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मंगलवार, 9 जून 2020

कुकुरमुत्ते की तरह हो गए हैं पत्रकार


दलाली पद्धति पर आधारित हो चुकी है आधुनिक पत्रकारिता...

दीवालों पर पत्रकारों के लिखा ये स्लोगन...
नाम, शोहरत, पैसे की चमक ने समाज के आईने को गन्दा करके रख दिया। 'पत्रकारिता' जो पांच शब्दों के मेल से बना है, उसका अर्थ को न समझ पाने वाले लोग अपने को पत्रकार बताने और लिखने में गुरेज नहीं करते। मोटरसाईकिल के आगे पीछे प्रेस लिखा लिया और बन गए पत्रकार। कुछ पत्रकार तो सिर्फ अपने नाम और शोहरत के लिए पत्रकार बन बैठे हैं। कुछ अपनी दलाली को चमकाने के लिए सुबह होते ही सरकारी दफ्तरों में इनके आने-जाने का दौर शुरू हो जाता है तो दफ्तर बन्द होने तक उन्हें वहीं मंडराते हुए देखा जा सकता है।पत्रकारिता को राजनीति अपने आगोस में लेकर उसे चबाने का काम किया है। चूँकि अधिकतर पत्र-पत्रिका और न्यूज़ चैनेल के मालिक वही हैं। अब उसमें नौकरी करने वाला सिर्फ एक नौकर हैं। सुबह से शाम तक खबरों की मंडी सजती है और उचित दाम मिलते ही उसे बेंच दिया जाता है। कईयों की चाय तो थाने में ही होती है। कोई विकास भवन का चक्कर लगाता है तो तहसील और ब्लाक मुख्यालय वाले ब्लाक और तहसीलों का चक्कर लगाते देखे जा सकते हैं।  


"जब ब्रेकिंग और स्क्रिप्ट लिखने का ज्ञान नहीं तो क्यों बन गए पत्रकार ? ऐसे पत्रकारों से कौन करे सवाल ? 25 हजार रुपये मिनिमम धनराशि जमाकर आई डी और माइक लेकर ब्युरो चीफ बन जाते हैं और ब्युरो चीफ का मतलब भी पता नहीं होता। जबकि हकीकत में उनका पद स्ट्रिंगर का होता है। स्लग का अर्थ भी न जानने वाले आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बड़के पत्रकार बन गए हैं छोटे से उद्योग विहीन जनपद प्रतापगढ़ में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लगभग 200 पत्रकार आई डी और पिट्ठू बैग लेकर जेब खर्च और दो जून की रोटी की तलाश में दर -दर की ठोकरे खाते हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के 90फीसदी पत्रकारों को ब्रेकिंग और स्क्रिप्ट, पीटीसी, वाक थ्रू आदि बातों का ज्ञान नहीं  है या तो वो कॉपी पेस्ट करें अथवा किसी से लिखवायें तब जाकर उनकी पत्रकारिता होती है। यानि पत्रकारिता भी उधार की हो चली है। फिर भी चैनल वाले ऐसे मुर्खानंदों को अपने संस्थान की आई डी और माइक दे रखे हैं। क्या है,चैनल मालिकों की मजबूरियां...???"
पहले पत्रकारिता से जुड़े लोग मिशन की तरह काम करते थे। आज ब्यवसायिक दृष्टि से कार्य कर रहे हैं। फिर उनसे समाज का आईना होने की उम्मीद करना बेईमानी होगी। पत्रकारिता क्षेत्र से जुड़े लोंगों के भी बीबी बच्चे होते हैं। उनके प्रति उनका दायित्व भी जुड़ा होता है। अब सिर्फ समाज सेवा करने से तो परिवार का पेट भरेगा नहीं। समाज में भी विकृतियां ब्याप्त हो गई हैं। पहले समाज के लोगों द्वारा ऐसे समाजसेवी की मदद की जाती थी और आज वो बात नहीं रह गई है। समाज में हर वर्ग में भारी गिरावट हो चुकी है। यही कारण है कि समाज में एकजुटता समाप्त होती जा रही है। ग्रामीण पत्रकारों की स्थिति तो और बद्तर है। ग्रामीण पत्रकारिता में कोटेदार और प्रधान को ही आधुनिक युग के कलयुगी पत्रकार टारगेट करते हैं। ग्रामीण पत्रकारों की दशा ये है कि बिना थाना पहुँचे उनका हाजमा ही दुरुस्त नहीं होता। कई जिलों में तो चार से छः पत्रकार एक दो गाड़ी की ब्यवस्था करके पीएम आवास, शौंचालय और ग्राम सभा स्तर पर ग्राम प्रधान की जाँच करने पहुँच जाते हैं। अब जाँच अधिकारी समझकर ग्राम प्रधान उन्हें शर्माते शर्माते 500 पांच सौ रुपये के हिसाब से चार हैं तो 2000 दो हजार और छः हैं तो 3000 तीन हजार की विदाई देकर अपना पिंड छुड़ा कर चैन की सांस लेते हैं। आज की आधुनिक पत्रकारिता का यही स्वरूप हो चुका है जो कोरोना से भी भयावह है

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