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रविवार, 10 मई 2020

पृथ्वी के वीर पुत्र पृथ्वीराज चौहान

हिंदुस्तान का रक्षक पृथ्वी पुत्र पृथ्वीराज चौहान...!!!
कुछ कर गुजर जाने का अरमान जिंदा है,मातृभूमि के लिए अभिमान जिन्दा है...!!!
कैसे झुक जाऊं तेरे सामने,खून में दिल्ली का चौहान आज भी जिन्दा है...!!!
भारतीयों के इतिहास में बहुत से शासको का आधिपत्य रहा है, भारत देश पर ! परन्तु कुछ ऐसे भी शासक रहे, जिन्होंने भारत माता का गौरव इतिहास में दर्ज कराया है, उन्ही में से एक हैं, चौहान वंश के पृथ्वी पुत्र पृथ्वीराज चौहान अथवा 'पृथ्वीराज तृतीय' जिनका जन्म- 1149 हुआ था। महज 43 वर्ष की अल्पायु में उनकी मृत्यु वर्ष-1192 ई. में हो गईपृथ्वीराज चौहान को 'राय पिथौरा' भी कहा जाता है। वह चौहान राजवंश का प्रसिद्ध राजा थे। वह तोमर वंश के राजा अनंग पाल का दौहित्र (बेटी का बेटा) थे और उसके बाद दिल्ली के राजा हुए। उनके अधिकार में दिल्ली से लेकर अजमेर तक का विस्तृत भू-भाग था। पृथ्वीराज ने अपनी राजधानी दिल्ली का नव-निर्माण कराया था। उससे पहले तोमर नरेश ने एक गढ़ के निर्माण का शुभारंभ किया था, जिसे पृथ्वीराज ने विशाल रूप देकर पूरा किया। उनके नाम पर ही पिथौरागढ़ कहलाता और दिल्ली में पुराने क़िले के नाम से जीर्णावस्था में विद्यमान है। पृथ्वीराज मध्यकालीन भारतीय इतिहास के सबसे प्रसिद्ध हिन्दू राजपूत राजाओं में से एक थे। उनका राज्य राजस्थान और हरियाणा तक फैला हुआ था। वे बहुत ही साहसी, युद्ध कला में निपुण और अच्छे दिल के राजा थे साथ ही बचपन से ही तीर कमान और तलवारबाजी के शौकिन थे।
पृथ्वीराज चौहान को कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री संयोगिता पसंद आ गई, राजकुमारी संयोगिता से प्रेम होने पर पृथ्वीराज चौहान ने स्वयंवर से ही उसे उठा लिया और उससे गन्धर्व विवाह किया और यही कहानी अपने आप में एक मिसाल बन गई। चन्द्रवरदाई और पृथ्वीराज चौहान दोनों बचपन के मित्र थे और बाद में आगे चलकर चन्द्रवरदाई एक कवि और लेखक बने, जिन्होंने हिंदी/अपप्रंश में एक महाकाव्य "पृथ्वीराज रासो" लिखा। पृथ्वीराज ने अपने समय के विदेशी आक्रमणकारी मुहम्मद गोरी को कई बार पराजित किया। युवा पृथ्वीराज ने आरम्भ से ही साम्राज्य विस्तार की नीति अपनाई। पहले अपने सगे-सम्बन्धियों के विरोध को समाप्त कर उसने राजस्थान के कई छोटे राज्यों को अपने क़ब्ज़े में कर लिया। फिर उसने बुंदेलखण्ड पर चढ़ाई की तथा महोबा के निकट एक युद्ध में चदेलों को पराजित किया। इसी युद्ध में प्रसिद्ध भाईयों में आल्हा और उदल ने महोबा को बचाने के लिए पृथ्वीराज चौहान से जमकर युद्ध किया जिसमें उदल को अपनी जान गंवानी पड़ी। कहते हैं,आल्हा अमर हैंपृथ्वीराज ने उन्हें पराजित करने के बावजूद उनके राज्य को नहीं हड़पा। इसके बाद उसने गुजरात पर आक्रमण किया, पर गुजरात के शासक 'भीम द्वितीय' ने, जो पहले मुइज्जुद्दीन मुहम्मद को पराजित कर चुका था, पृथ्वीराज को मात दी।
