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शुक्रवार, 8 मई 2020

दानवीर कर्ण सूत पुत्र या सूर्य पुत्र...???

कर्ण महाभारत का खलनायक या नायक ...???
द्वापर युग में कर्ण को भले ही हम सबसे बड़े दानवीर के रूप में जानते है, लेकिन इस शीर्षक को प्राप्त करने के लिए कर्ण ने अपने प्राण को भी अपनी माता को दान कर दिया आइये आज हम उसी कर्ण के विशाल व्यक्तित्व पर चर्चा करते हैं। कर्ण महाभारत के सबसे वीर योद्धाओं में से एक है कर्ण महाभारत काल के सर्वक्षेष्ठ धनुर्धर है इसका प्रमाण प्रभु श्री परशुराम ने खुद ही दिया था कर्ण की मृत्यु के समय वो वहां उपास्थित होकर उन्होंने यह उदघोष किया था कि विजय धनुषधारी अंगराज कर्ण ही महाभारत के सबसे बड़े धनुर्धारी है वही उस युग का सबसे बड़ा दानवीर है, जिन्होंने अपनी जननी माता कुंती को उनके पांचों पंड़ावों के प्राण दान में दे दिया था, वही माता कुंती जिन्होंने कर्ण को बाल अवस्था में ही त्याग दिया था, क्योंकि उनकी सिर्फ ये गलती थी वो बिन ब्याही कुंती का पुत्र था और लोकलज्जा की वजह से कर्ण का पैदा होते ही कुंती ने परित्याग कर दिया था इस तरह कर्ण कुंती का ज्येष्ठ पुत्र के रूप में जाना गया। जब माता कुंती को ऋषि दुर्वासा ने वरदान दिया था कि वो जिस भी देव का आवाहन करेंगी, उन्हें उनके अंश के रूप में वैसा ही तेज और पराक्रमी पुत्र की प्राप्ति होगी भगवान दुर्वासा के वरदान को माता कुंती ने आजमाना चाहा और सूर्य नारायण देव का आवाहन किया 
इस तरह बिन ब्याह के ही कुंती को पुत्र के रूप में सूर्य की तरह तेज और पराक्रमी पुत्र कर्ण प्राप्त हुआ कुंती के आह्वाहन पर ऋषि दुर्वासा का दिया गया वरदान फलित हो गया और सूर्य देव ने अपने अंश के रूप में माता कुंती को बालक प्रदान कियामाता कुंती पुत्र के आकर्षण में इतना खो गयी कि उन्हें ये आभास ही नहीं हुआ कि वो एक अविवाहित कन्या है। लोक मर्यादा और बदनामी के भय से माता ने पुत्र को त्याग देना ही उचित समझा और एक बॉक्स में बंद कर उस नवजात शिशु को माता कुंती ने गंगा मैय्या की गोंद में सौंप दिया था। सूर्य पुत्र कर्ण का त्याग करने से पहले माता ने उनसे छमा याचना माँगी, तभी सूर्य नारायण की किरणों से उनकी दिव्यता का माता कुंती को बोध हुआ कि वो एक साधारण बालक नहीं बल्कि दिव्य कवच और कुंडल के साथ जन्मे असाधारण बालकों में से एक है, जो उनकी हमेशा रक्षा करेगा। कर्ण की परवरिश सारथि अधिरत ने की जो कर्ण को अपने पुत्र से भी ज्यादा प्रेम करते थे, कर्ण बचपन से ही युद्ध कला में निपुण था और अधिरत पुत्र शोण पठन-पाठन में निपुण था जाति के आधार पर वो दोनों एक सूत पुत्र थे जिनका कर्म सारथी बनने का, घोड़े पालने का था, परन्तु कर्ण हमेशा इस प्रथा का विरोध करता था
