईराक (97 प्रतिशत), जोर्डन (93 प्रतिशत), मोरक्को (98 प्रतिशत), पाकिस्तान (97 प्रतिशत), सीरिया (90 प्रतिशत) व संयुक्त अरब अमीरात (96 प्रतिशत) में देखा जा रहा है।

निष्कर्ष- पहले वाली सभी घटनाएं तभी घटित होती है जब मुस्लिम समाज की जनसँख्या बढ़ जाती हैं। दूसरी घटनाएं तभी तक हैं जब तक मुस्लिम समाज की जनसंख्या अभी अल्प या सीमित है। यूरोप, अमरीका, कनाडा में रहने वाले मेरे सिख भाई जो अपने क्षणिक लाभ और राजनीतिक हितों के लिए अलगाववाद की जहरीली बेल को पोषित करने का प्रयास कर रहे हैं। वे यह न भूले कि विदेशों में भी मुस्लिम जनसंख्या दर आज भी सिखों, हिन्दुओं और ईसाईयों से बहुत अधिक हैं। 

मुस्लिम समाज न केवल संगठित है, अपितु उसे क्या करना हैं ? वह उसे भली प्रकार से जानता है। इसलिए वे यह न समझे की उनका भविष्य सुरक्षित है। उनका भविष्य भी कोई सुरक्षित नहीं हैं। पाकिस्तान में जो आज सिखों और हिन्दुओं के साथ हो रहा है। आज से कुछ दशकों के बाद वही उनके साथ भी होगा। इसलिए अलगाववाद और विघटन का रास्ता छोड़कर हिन्दुओं के साथ मिलकर एकता और परस्पर सामंजस्य का रास्ता अपनाने में सभी का हित है। सोचे कहीं देर न हो जाये वर्ना आने वाली नस्लें आपको कभी माफ नहीं करेंगी।

1 टिप्पणी:

  1. बहुत पते की बात है। अच्छे विषय पर शोध किया गया, 100℅ सत्य।

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