इस पराजय से बाध्य होकर पृथ्वीराज को पंजाब तथा गंगा घाटी की ओर मुड़ना पड़ा। उसके पश्चात् अनेक लघु और मध्यम युद्ध पृथ्वीराज के और गौरी के मध्य हुए। विभिन्न ग्रन्थों में जो युद्ध संख्या मिलती है, वे संख्या- 7, 17, 21 और 28 हैं। सभी युद्धों में पृथ्वीराज ने गौरी को बन्दी बनाया और उसको छोड़ दिया। परन्तु अन्तिम बार तराईन के मैदान में द्वितीय युद्ध के दौरान 1192 ई. में मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को रात के अंधेरे में छल कपट से बंदी बना लिया, तत्पश्चात् गौरी ने पृथ्वीराज को कुछ दिनों तक "इस्लाम धर्म" का अंगीकार करवाने का प्रयास करता रहा। उस दौरान पृथ्वीराज को शारीरक पीडाएँ भी दी गई। शरीरिक यातना देने के समय गौरी ने पृथ्वीराज को अन्धा कर दिया। अन्ध पृथ्वीराज ने अपने मित्र चंदरबरदाई के साथ मिलकर गोरी का वध करने की योजना बनाई। उस योजना के तहत हिन्दू हृदय सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने शब्द भेदी विद्या से तीर छोड़कर मोहम्मद गोरी का वध कर दिया।
“एक एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः शरीरेण समं नाशं सर्वम् अन्यद्धि गच्छति॥ अर्थात् धर्म ही ऐसा मित्र है, जो मरणोत्तर भी साथ चलता है। अन्य सभी वस्तुएं शरीर के साथ ही नष्ट हो जाती हैं। इतिहासविद् डॉ. बिन्ध्यनाथ चौहान के मतानुसार पृथ्वीराज ने उक्त श्लोक का अन्तिम समय पर्यन्त आचरण किया एक विदेशी आक्रमणकारी मुहम्मद गौरी ने बार-बार युद्ध करके पृथ्वीराज चौहान को हराना चाहा, पर ऐसा ना हो सका। पृथ्वीराज चौहान ने 17 बार मुहम्मद गौरी को युद्ध में परास्त किया और दरियादिली दिखाते हुए कई बार माफ भी किया और छोड़ भी दियापर अठारहवीं बार मुहम्मद गौरी ने जयचंद की मदद से पृथ्वीराज चौहान को युद्ध में मात दी और बंदी बनाकर अपने साथ ले गया। पृथ्वीराज चौहान और चन्द्रवरदाई दोनों को बन्दी बना लिया और सजा के तौर पर पृथ्वीराज की आखें गर्म सलाखों से फोड़ दी गई। अंत में चन्द्रवरदाई जो एक कवि और पृथ्वीराज चौहान के ख़ास दोस्त थे। दोनों ने भरे दरबार में गौरी को मारने की योजना बनाई, जिसके तहत चन्द्रवरदाई ने काव्यात्मक भाषा में एक पक्तिं कही- “चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है, मत चूके चौहान।”
