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गुरुवार, 16 जुलाई 2020

तमाशा मत बनिये और तमाशा मत बनाइये

दलित होने का मतलब कोई भी अपराध कोई भी गलत काम करने की खुली छूट नहीं होता...

 मध्य प्रदेश के गुना में दलित उत्पीड़न पर राजनीतिक गुणा गणित...
संयोग देखिये कि मध्य प्रदेश के गुना में सरकारी कब्जा किए हुए किसान के खिलाफ हुई, जिस पुलिस कार्रवाई पर न्यूज चैनलों और सोशल मीडिया में कल से भूचाल आया हुआ है, वह घटना जिस दिन हुई, उसी दिन ही म. प्र. के ही मंडला जिले के बीजाडांडी औद्योगिक थाना क्षेत्र में हरीश और संतोष नाम के दो हत्यारे भाइयों ने भूमि के एक छोटे से टुकड़े पर कब्जे के विवाद में अपने चचेरे भाई राजेन्द्र समेत उसके परिवार के छह सदस्यों को तलवारों से काट कर मौत के घाट उतार दिया।

ध्यान रहे कि हरीश और संतोष, दोनों ही दलित हैं। अपने चचेरे भाई के जिस परिवार के छह सदस्यों को उन्होंने मौत के घाट उतार दिया, वह परिवार भी दलित ही है। आप स्वयं तय करें कि कौन सी घटना ज्यादा नृशंस है ? ज्यादा जघन्य है ? किस घटना पर लुटियनिया मीडिया में हाहाकार मचा हुआ है और किस घटना पर लुटियनिया मीडिया ने मुर्दों की तरह मौन साध लिया है ? गुना की घटना पर हो रहा मीडियाई तांडव कितना सही, कितना गलत है ? यह जानने के लिए गुना की घटना को लेकर कुछ तथ्यों पर हो रहे हुड़दंग का सच भी समझिए।
दलित दम्पत्ति ने पुलिस के सामने पिया कीटनाशक...
पहला तथ्य है कि पुलिस की बर्बरता का है। मैंने भी वह वीडियो कई बार देखा। वीडियो में पुलिस जिस तरह से लाठी चला रही है, उसे बर्बरता कहने वाले मूर्ख यह भलीभांति समझ लें कि जब पुलिस बर्बरता पर उतारू होती है तो उस तरह लाठी नहीं चलाती जिस तरह वीडियो में चलाती दिख रही है। इसके बजाय पुलिस की लाठी जब बर्बर होती है तो सामने पड़ने वाले आदमी को लहूलुहान कर देती है, वह आदमी अपनी टूटी हुई हड्डियों के जुड़ने की प्रतीक्षा महीनों तक अस्पताल के बिस्तर पर करता है।

दूसरा तथ्य है कि 20 बीघा सरकारी जमीन पर कब्जा करके उस पर खेती करने का दुस्साहस करने वाला धूर्त क्या एक गरीब मजबूर दलित किसान मात्र था ? देश की आंखों में यह धूल लुटियनिया मीडिया तो खैर झोंक ही रहा है। कुछ लोग खुद अपने हाथों से ही यह धूल अपनी आंखों में झोंक रहे हैं।
मध्य प्रदेश के गुना में गुनाह किसका...
तीसरा तथ्य है कि पुलिस वहां पहली बार और अचानक नहीं प्रकट हुई थी। कब्जे के कारण उस जमीन पर इंजीनियरिंग कॉलेज का निर्माण कार्य पिछले दो महीनों से रुका हुआ था। स्पष्ट है कि पिछले दो महीनों के दौरान भूमि खाली कराने के लिए पुलिस और जिला प्रशासन के अधिकारियों के कई चक्कर वहां लगे होंगे, भूमि अधिग्रहण कम से कम डेढ़ दो साल पहले ही हुआ होगा। अर्थात्‌ केवल उस गांव नहीं बल्कि आसपास के कई गांवों को यह मालूम था कि यह सरकारी जमीन है। लेकिन कब्जा करने वाला क्योंकि दलित है। इसलिए पुलिस को उसके सामने क्या हाथ जोड़ कर खड़ा रहना चाहिए था और जब तक वह अपनी मर्जी से नहीं हटता तब तक उसकी प्रतीक्षा करनी चाहिए थी ?

दशकों तक उत्तर प्रदेश में कब्जाई गई हजारों करोड़ रुपये की सरकारी जमीन को पिछले तीन वर्षों के दौरान मुख्यमंत्री योगी ने अवैध कब्जे से मुक्त कराया है। यह कार्रवाई सरकारी तंत्र द्वारा हाथ जोड़कर नहीं की गयी है। जमीन पर अवैध कब्जा जमाए धूर्तों ने भूमि का कब्जा हटाने आए पुलिस और प्रशासनिक दलों को लड्डू खिलाकर, माला पहना कर उनका स्वागत नहीं किया था। बहुत कठोर कार्रवाई करके ही अपने उद्देश्य में सफल हुई है,योगी सरकार।

प्रस्तुति :- सतीश मिश्र

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