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मंगलवार, 9 जून 2020

डकैत के खानदान का नाम लेकर राम सिंह पटेल जैसे जनप्रतिनिधि वर्चस्व कायम रहने के लिए करते हैं जातिवादी राजनीति

पूर्व विधायक राम सिंह ने माना कि आडियो उन्हीं का है और आवाज भी उन्हीं की है, परन्तु उसमें छेड़ छेड़ की गई है । राम सिंह ने सफाई दी है कि उन्होंने अगड़ी जाति के लोगों को उनके द्वारा किसी भी प्रकार की कोई धमकी नहीं दी है । अपने खिलाफ साजिश की बात करके पूरे मामले पर चुप्पी साध लिए...


 राम सिंह जैसे नेता बर्चस्व कायम रहने के लिए करते हैं जातिवादी राजनीति 
बीहड़ के दुर्दांत डकैत ददुआ और अपने परिवार एवं खानदान की याद दिलाकर अपनी रगो में बहते खून की बात दोहराकर अगड़ी जातियों एवं पट्टी के विधायक और योदी के कद्दावर मंत्री को पूर्व विधायक राम सिंह ने धमकी दी जिसके बाद दी गयी धमकी का आडियो वायरल हुआ। जनता ने राम सिंह को माननीय तो बना दिया परन्तु इनके अंदर माननीय के गुण नहीं आ सका। तभी तो वो एक जाति के संघर्ष हेतु अगड़ी जाति के लोगों को निशाने पर ले रहे हैं। ऐसा कोई जनप्रतिनिधि आज तक इस धरती पर पैदा नहीं हुआ जो ये सार्वजनिक रूप से चुनाव के दरमियान सीना ठोंक कर कह सके कि उसे सिर्फ उसी जाति और उसी समुदाय का वोट चाहिए। राम सिंह में यदि बीहड़ का भूत अभी भी सवार हो तो वो चुनाव में ये कहकर दिखाएं कि उन्हें अगड़ी जाति के लोगों का वोट नहीं चाहिए। यदि बीहड़ का स्वाद इतना ही बेहतरीन था तो उन्हें बीहड़ में ही रहना चाहिए था न कि पट्टी विधान सभा से विधायकी लड़कर विधायक नहीं बनना चाहिए था। 


सत्ता सुख के लिए दल को नहीं देते तवज्जो राम सिंह और बाल कुमार पटेल 
"मैं राम सिंह पटेल उस परिवार से हूं जो वंचितों और शोषितों की लड़ाई के लिये जंगल का रास्ता अख्तियार कर लिया था। जिस भाषा में, जिस लहजे में, विरोधी जवाब चाहतें हैं, जवाब दूँगा। प्रतिशोध की सियासत में प्रतापगढ़ के नेता 'जातिवादी जहर' को हवा दे रहे हैं । प्रतापगढ़ के पट्टी विधानसभा इलाके के पूर्व विधायक राम सिंह पटेल का ऑडियो वायरल। धुई गांव में प्रधान पुत्र अनिल तिवारी और पटेल बिरादरी के बीच मारपीट के मामले में सियासत चरम पर है बीते 22 मई को हॉट स्पॉट इलाके में प्रधान पुत्र अनिल तिवारी के साथ मारपीट के बाद वोटबैंक की जातिवादी सियासत का गन्दा खेल उक्त घटना पर शुरू है..."
 मरने के बाद बीहड़ में पूजा जाता है, दुर्दांत डकैत ददुआ 
राजनीति की कामयाबी में बाहुबल और धनबल का हमेशा बोलबाला रहा। परन्तु मुलायम सिंह यादव, मायावती और कांशीराम सहित लालू प्रसाद यादव ने उत्तर प्रदेश एवं बिहार में तो जातिवाद का ऐसा बीज राजनीति में बोया कि वह अब नासूर बन चुका है। उत्तर प्रदेश की बात करें तो माया और मुलायम के बाद सोनेलाल पटेल ने पटेल/कुर्मी विरादरी की राजनीति शुरू की जिसे उनकी पुत्री अनुप्रिया पटेल आगे बढ़ा रही हैं। इसी बीच समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह प्रदेश भर में अलग-अलग जाति के नेताओं को जातिगत वोटबैंक के मद्देनजर उन्हें तरजीह देकर समाजवादी कुनबे को मजबूत करने का कम किया था। उन्हीं नेताओं में से एक थे,बाल कुमार पटेल जो बीहड़ के दुर्दांत डकैत ददुआ का सगा भाई था। मुलायम सिंह का बीहड़ के डकैतों के प्रति ये पहला प्रेम नहीं था। इसके पहले बीहड़ की दस्यु सुन्दरी फूलन देबी को मुलायम सिंह ने सपा में शामिल ही नहीं किया बल्कि उसे समाजवादी से मिर्जापुर से उम्मीदवार बनाया और चुनाव जितवाकर डकैत से माननीय बना दिया था,जिसकी बाद में हत्या हो गयी थी। 

