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रविवार, 17 मई 2020

नौकरशाही की अकर्मण्यता का नतीजा रहा औरैया सड़क हादसा

कब काम आयेंगे पीएम केयर्स फंड के एक हजार करोड़ रुपए...???
CMयोगी आदित्यनाथ और अशोक गहलोत का बयान धरा रह गया ...!!!
UPके औरेया में  24मजदूरों की दर्दनाक मौत का जिम्मेदार कौन...???
लॉकडाउन की वजह से सड़कों पर चल रहे मजदूरों के मरने का सिलसिला थम नहीं रहा है। 16 मई को तड़के उत्तर प्रदेश के औरेया हाईवे पर एक ट्रक और मेटाडोर में टक्कर हो जाने से चौबीस श्रमिकों की मौत हो गई। मरने वालों की संख्या बढ़ सकती है क्योंकि अस्पताल में भर्ती 36 मजदूरों में से दस की हालत गंभीर है। ट्रक और मेटाडोर में मजदूर भरे हुए थे। ट्रक में मार्बल पत्थर की घिसाई का पाउडर भरा हुआ था। पाउडर के कट्टों पर ही मजदूर बैठे थे। कई मजदूरों की मौत का कारण तो यह पाउडर ही बना। मेटाडोर से टकराने के कारण पाउडर से भरा ट्रक पलट गया। इससे दर्दनाक हादसे का अंदाजा लगाया जा सकता है। 
प्राप्त जानकारी के अनुसार ट्रक में राजस्थान खास कर जयपुर से रवाना हुए श्रमिक थे। स्वाभाविक है कि ऐसे मजदूर गैर कानूनी तरीके से ट्रक में सवार होकर जा रहे थे। मजदूरों की मौत के लिए दोनों वाहनों के ड्राईवर तो जिम्मेदार हैं, लेकिन साथ ही यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत के बयान भी धरे रह गए हैं। योगी और गहलोत लगातार कह रहे हैं कि मजदूरों को ट्रेन और बसों से भेजने की व्यवस्थाा की जा रही है। तब तक मजदूर आश्रय स्थलों में ही रहे। परन्तु हकीकत में सरकार के सारे दावे सिर्फ मीडिया में बयान देने तक ही होते हैं। जमीनी हकीकत यानि धरातल पर सब सरकार और सरकार के तंत्र गोलमाल कर जाते हैं। मजदूर आश्रय स्थलों की दशा देखकर तो मौत को गले लगा लेने का जी करता है। क्योंकि वहां की सरकारी ब्यवस्था इंसानों के लिए नहीं बल्कि जानवरों के जीवन जीने जैसी की जाती है वजह सरकारी बजट को चट कर जाने की रहती है।   
असल में सरकारों की कथनी और करनी में फर्क है। मुख्यमंत्री तो बयान जारी कर देते हैं, लेकिन निचले स्तर पर बयानों की क्रियान्विति नहीं होती है। यदि राजस्थान और उत्तर प्रदेश में श्रमिकों को प्रभावी तरीके से दूसरे राज्यों में भेजा जा रहा होता तो औरेया में चौबीस मजदूरों की मौत नहीं होती। जानकारी के अनुसार ट्रक और मेटाडोर में राजस्थान के साथ साथ हरियाणा के मजदूर भी थे जो अपने प्रदेश बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल जा रहे थे। इस हादसे में इन तीनों राज्य सरकारों के इंतजामों पर भी प्रश्न चिन्ह लगता है। यदि बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल की सरकारों को अपने प्रवासी मजदूरों की चिंता होती तो इन मजदूरों को भेड़ बकरियों की तरह ट्रक और मेटाडोर में भरकर नहीं जाना पड़ता। 
राज्य सरकारें कुछ भी दावा करें, लेकिन प्रवासी मजदूर इन दिनों पूरी तरह लावारिस दिख रहा है। 14 मई को ही केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने मजदूरों को घर तक पहुंचाने के लिए पीएम केयर्स फंड से एक हजार करोड़ रुपए खर्च करने की घोषणा की है। सवाल उठता है कि यह राशि कब खर्च की जाएगी? मजदूरों का पलायन तो लॉकडाउन के पहले दिन से ही हो रहा है। अभी भी करोड़ों मजदूर सड़कों पर है या फिर अवैध वाहनों में सफर कर रहे हैं। केन्द्र और राज्यों के प्रयास नाकाफी है। सामान्य दिनों में जो टे्रने ठसाठस भरी रहती थी, उनकी जगह स्पेशल टे्रने चलाई जा रही है। आबादी को देखते हुए यह ऊंट के मुंह में जीरा की कहावत का चरितार्थ करता है।

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