अलग-अलग मतों और इतिहासकारों की किंवदंतियों के अनुसार मोहम्मद गौरी और पृथ्वीराज का युद्ध 18 बार हुआपृथ्वीराज चौहान पर मोहम्मद गौरी 18आक्रमण किया था, जिसमें 17बार उसे पराजित होना पड़ा। किसी भी इतिहासकार को किंवदंतियों के आधार पर अपना मत बनाना कठिन होता है। इस विषय में इतना निश्चित है कि गौरी और पृथ्वीराज में कम से कम दो भीषण युद्ध अवश्य हुए थे, जिनमें प्रथम में पृथ्वीराज विजयी और दूसरे में पराजित हुआ था। वे दोनों युद्ध थानेश्वर के निकटवर्ती 'तराइन' या 'तरावड़ी' के मैदान में क्रमशः संवत 1247 और संवत 1248 में हुए थे। तराइन की दूसरी लड़ाई को भारतीय इतिहास का एक मोड़ माना जाता है। मुइज्जुद्दीन ने इसके लिए बहुत तैयारियाँ की। कहा जाता है कि वह 1,20,000 सैनिकों के साथ मैदान में उतरा, जिसमें बड़ी संख्या में बख्तरबंद घुड़सवार और 10,000 धनुर्धारी घुड़सवार शामिल थे। यह सोचना उचित नहीं होगा कि पृथ्वीराज ने अपनी ओर से शासन में लापरवाही की या उसे स्थिति का अंदाजा तभी लग सका जब बहुत देर हो चुकी थी। यह सही है कि इस अंतिम अभियान का सेनाध्यक्ष, स्कंन्द कहीं और फँसा था। जैसे ही पृथ्वीराज ने गौरी के ख़तरे को भाँपा, उसने उत्तर भारत के सभी राजाओं से सहायता का अनुरोध किया।
बताया जाता है कि कई राजाओं ने उसकी मदद के लिए अपने सैनिक भेजे, लेकिन कन्नौज का शासक जयचंद चुप रहा। ऐसा कहा जाता है कि जयचंद की पुत्री संयोगिता पृथ्वीराज से प्रेम करती थी और पृथ्वीराज उसे भगा लाया था। इसलिए जयचंद चुप रहा। पर अनेक इतिहासकार इस कथन को स्वीकार नहीं करते। यह कहानी बहुत बाद में कवि चंदबरदाई ने लिखी (जो कि पृथ्वीराज चौहान के दरबार के राजकवि थे) और उसके वर्णन में कई एक असंभाव्य घटनाएँ हैं। यथार्थ में इन दोनों राज्यों के बीच पुरानी दुश्मनी थी और इस कारण कोई आश्चर्य की बात नहीं कि जयचंद ने पृथ्वीराज का साथ नहीं दिया। संवत 1247 में जब पृथ्वीराज से मुहम्मद गौरी की विशाल सेना का सामना हुआ, तब राजपूत वीरों की विकट मार से मुसलमान सैनिकों के पैर उखड़ गये। स्वयं गौरी भी पृथ्वीराज के अनुज के प्रहार से बुरी तरह घायल हो गया था। यदि उसका ख़िलजी सेवक उसे घोड़े पर डाल कर युद्ध भूमि से भगाकर न ले जाता, तो वहीं उसके प्राण पखेरू उड़ जाते। उस युद्ध में गौरी की पराजय हुई थी और उसे भीषण हानि उठाकर भारत भूमि से भागना पड़ा था।
भारतीय राजा के विरुद्ध युद्ध अभियान में यह उसकी दूसरी बड़ी पराजय थी, जो अन्हिलवाड़ा के युद्ध के बाद सहनी पड़ी थी। मुहम्मद गौरी उस अपमानजनक पराजय का बदला लेने के लिए पृथ्वीराज की पराजय और मृत्यु के षणयंत्र की तैयारी करने लगा। अगले वर्ष वह 1लाख, 20 हज़ार चुने हुए अश्वारोहियों की विशाल सेना लेकर फिर तराइन के मैदान में आ डटा। उधर पृथ्वीराज ने भी उससे मोर्चा लेने के लिए कई राजपूत राजाओं को आमन्त्रित किया था। कुछ राजाओं ने तो अपनी सेनाएं भेज दीकिंतु उस समय का गाहड़वाल वंशीय कन्नौज नरेश जयचंद उससे तटस्थ ही रहा। किवदंती है कि पृथ्वीराज से विद्वेष रखने के कारण जयचंद ने ही मुहम्मद गौरी को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित किया था। इस