राम सिंह के बड़े पिता डकैत ददुआ और पिता बाल कुमार पटेल 
उ प्र के पट्टी विधान सभा से विधायक रहे और समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष की कमान सँभालने के बाद भी आज बीहड़ के दुर्दांत डकैत ददुआ के नाम का सहारा लेकर पूर्व विधायक राम सिंह पटेल जिस तरह पट्टी विधान सभा की जनता और वहाँ से प्रतिनिधित्व करने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं योगी सरकार के ताकतवर मंत्री मोती सिंह का नाम लेकर जिस अंदाज में धमकी दे रहा है वो स्वस्थ समाज के लिए किसी भी दृष्टिकोण से उचित प्रतीत नहीं होता। पट्टी विधान सभा के धुई से सटे गोविंदपुर गांव के प्रकरण में पटेल जाति और ब्राह्मण जाति के बीच हुए झगड़े को जिस तरह जातिवादी हवा दी गई उससे समाज में जाती संघर्ष को बल मिला। धुई से सटे गोविंदपुर गांव के प्रकरण में डकैत ददुआ के भतीजे राम सिंह पटेल ने इलाके के विधायक व कैबिनेट मंत्री राजेन्द्र प्रताप सिंह उर्फ मोती सिंह की शह पर तांडव करने का आरोप लगाते हुए बीहड़ और अपने खानदान एवं अपने परिवार का इतिहास बार-बार दोहरा कर खुंखार दुर्दांत डकैत शिव कुमार पटेल उर्फ ददुआ का नाम लिए बिना अगड़ी जाति के लोगों को सामूहिक धमकी दी।  

 समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष बनने पर हुआ था राम सिंह का स्वागत 
अपना दल, सपा और कांग्रेस नेताओं ने धुई से सटे गोविंदपुर गांव पहुँचकर सियासत को हवा दी ! डीएम डॉ रूपेश कुमार ने धुई मामले में मजिस्ट्रेटियल जांच का आदेश दिया है। फिर भी ये वोटबैंक बनाने वाले नेताओं की आदत ख़राब है। अपने वोटबैंक और राजनीतिक लाभ के लिए ये कोई मौका छोड़ना नहीं चाहते। इन्हें लाशों पर भी राजनीति करने में कोई हिचक नहीं होती ! प्रधान पुत्र से मारपीट के बाद फैली अफवाह के बीच पटेल पक्ष के सैकड़ों लोगों ने प्रधान के घर धावा बोल दिया था। पुलिस कर्मियों पर पथराव के साथ आगजनी भी की गयी। आधा दर्जन से अधिक थानों की पुलिस मौके पर पहुँच कर बेकाबू हालात पर काबू पाया था। उसके बाद से सियासतदानों की सियासत चरम पर है। उन्हें लगता है कि मौका अच्छा है इसमें पहुँचकर बहती गंगा में हाथ धोने से सारे कार्य हो जायेंगे। जो जातिवादी सोच के वशीभूत रहे वो नेता तो अपनी ही विरादरी तक जाकर अपने को सीमित रखा और जिन्हें अपनी छवि सेक्युलर पेश करनी थी वो दोनों पक्ष के घर जाकर मामले को समझ बूझकर वापस हो लिए। 