इसी के परिणाम स्वरुप कर्ण के छोटे भाई शोण को मृत्युदंड दिया गया। हस्तिनापुर के इस फैसले से कर्ण अत्यधिक क्रोधित हुए, परन्तु उन्हें बंदी बना लिया गया कर्ण ने प्रतिज्ञा की थी कि वो अपने भाई शोण के सपने को पूरा करेगा जो था परिवर्तन का, अपने और अपने भाई के सपने को सच करने के लिए और अपनी शिक्षा प्राप्त करने के लिए हस्तिनापुर के गुरु द्रोणाचार्य के पास गए, किन्तु गुरु द्रोण ने कर्ण को शिक्षा देने से यह कहकर मना कर दिया कि वो सिर्फ क्षत्रियों को ही शिक्षा देते हैं, सूत पुत्रों को नहीं ! कर्ण का हृदय यह सुनकर भर आया और उसी वक्त उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि वो उनके श्रेष्ठ शिष्य अर्जुन को रंग भूमि में एक दिन जरूर परास्त करेंगे, कर्ण ने अपनी शिक्षा प्राप्ति के लिए भगवान परशुराम से झूठ बोलकर ब्राह्मण पुत्र बनकर शिक्षा ग्रहण करनी पड़ी थी। कर्ण की निपुणता और कुशलता को देखते हुए भगवन परशुराम ने उन्हें सभी दिव्य अस्त्रों-शस्त्रों का ज्ञान दिया, साथ में उन्होंने अपना विजय धनुष प्रदान किया यह कहकर कि हे कर्ण जब तक ये विजय धनुष तुम्हारे हाथो में रहेगा, कोई भी तुम्हे परास्त नहीं कर पायेगा, इस प्रकार कर्ण अपने युग के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी बन गए
मित्रता की बात की जाए तो कर्ण और दुर्योधन की मित्रता भी भगवान कृष्ण और सुदामा से भी कम नहीं रहीकर्ण और दुर्योधन की मित्रता के सर्वश्रेष्ठ उदाहरणों में से एक हैं, मित्रता को निभाते-निभाते कर्ण अपने प्राण, साथ ही अपने पुत्र वृषशेण के प्राणों को भी न्योछावर कर दिया था। दुर्योधन और कर्ण की मित्रता शुरू हुई थी रंगभूमि के युद्ध से, जब अर्जुन ने सभी कौरवो को परास्त कर दिया था और दुर्योधन को अपने हिम-पाश में बांध लिया था, तभी गुरु द्रोण ने अपने शिष्य अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहकर संबोधित किया था तब कर्ण ने अर्जुन को युद्ध के लिए चुनौती दी थी, परन्तु गंगा पुत्र भीष्म ने कर्ण को सूत पुत्र होने के कारण रंगभूमि में युद्ध लड़ने की इजाज़त नहीं दी और कर्ण का सभी ने अपमान भी किया था, तब दुर्योधन को हिम-पाश से छुड़ाने के लिए दुर्योधन ने कर्ण को अंगदेश का राजा घोषित कर दिया, जिससे अब कर्ण भी सभी रंग भूमि में, सभी युद्धों में, हस्तिनापुर के राजमहल में सम्मान पूर्वक प्रस्तुत रहने लगा
भगवन वासुदेव भी कहते हैं कि कर्ण जैसा दानवीर, कुशल योद्धा, महान व्यक्तित्व वाला पूरे महाभारत में कोई नहीं थाभगवन श्री कृष्ण और कर्ण परम मित्र थेकर्ण उन्हें अपने आराध्य की तरह पूजते थे और उन्हें माता-पिता से भी ज्यादा सम्मान और स्नेह करते थे वहीं वासुदेव भी कर्ण को अपना परम मित्र मानते थे और कर्ण को हमेशा विकल्प देते थे, परन्तु कर्ण हमेशा अपनी और दुर्योधन की मित्रता को ही चुनते था भले ही वो अधर्म का साथ दे रहे हो, कर्ण का मानना था कि वो अपने मित्र दुर्योधन को अधर्म करने से रोक सकते हैं दुर्योधन भले ही कर्ण को आपनी जान से भी जादा स्नेह करते थे, किन्तु उनकी नफरत पांडवों के प्रति इतनी ज्यादा थी वो हर बार अधर्म के रास्ते पर चले जाते थे, चाहे वो पांडवों को छल से मारना हो या द्रोपदी का चीर हरण, कर्ण हर बार इन सभी कृत्यों का विरोध करता था, परन्तु दुर्योधन की मित्रता के आगे कर्ण मजबूर हो जाता था उन्होंने द्रोपदी चीर हरण का सबसे आधिक विरोध किया था, उन द्रोपदी का जिन्होंने कर्ण का अपमान करते हुए कहा था कि वो एक सूतपुत्र से विवाह नही करेंगी, फिर भी कर्ण ने उन्हें माफ़ करते हुए उनके वस्त्र हरण का विरोध किया था।
