वर्तमान चीनी नेतृत्व लालची अमेरिकनों और मुनाफाखोर यूरोपियनों को ठेंगा दिखाकर हथिया लेना चाहता है,विश्व का राजनीतिक नेतृत्व

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भारत, अमेरिका और चीन का राष्ट्राध्यक्ष...
इसे संयोग कहे या इत्तेफाक ! सारा बवाल हिंदुस्तान को लेकर होता है, लेकिन तूफान अमेरिका खड़ा करता है। जैसे कोलंबस निकला था, हिंदुस्तान ढूंढने और पहुंच गया अमेरिका। अब अमेरिका न ढूंढा गया होता तो दुनिया परेशान क्यों होती ? वर्ष-1946 में आजादी पाने वाला चीन माओत्से तुंग के पंजों में फंसा हुआ अफीम खाकर सोता हुआ देश था। कम्युनिस्टी चोला ओढ़कर वह एक तानाशाही देश था और इसी कारण उस समय की विश्व शक्ति रूस से भी उसकी ठीक-ठाक पटती नहीं थी। 90 के दशक के ठीक पहले जब विश्व का कम्युनिटी ढांचा चरमरा रहा था तो अमेरिका को जापान कोरिया वियतनाम आदि देशों से अपना पंजा सिकोड़ना था। दुनिया में दो ध्रुवों पर टिका बाजार अब अकेले अमेरिका की तरफ जा रहा था इसलिए उपभोक्ता सामानों की बिक्री का बाजार जापान कोरिया वियतनाम तथा अन्य पूर्वी देशों से हटाकर अमेरिका सस्ते उत्पादन की जगह ढूंढ रहा था और ऐसे में नकली कम्युनिस्ट देश चीन से बढ़िया कोई जगह नहीं थी, क्योंकि वहां मानवाधिकारों के नाम पर श्रमिकों का खून चूसने के खिलाफ लड़ने वाला कोई नहीं था।

ट्रम्प और सी जिनपिंग...
"परिणाम यूरोप और अमेरिका की सारी पूंजी सस्ते उपभोक्ता सामानों के उत्पाद के लिए चीन में झोंक दी गई और अफीम खाकर सोते हुये चीन को डेकाड्रान का इंजेक्शन लगाकर दौड़ा दिया गया। डॉलर और पाउंड की चाबुक से दौड़ता हुआ घोड़ा कब ड्रैगन बनकर आग उगलने लगा, इसका अंदाजा अमेरिका को तब हुआ जब यूरोप के देशों के धन से खड़ी हुई बड़ी बड़ी चीनी कंपनियों ने अमेरिकी कंपनियों को ठेंगा दिखाना शुरू किया। यहां बिना विषय अंतर किए यह बताना जरूरी है की 15 वी शताब्दी से समुद्री यात्राएं कर यूरोप के 10-12 देशों ने 300 सालों में दुनिया का संकलित 80% धन लूट कर रख लिया और जिसके निवेश से ही प्रथम विश्व युद्ध के बाद अपराधी, डाकू-गुंडा और रंग भेदी तथा जंगली अमेरिका चालाक चीता बनकर खड़ा हो गया। जान लीजिए चीता एक खूंखार जानवर है, लेकिन यह छलिया और डरपोक भी है। अपने से कमजोर को डराना उसका भोजन छीन लेना किंतु अपने से मजबूत के सामने दांत निपोर देना इसका शगल होता है। द्वितीय विश्व युद्ध में बुरी तरह पिटे यूरोप को रूस के नाम पर अमेरिका ने 40 वर्ष तक डरा कर रखा और जो यूरोप की जमा पूंजी का मनमाना लाभ उठाया..."

अमेरिका और चीन का फ्लैग एक दूसरे को काटता हुआ...
लेकिन तमाशा तब शुरू हुआ जब शीत युद्ध के बाद यूरोप के सिर से रूस का भय समाप्त हुआ तो यूरोप ने ज्यादा मुनाफे के लिए अपनी जमा पूंजी का काफी बड़ा हिस्सा अमेरिका से निकालकर चीन सहित इन पूर्वी देशों में लगाया। यह सही है कि निवेश का यह कार्य यूरोपियों ने अमेरिकी कंपनियों के माध्यम से ही किया था। क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध के बाद घर बैठे मुनाफा अर्थात ब्याज खाने वाला यूरोप काफी हद तक आलसी हो चुका था। पूरी दुनिया में अपनी गुंडागर्दी से 90 के दशक में खुले बाजार की नीति लागू करवाने वाला अमेरिका तब यह अनुमान नहीं लगा पाया था कि इसका फायदा सस्ते श्रम और भारी जन बल के कारण चीन उठा लेगा। इसके विपरीत यूरोप सहित अमेरिका को यह संदेह था कि भारत एक ऐसा देश है, जिसके अंदर कभी भी खड़े होकर स्वत: मजबूत बन जाने की भारी क्षमता है। इसलिए इन सभी मित्र देशों ने मिलकर भारत का बटवारा कराने के बाद उसे विभिन्न स्व निर्मित समस्याओं में छकाए रखा। दुर्भाग्य से भारत में राजनीतिक सत्ता संभालने वाले लोगों की सोच भी बेहद व्यक्तिगत रही और उसका भी काफी समय तक यह मित्र देश लाभ उठाते रहे।

