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शुक्रवार, 29 मई 2020

स्वास्थ्य महकमें की घोर लापरवाही का हुआ भंडाफोड़, सीएमओ दफ्तर के बगल आइसोलेशन वार्ड के पीछे खुले में फेंका गया पीपीई किट, ग्लब्स और मास्क।


जिला अस्पताल के निरीक्षण पर पहुँचे जिलाधिकारी प्रतापगढ़ डॉ रूपेश कुमार से खुलासा इंडिया के संपादक रमेश तिवारी "राज़दार" ने की शिकायत...!!!


जिला अस्पताल परिसर आइसोलेशन वार्ड जहाँ फेंकी गयी हैं पीपीई किट, ग्लब्स और मास्क...

कोविड-19 के संक्रमण में यदि स्वास्थ्य महकमा ही गैरजिम्मेदार होकर काम करे तो सिस्टम और समाज के अन्य लोंगो से उम्मीद करना ही ब्यर्थ है प्रतापगढ़ के जिला अस्पताल परिसर में आइसोलेशन वार्ड के पीछे यानि सीएमओ ऑफिस के बगल फेंकी गयी यूज हुई पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई किट)। जबकि इसी पीपीई किट, मास्क और ग्लब्स के जरिये ही कोरोना संक्रमण मरीज का स्वास्थ्य विभाग से जुड़े चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी संक्रमण से बचाव करते हुए ईलाज करते हैं। जिला अस्पताल प्रतापगढ़ के आइसोलेशन वार्ड में कोरोना मरीज की ईलाज के दौरान मौत हो चुकी है। सीएमओ ऑफिस के पास स्वास्थ्य कर्मियो द्वारा फेंकी गयी तीन पीपीई किट से यह तय हो जाता है कि कोरोना संक्रमण से स्वास्थ्य विभाग स्वयं नॉन सीरियस है। पूरे अस्पताल परिसर में गन्दगी का अम्बार लगा हुआ है और उसी गन्दगी के बीच मास्क और ग्लब्स भी फेंके गए हैं। जबकि प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड और पर्यावरण विभाग की स्पष्ट दिशा निर्देश है कि अस्पताल चाहे सरकारी हो अथवा प्राईवेट सभी के नियम एक जैसे होंगे। 


जिला अस्पताल के गेट के बगल का दृश्य...
अस्पताल में भर्ती हर रोगी से प्रतिदिन औसतन डेढ़ किलोग्राम कचरा निकलता है। अस्पताल से निकलने वाले कुल कचरे में से 47 प्रतिशत जीव-चिकित्सा सम्बन्धी होता है। यह खतरनाक होता है, क्योंकि इसमें रोग फैलाने वाले कीटाणु होते हैं। सरकारी अस्पतालों से निकलने वाले जैविक कचरे को अब जमीन में दबाकर खत्म नहीं किया जाएगा, बल्कि उसे इंसीनरेटर में जलाकर नष्ट किया जाएगा। राज्य सरकार ने यह फैसला जैविक कचरे के निपटान के मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्देशों के बाद लिया है। ट्रिब्यूनल ने देश की सभी राज्य सरकारों को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों के तहत जैविक कचरे का निपटान करने के लिए निर्देश जारी किये थे। 


 खुले में फेंका गया जिला अस्पताल से निकले अवशिष्ट पदार्थ...
अस्पतालों में कोरोना संक्रमित मरीजों का इलाज जिस पीपीई किट को पहनकर किया जाता है, यदि वह पीपीई किट अस्पताल परिसर के अंदर खुले में सार्वजनिक तौर पर फेंक दिया जाए तो इसके लिए वास्तव में जिम्मेदार कौन होगा ? सवाल उठता है कि जब स्वास्थ्य विभाग ही कोरोना संक्रमण के प्रति इतना लापरवाह हो जाये तो कोरोना संक्रमण से कौन और कैसे लड़ सकेगा जंग ? स्वास्थ्य महकमें की लापरवाही से जिला अस्पताल में आने जाने वाले और समस्त स्वास्थ्य विभाग से जुड़े लोग जो कोरोना योद्धा बनकर कोरोना से जंग लड़ रहे हैं। ऐसी दशा में कोरोना का संक्रमण उन योद्धाओं में ही फैल सकता है। आज जिला अस्पताल का औचक निरीक्षण करने डॉ रूपेश कुमार, जिलाधिकारी प्रतापगढ़, शत्रोहन वैश्य, अपर जिलाधिकारी प्रतापगढ़ पहुँचे थे। 