दानवीर कर्ण की महानता को प्रकट करते हुए एक बार श्रीकृष्ण ने अर्जुन और कर्ण की परीक्षा ली, जिसमे उन्होंने कहा- हे पार्थ ! ये दो स्वर्ण पर्वत है, हे अर्जुन तुम को ये सभी स्वर्ण गरीबो में दान करना है, परन्तु शर्त यह है कि सभी स्वर्ण तुम गरीबों में दान करोगे, अर्जुन ने सोचा-ये माधव इतना छोटा कार्य मुझसे करने को क्यों कह रहे है, फिर अर्जुन ने सभी गाँव वालो में यह घोषित कर दिया कि वो स्वर्ण दान कर रहे है, सभी पंक्ति में खड़े हो जाये अर्जुन ने स्वर्ण बाँटना शुरू किया तो गाँव वाले दुबारा आकर स्वर्ण लेने लगे तभी अर्जुन ने सोचा कि ये सभी तो दुबारा स्वर्ण ले रहे हैं और ऐसा ही रहा तो सारा स्वर्ण ख़त्म हो जायेगा तभी भगवान वासुदेव ने कर्ण को बुलवाया और सशर्त स्वर्ण बाँटने को कहा फिर कर्ण ने ऐलान कर दिया कि सभी गाँव वाले में उनकी आवश्यकता अनुसार जितना स्वर्ण चाहिए उसे दे दिया जाए फिर मुरलीधर ने अर्जुन से कहा- हे पार्थ ! तुमने कर्ण की दानवीरता देखी उसने बिना किसी लालच के सभी स्वर्ण गाँव वालों में दान कर दिया, इससे यह प्रमाणित होता है कि कर्ण ही सबसे बड़ा दानवीर है अपने दान धर्म में समर्पित कर्ण ने अपने पिता सूर्यदेव द्वारा दिया हुआ कवच और कुंडल देवराज इंद्र को दान में दे दिया था, जो एक साधु का वेश बनाकर कर्ण से उसके कवच और कुंडल मांगने आये थे, जिसे वो अपने पुत्र अर्जुन की सहायता कर सके, क्योंकि वो जानते थे कि यदि कर्ण अपने कवच और कुंडल के साथ अजेय है और वही महाभारत का सबसे शक्तिशाली योद्धा है और कर्ण भी जानते थे कि आज इंद्रदेव उनसे, उनका कवच और कुंडल दान में मागेंगे, यह जानते हुए भी कर्ण ने अपना दान सहर्ष इंद्रदेव को प्रदान किया
जब महारथी अर्जुन और अंगराज कर्ण का युद्ध हुआ तब अर्जुन के बाण के प्रभाव से कर्ण का रथ 25 पग पीछे चला जाता था और कर्ण के बाण के प्रभाव से अर्जुन का रथ बस तीन पग पीछे जाता,फिर भी माधव कर्ण की प्रशंसा करते थे कि- हे कर्ण ! तुम सच में एक वीर योद्धा हो ! कर्ण की प्रशंसा सुन अर्जुन ने वासुदेव से पूछा- हे माधव ! मेरे बाणों की शक्ति से कर्ण का रथ 25 पग पीछे जाता है और कर्ण के बाणों के प्रभाव से हमारा रथ बस 3 पग पीछे जाता है फिर भी आप कर्ण की प्रशंसा करते रहते हैं। माधव ने उत्तर दिया हे पार्थ ! तुम्हारे रथ पर स्वयं मैं हूँ जो तीनों लोकों का भार लिए तुम्हारे रथ का सारथी बना हूँ और महाबली हनुमान जी भी तुम्हारे रथ के पताके में स्वयं प्रस्तुत है और अंगराज के बाणों की शक्ति से फिर भी तुम्हारा रथ 3 पग पीछे जा रहा है अब तुम्ही बताओ मै अंगराज की प्रशंसा क्यों न करू ?
