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गुरुवार, 23 जुलाई 2020

अपनी कलम को अपनी तलवार बनाकर भारत माता को आज़ाद कराने वाले बाल गंगाधर तिलक

स्वराज की लड़ाई लड़ने वाले थे,लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक...!!!
 लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक...
स्वराज यह मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं, इसे लेकर ही रहूँगा- ये वाक्य आज के नहीं है, मगर इसको पढ़ने और सुनने के बाद हर बार इस वाक्य को कहने वाले बाल गंगाधर तिलक की याद आ ही जाती है। ऐसे उत्साह और जोश भरने वाले बाल गंगाधर तिलक का आज जन्मदिन है। बाल गंगाधर तिलक को लोकमान्य तिलक के नाम से भी जाना जाता है। लोकमान्य का शीर्षक भी इन्हीं को दिया गया था। लोकमान्य का अर्थ है लोगों द्वारा स्वीकृत किया गया नेता। लोकमान्य के अलावा इनको हिंदू राष्ट्रवाद का पिता भी कहा जाता है।

बाल गंगाधर तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से 1890 में जुड़े। वे अपने समय के सबसे प्रख्यात आमूल परिवर्तनवादियों में से एक थे। इसके अलावा वो जल्दी शादी करने के भी विरोधी थे। इसी वजह से वो शुरु से ही 1891 एज ऑफ़ कंसेन्ट विधेयक के खिलाफ थे, क्योंकि वे उसे हिन्दू धर्म में अतिक्रमण और एक खतरनाक उदाहरण के रूप में देख रहे थे। इस अधिनियम ने लड़की के विवाह करने की न्यूनतम आयु को 10 से बढ़ाकर 12 वर्ष कर दिया था
 तिलक जी को आधुनिक भारत का निर्माता कहा गया...

बाल गंगाधर जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए, उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ही देश की एक राजनितिक पार्टी थी, लेकिन जल्द ही वे कांग्रेस के नरमपंथी रवैये के विरुद्ध हो गए, वो उनके विरोध में बोलने लगे। इसके अलावा कई अन्य नेता भी इसी तरह से विरोध में बोलने लगे और कई समर्थन में बोलने लगे। जिसकी वजह से 1907 में कांग्रेस गरम दल और नरम दल में विभाजित हो गयी। गरम दल में तिलक के साथ लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल शामिल हो गए, इन तीनों को लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाने लगा। 1908 में तिलक ने क्रान्तिकारी प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस के बम हमले का समर्थन किया जिसकी वजह से उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) स्थित मांडले की जेल भेज दिया गया। जेल से छूटकर वे फिर कांग्रेस में शामिल हो गए और 1916 में एनी बेसेंट और मुहम्मद अली जिन्ना के साथ अखिल भारतीय होम रूल लीग की स्थापना की। 

एक गंगाधर तिलक ने इंग्लिश में मराठा दर्पण व मराठी में केसरी नाम से दो दैनिक समाचार पत्र शुरू किए, ये दोनों जल्द ही जनता में बहुत लोकप्रिय हो गए। तिलक ने अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीन भावना की बहुत आलोचना की थी। इनकी मांग थी कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों को पूर्ण स्वराज दे। वो अपने अखबार केसरी में अंग्रेजों के खिलाफ काफी आक्रामक लेख लिखते थे। इन्हीं लेखों की वजह से उनको कई बार जेल भेजा गया। बाल गंगाधर तिलक ने एक समय अपने पत्र केसरी में "देश का दुर्भाग्य" नामक शीर्षक से लेख लिखा था जिसमें ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध किया गया था। इस वजह से उनको भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए के अन्तर्गत राजद्रोह के खिलाफ 27 जुलाई 1897 को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें 6 वर्ष के कठोर कारावास के अंतर्गत माण्डले (बर्मा) जेल में बन्द कर दिया गया था। इसी के बाद वर्ष-1970 में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय दंड संहिता में धारा 124-ए जोड़ा था जिसके अंतर्गत "भारत में विधि द्वारा स्थापित ब्रिटिश सरकार के प्रति विरोध की भावना भड़काने वाले व्यक्ति को 3 साल की कैद से लेकर आजीवन देश निकाला तक की सजा दिए जाने का प्रावधान था।"

तिलक जी को भारतीय क्रान्ति का जनक भी कहा जाता है...
वर्ष-1898 में ब्रिटिश सरकार ने धारा 124-ए में संशोधन किया और दंड संहिता में नई धारा 153-ए जोड़ी जिसके अंतर्गत "अगर कोई व्यक्ति सरकार की मानहानि करता है यह विभिन्न वर्गों में नफरत फैलाता है या अंग्रेजों के विरुद्ध घृणा का प्रचार करता है तो यह भी अपराध होगाब्रिटिश सरकार ने उन्हें 6 साल के करावास की सजा सुनाई। कारावास के दौरान तिलक ने जेल प्रबंधन से कुछ किताबों और लिखने की मांग की लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ऐसे किसी पत्र को लिखने पर रोक लगा दी जिसमें राजनैतिक गतिविधियां हो। तिलक ने कारावास में एक किताब भी लिखी, कारावास की सजा पूर्ण होने के कुछ समय पूर्व ही बाल गंगाधर तिलक की पत्नी का स्वर्गवास हो गया। इस खबर की जानकारी उन्हें जेल में भी एक खत से हुई। ब्रिटिश सरकार की तुगलकी नीतियों की वजह से वो अपनी म्रतक पत्नी के अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाए थे।

कांग्रेस की अमृतसर बैठक में हिस्सा लेने के लिए स्वदेश लौट रहे थे, इतने समय तक तिलक इतने नरम हो गए थे कि उन्होंने मॉन्टेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड सुधारों के द्वारा स्थापित लेजिस्लेटिव कौंसिल (विधायी परिषद) के चुनाव के बहिष्कार की गांधी की नीति का विरोध ही नहीं किया। इसके बजाय तिलक ने क्षेत्रीय सरकारों में कुछ हद तक भारतीयों की भागीदारी की शुरुआत करने वाले सुधारों को लागू करने के लिए प्रतिनिधियों को यह सलाह अवश्य दी कि वे उनके सहयोग की नीति का पालन करें। लेकिन नये सुधारों को निर्णायक दिशा देने से पहले ही 1 अगस्त, 1920 ई. को मुंबई में उनकी मृत्यु हो गयी। उनकी मौत पर श्रद्धाञ्जलि देते हुए महात्मा गांधी जी ने उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता कहा, जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें भारतीय क्रान्ति का जनक कहा था।

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