 लोकसभा चुनाव में सपा को लात मारकर कांग्रेस से मिला लिया था हाथ 
जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन दिखाने के लिए नेताओं पर लॉकडाउन के दौरान राष्ट्रीय आपदा कानून का उल्लघंन करने का मुकदमा भी पंजीकृत हुआ। पूर्व विधायक राम सिंह पटेल चुनाव हारने के बाद से पट्टी और पट्टी की जनता से कोई वास्ता व सरोकार भले ही न रखते हों, परन्तु जातिवादी राजनीति के खिलाड़ी राम सिंह पटेल आम चुनाव- 2022 से पहले अपने वजूद और वोटबैंक की याद ताजा कराने से पीछे नहीं रहे। राम सिंह पटेल और पिता बाल कुमार पटेल समाजवादी पार्टी के सुप्रीमों अखिलेश यादव से मिले थे तो राजनीतिक पंडितों ने माना था कि ये मुलाकात घर वापसी के लिए ही हुई है। अंदरखाने की बात करें तो समाजवादी पार्टी के सुप्रीमों अखिलेस्श यादव ने बाल कुमार पटेल और राम सिंह पटेल को टका सा जवाब देकर वापस कर दिया था। अखिलेश यादव का कहना है कि उनकी पार्टी में आपराधिक प्रवित्ति के लोगों को कत्तई स्वीकार नहीं किया जाएगा ये वो समाजवादी पार्टी नहीं रही जब आपराधिक इतिहास वालों का इसमें बोलबाला हुआ करता था। उदाहरण के लिए पूर्वांचल के बाहुबली मुख़्तार अंसारी, इलाहाबाद के डॉन अतीक अहमद और कुंडा के गुंडा नाम से विश्व विख्यात राजा भईया को अखिलेश यादव कभी तवज्जों नहीं दिए। इन बाहुबलियों का समाजवादी पार्टी में सिर्फ मुलायम राज तक ही प्रभाव रहा। 

पिता बाल कुमार पटेल के दम पर अकड़ते हैं राम सिंह
पूर्व विधायक राम सिंह पटेल के पिता बाल कुमार पटेल हैं, जिन्होंने सपा छोड़ कांग्रेस का दामन थामा है। बाल कुमार पटेल वर्ष- 2009 में मिर्जापुर लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट से सांसद चुने गए थे। इसके बाद वर्ष- 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा ने उन्हें बांदा लोकसभा सीट से अपना प्रत्याशी बनाया था, लेकिन मोदी लहर में वो चुनाव जीत नहीं सके। वर्ष-2019 के लोकसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी से दावेदारी कर रहे थे। अखिलेश यादव ने उन पर भरोसा नहीं जताया है। सत्ता के लालची बाल कुमार पटेल दिल्ली में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी से मुलाकात की। बाल कुमार पटेल उत्तर प्रदेश में कुर्मियों के बड़े नेता हैं। खासकर बुंदेलखंड में कुर्मी समुदाय के बीच काफी उनका जनाधार है। बाल कुमार पटेल के बेटे राम सिंह प्रतापगढ़ के सपा जिला अध्यक्ष रह चुके हैं। राम सिंह प्रतापगढ़ की पट्टी विधानसभा सीट से सपा विधायक रहे हैं। वर्ष-2017 के चुनाव में बीजेपी के मोती सिंह के हाथों बहुत कम वोटों से हार गए थे। बाल कुमार पटेल ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत बसपा से की थी। उन्होंने बसपा की टिकट से इलाहाबाद की मेजा सीट से चुनाव लड़ा था, लेकिन जीत नहीं सके। हालांकि बाद में वह सपा में शामिल हो गए। ददुआ के इनकाउंटर के बाद बाल कुमार मिर्जापुर से सांसद चुने गए थे।

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