किंवदंती की सत्यता का कोई प्रामाणिक आधार नहीं है अतः जयचंद पर देशद्रोह का दोषारोपण भी अप्रामाणिक ज्ञात होता है। उसमें केवल इतनी ही सत्यता है कि उसने उस अवसर पर पृथ्वीराज की सहायता नहीं की थी। पृथ्वीराज के राजपूत योद्धाओं ने उस बार भी मुसलमानी सेना पर भीषण प्रहार कर अपनी वीरता का परिचय दिया था, किंतु देश के दुर्भाग्य से उन्हें पराजित होना पड़ा। इस प्रकार संवत 1248 के उस युद्ध में मुहम्मद गौरी की विजय और पृथ्वीराज की पराजय हुई थी। युद्ध में पराजित होने के पश्चात् पृथ्वीराज की किस प्रकार मृत्यु हुई ? इस विषय में इतिहासकारों के विभिन्न मत मिलते हैं। कुछ के मतानुसार वह पहले बंदी बना कर दिल्ली में रखा गया था और बाद में गौरी के सैनिकों द्वारा मार दिया गया था।
कुछ का मत है कि उसे बंदी बनाकर ग़ज़नी ले जाया गया था और वहाँ पर उसकी मृत्यु हुई। ऐसी भी किंवदंती है कि पृथ्वीराज का दरबारी कवि और सखा चंदवरदाई अपने स्वामी की दुर्दिनों में सहायता करने के लिए गजनी गया था। उसने अपने बुद्धि कौशल से पृथ्वीराज द्वारा गौरी का संहार कराकर उससे बदला लिया था। फिर गौरी के सैनिकों ने उन दोनों को भी मार डाला था। इस किंवदंती का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं हैंअतः उसकी प्रामाणिकता ज्ञात नहीं होती। अंत में अपने प्रमाद और जयंचद के द्वेष के कारण वह पराजित हो गया और उसकी मृत्यु हो गई। उसका मृत्यु काल संवत 1248 माना जाता है। उसके पश्चात् मुहम्मद गौरी ने कन्नौज नरेश जयचंद को भी हराया और मार डाला। आपसी द्वेष के कारण उन दोनों की हार और मृत्यु हुई। पृथ्वीराज से संबंधित घटनाओं का काव्यात्मक वर्णन चंदबरदाई कृत "पृथ्वीराज रासो" नामक ग्रंथ में हुआ है। भारत में सामान्य लोकसभा वर्ष-2014 के निर्वाचन में भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला उसके पश्चात् नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने। उस विजय के विश्लेषण काल के समय अशोक सिंघल ने कहा था कि पृथ्वीराज चौहान के समय अर्थात् 800 वर्ष पश्चात् भारत में नरेन्द्र मोदी के रूप में प्रथम हिन्दु शासक बने हैं और उनकी ख्याति समूचे विश्व में होगी और उनके नेतृत्व में हिंदुस्तान विश्व गुरु का दर्जा प्राप्त करेगा। पृथ्वीराज चौहान के व्यक्तित्व में कुछ शब्दजिनकी मूँछ थी, उनका गुरूर जिनकी पहचान थी, उनका तेवर, जिसने गौरी को सत्ररह बार हराया, अपनी वीरता का परिचय पृथ्वी पुत्र ने दिखाया, भारत माता के हैं,वीर संतान, चौहान वंश की वो बढ़ाते है,शान ! वीरता की कलम उसने अपना परिचय बताया, इतिहास में उसने एक नया भारत बसाया, आओ उसी पृथ्वी पुत्र के वचनों को हम जीवन में अपनाते हैं, उनके इतिहास के भारत का हम सब गौरव बढ़ाते हैं।

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