महानदानी कर्ण को महाभारत से पहले ही इस सच का पता लग गया था कि वो पांडवो के ज्येष्ट भ्राता है, परंतु अपने वचन के कारण उन्होंने ये सच सभी से छुपाकर रखा। कर्ण ने दुर्योधन को वचन दिया था कि वो दुर्योधन को हस्तिनापुर का राजा बनाकर ही रहेंगे। कर्ण की मृत्यु उनकी शिक्षा प्राप्ति के बोले हुए मिथ्या की वजह से हुई थी, जब भगवान परशुराम को पता लगा कि कर्ण एक क्षत्रिय पुत्र है, तब उन्होंने कर्ण को श्राप दे दिया था कि जब उनको भगवान परशुराम द्वारा अर्जित शिक्षा की सबसे अधिक जरूरत होगी, तब वो सभी शिक्षा को वह भूल जाएगा। जिसका जिन्दगी भर तिरस्कार हुआ सूत पुत्र समझकर, जिसको शिक्षा नहीं दी गयी सभी पांडवो और कौरवो का भी जयेष्ट था, जिसको हस्तिनापुर का अगला राजा बनना चाहिए था उसने एक स्वप्न देखा परिवर्तन का जब सभी एक समान शिक्षा, सम्मान और आदर पा सकेंगे। जो मित्रता का सबसे श्रेष्ठ उदाहरण है, जिसने अपनी पालन माता का नाम अपने नाम के आगे रखा, जिसने अपनी जन्मदात्री माता कुंती को माफ कर दिया ये जानते हुए भी कि उन्होंने उसका त्याग बाल्यावस्था में ही कर दिया था, जिसने अपनी मित्रता निभाते-निभाते अपने प्राण त्याग दिए, ऐसा व्यक्तित्व है अंगराज सुर्यपुत्र राधेकर्ण का...!!!
कुछ शब्द महारथी कर्ण के लिए -
हो तुम एक देव पुत्र ,
पर कहलाये गए सूत ,
जिसकी युद्ध कुशलता देख,
कृष्ण भी हुए अभिभूत,
जो अपनी दानवीरता के लिए जाना जाता,
संसार उसे सूर्यपुत्र राधेकर्ण कहकर बुलाता...!!!

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपने एक बात गलत लिखी है कि द्रौपदी का चीर हरण होते समय कर्ण ने विरोध किया था। जरा गर्न्थो का अनुश्रवण कर ले और तब कुछ लिखे तो बेहतर रहेगा। हकीकत यह है कि कर्ण ने उस समय द्रौपदी को वेश्या कह कर बुलाया था। बाद में कर्ण ने युद्ध के दौरान इस पर अफसोस भी जताया पर जो होन्स था, ho chuka tha.

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    उत्तर
    1. जी आपका कथन बिल्कुल सही है ,परंतु कर्ण ने द्रोपदी जी को विवश होकर वैश्य बोला था,बोलने के लिए उनके गुरु की कसम दी गयी थी,जिससे न चाहते हुए भी कर्ण को यह कहना पड़ा और रही बात धर्म ग्रंथ पढ़ने की तो जिनके ऊपर हम स्टोरी लिखते है हम उसकी पूरा इतिहास चेक करते है। मोहदय महाभारत में सिर्फ कर्ण को खलनायक के रूप में दिखाया गया है और दिखाया जाता रहेगा अगर आपको कर्ण के इतिहास के बारे में जानना है तो सूर्यपुत्र कर्ण की कहानी एक शो द्वारा दिखाई जाती है जो कि सच्ची घटनाओ पर आधारित है,यदि आप कर्ण के व्यक्तित्व में जानने के इतने उत्सुक है तो एक बार सूर्य पुत्र कर्ण देख ले,आपकी बड़ी कृपा होगी धन्यवाद अपनी राय देने के लिए।

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