ट्रम्प की अदा देखते ही बनती है...
जैसा कि मैंने पहले लिखा कि भारत की भूमि उर्वरा है और कभी न कभी यहां से अंकुर फूटना था। परिस्थितियां मिलते ही एक शक्तिशाली भारत खड़ा हुआ जो यूरोप तथा अमेरिका को ही नहीं उनके व्याभिचार से उत्पन्न चीन को भी चुनौती दे रहा है। अब मजेदार बात यह है वर्तमान चीनी नेतृत्व लालची अमेरिकनो और मुनाफाखोर यूरोपियनों को ठेंगा दिखाकर विश्व का राजनीतिक नेतृत्व भी हथिया लेना चाहता है। बस झगड़ा इसीलिए खड़ा हो रहा है और भारत इस समय रेफरी की भूमिका में है या यूं कहें कि भारत जिस ओर खड़ा होगा दूसरी ओर पराजय होगी। इसलिए भारत के नागरिकों को अपने नेतृत्व के साथ दृढ़ता से खड़े होना पड़ेगा। हर बात पर सवाल मत करिए और नेतृत्व पर भरोसा करिए इस भरोसे का कारण भी है आज से 6 वर्ष पूर्व विश्व में भारत के ऐसे गौरव की कभी सपने में भी आपने कल्पना की थी, किंतु आज साकार हुआ और उसका श्रेय इस नेतृत्व को ही जाता है इसलिए फिलहाल सहमत हो अथवा सहमत किंतु नेतृत्व पर सवाल मत खड़े करिए और शांति से किंतु सजग और क्रियाशील रहते हुए बैठिए।

सी जिनपिंग और ट्रम्प एक दूसरे से नहीं हैं,कम...
यहां कोरोना संकट पर ना लिखा तो बात अधूरी रह जाएगी। कोरोनावायरस बड़ा मजेदार है। विश्व में एलोपैथिक दवाओं का कारोबार स्वीडन स्वीटजरलैंड को केंद्र बिंदु मानकर यूरोप के 10 देशों ने 200 वर्षों में खड़ा किया और यही 10 छोटे देश आज भी पूरी दुनिया में एलोपैथिक दवाओं के 65% बाजार पर कब्जा किए हुए हैं। आंकड़ों में ना देखा जाए तो यह कारोबार खरबों खरब रुपयों का है। यहां भी दवाओं के सतत अनुसंधान के लिए चीन की जमीन सबसे उपयुक्त बनी। खतरनाक दवाओं के परीक्षण के लिए यहां अथाह मानव जीवन उपलब्ध था। यहां यूरोप जैसे दवाओं के परीक्षण के कड़े नियम नहीं थे। फलस्वरूप सभी बड़ी दवा कंपनियों की दर्जनों प्रयोगशालाएं चीन में स्थापित हो ग‌ईं और हां जिसका आजकल खूब नाम हो रहा है वुहान, वह खतरनाक अनुसंधानों  का केंद्र बिंदु बना। यूरोप की दवा कंपनियों की गला काट प्रतिस्पर्धा और सबसे पहले "मैं और  मेरा मुनाफा" इसी में पैदा हो गया कोरोना। इसलिए कोरोना वायरस का जन्म टेस्ट ट्यूब प्रणाली से हुआ है अर्थात उसका जनक यूरोप है, किंतु गर्भाशय चीन है। मजेदार बात यह है कि जब यह भस्मासुर चीन में निकल कर दौड़ा तो चीन को आभास हुआ कि हजारों हजार मील दूर बैठा अमेरिका इसका न सिर्फ मजा लेगा, अपितु दुनिया के अर्थतंत्र पर कब्जा कर लेगा। फलस्वरूप चीन ने जानबूझकर इस भस्मासुर का रक्तबीज अमेरिका में छलकवाया जिसके चलते घौलरवा बंदर ट्रंप खों खों करते रहते हैं।

प्रस्तुति:-गिरीश चन्द्र सिन्हा

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