"निरीक्षण का औपचारिक कोरम पूरा कर अस्पताल से निकलते वक्त खुलासा इंडिया के संपादक रमेश तिवारी "राज़दार" ने जिलाधिकारी की गाड़ी रोककर उन्हें सीएमओ और सीएमस की घोर लापरवाही का नमूना देखने का आग्रह किया तो जिलाधिकारी महोदय ने उन्हीं लापरवाह अफसरों सीएमओ और सीएमएस को जाँच करने का मौखिक निर्देश देकर धीरे से निकल लिए जबकि शिकायत की प्रकृति अति गंभीर रही फिर भी जिलाधिकारी महोदय उस गंभीर प्रकृति की शिकायत को अनसुना तो नहीं किया परन्तु स्वास्थ्य महकमें के गैर जिम्मेदार अफसरों को बचाने का कार्य अवश्य कर गए" 
" जिलाधिकारी प्रतापगढ़ डॉ रुपेश कुमार स्वास्थ्य विभाग के अफसरों को इसलिए बचा रहे हैं, क्योंकि वो जिलाधिकारी प्रतापगढ़ के साथ-साथ एक डॉक्टर भी हैं ! जिला अस्पताल परिसर में जिस तरह खुलेआम सार्वजनिक स्थल पर पीपीई किट, ग्लब्स और मास्क फेंका गया था और शिकायत जिला के मालिक शासन की आँख, नाक और मुँह कहे जाने वाले जिलाधिकारी से की गई फिर भी जिलाधिकारी महोदय उसे गंभीरता से नहीं लिए ! यदि लिए होते तो वो स्वयं अपनी गाड़ी से उतर कर निरीक्षण कर इन दोषी अफसरों के विरुद्ध शासन में रिपोर्ट जरुर किये होते ! चूँकि शिकायत की प्रकृति सामान्य नहीं थी। 
जिलाधिकारी प्रतापगढ़ से शिकायत करते रमेश राज़दार...

इतनी गंभीर शिकायत के बाद भी जिलाधिकारी प्रतापगढ़ अपनी गाड़ी से नीचे नहीं उतरे। सीएमओ प्रतापगढ़ डॉ ए के श्रीवास्तव और सीएमएस डॉ व पी पी पांडेय को शिकायत की जाँच करने भेजा और स्वयं मुख्यमंत्री की बीसी करने NIC चले गए। ऐसा नहीं है कि सीएमओ और सीएमएस को पीपीई किट, ग्लब्स और मास्क जिला अस्पताल परिसर में ही फेंके जाने की जानकारी नहीं थी। उनकी आंख के नीचे ये सब होता रहता है। सीएमओ डॉ ए के श्रीवास्तव तो धन पिपासु है वो पैसे की खातिर किसी भी घटिया से घटिया कार्य को अंजाम दे सकते हैंशासन की रोक के बावजूद सीएमएस डॉ पी पी पांडेय प्रतिदिन सुल्तानपुर चले जाते हैं। क्योंकि डॉ पी पी पांडेय आर्थो के सर्जन हैं और सुल्तानपुर शहर में उनकी निजी अस्पताल है, जिसमें उन्हें प्रतिदिन मरीजों के ऑपरेशन करने होते हैं

 आइसोलेशन वार्ड के पीछे का दृश्य...
अब शिकायत हुई तो सीएमओ और सीएमएस दोनों बहाने बनाने लगे। सबकुछ जानते हुए भी अनजान बने रहने में सीएमओ और सीएमएस अपनी भलाई समझते हैं। अब कार्रवाई के नाम पर सबसे कमजोर कड़ी सफाई कर्मी की बलि चढ़ेगी। जबकि अस्पतालों का कचड़ा सामान्यतः प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की गाइड लाइन के मुताबिक बॉयो पद्धति अपनाते हुए उसे डिस्ट्रॉय किये जाने का ठेका होता है। लंबा एमाउंट उस पर स्वास्थ्य विभाग खर्च करता है। परन्तु हकीकत यही है कि कोरोना संक्रमण काल में भी जब जिला अस्पताल की ये दशा है तो सामान्य दिनों की दशा क्या रहती रही होगी ? कोरोना संक्रमण काल में करोड़ों रुपये के बजट को सिर्फ जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग चट कर जाने में दिन रात लगा है। जनता मरती है तो मरे ! परन्तु इन बेईमानों अफसरों को सिर्फ और सिर्फ माल चाहिये। वो किसी भी कीमत पर ! माल की चाहत में चाहे इन्हें ही कोरोना का संक्रमण ही क्यों न हो जाए ? फिलहाल दिखाने के लिए ही सही डॉ रूपेश कुमार, जिलाधिकारी प्रतापगढ़ ने पीपीई किट, ग्लब्स और मास्क फेंकने के मामले में कार्यवाई किये जाने का आदेश दे दिया है। अब देखना है कि किसकी गर्दन जपी जाती है और किसकी बचाई जाती है...???

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