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सोमवार, 24 जून 2019

इंसान जो बोता है,वही उसे काटना पड़ता है

मनुष्य परिस्थितियों का दास होता है... 
ये वाक्य अरस्तु ने कहा था और अक्सर लोग आज भी उदाहरण के रूप में अपनी विवशता पर आज भी कहते हैं, परन्तु अरस्तु की अगली लाइन कोई नहीं कहता कि "मनुष्य उस परिस्थितियों का जनक भी है"जो उसके सामने मुंह फाड़कर खड़ी है।
प्रतापगढ़ नगर क्षेत्र में जिनके-जिनके घरों में पानी घुसा वो ईमानदारी से बतायेंगे कि वो मछली मारे या नहीं ? हरियाली महाराज वाला विकास रूपी 22 वर्षीय पहिना, सौरी, सींघी, मांगुर, टेंगना अथवा सहरी मिला या पानी उलचने के बाद बाबाजी का ठुल्लू से काम चलाना पड़ा। माफ करिएगा जिन्हें मेरी बात खराब लगे कि उनके घरों में किचेन, बेडरूम और पूजा वाले कमरे तक गन्दे नाले का पानी घुसा और उन्हें मजबूर होकर अपने हाथों से उसे साफ करना पड़ा। मुझे उनकी इस बेबसी पर परिहास का कोई हक नहीं परन्तु 22 वर्ष तक उनके चुनाव पर परिहास का पूरा हक है। जिन्होंने 22वर्षो तक सिर्फ ये कहकर अपना वोट उस ब्यक्ति को किया जो बर्थडे, मरनी, करनी, शादी विवाह में खींस निपोरे आ जाता हो। यदि खींस निपोरने से गदगद होकर अपना वोट 22 वर्षो तक एक ब्यक्ति को देकर अपने-अपने घरों में गन्दे नाले का पानी घुसाने की शौक जिन शहरियों ने पाल रखी है, उन्हें जल भराव पर एक शब्द बोलने का हक नहीं है। क्योंकि बोवई पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होई...???
चूँकि उन्होंने ही उस परिस्थिति को जन्म दिया है जो उनके सामने मुंह फाड़कर हर वर्ष बरसात में खड़ी हो जाती है। फिर तो उन्हें इस मुद्दे पर सहनशक्ति दिखाने के अतिरिक्त किसी भी तरह का अधिकार शेष नहीं रह जाता। ऐसा कहना इसलिये जायज है,क्योंकि जब उन्हें मौका मिला तो उन्हें खींस निपोरने वाला सख्स अच्छा दिखा। उस वक्त उनके भीतर राष्ट्रवाद कूट कूट कर ऊपर से नीचे तक समाहित हो गया था। कभी मोदी के नाम पर तो कभी हिंदुत्व के नाम पर लोग शिकार हो जाते हैं। कभी प्रलोभन में आकर तो कभी मतों के सौदागरों के बहकावे में आकर कालिदास बनकर उसी डाल को काटना शुरू कर देते हैं,जिस पर वो स्वयं बैठे होते हैं। मतदाताओं की स्थिति कभी-कभी ऐसी दिखती है जैसे वो निर्णय लेने में अक्षम एवं असमर्थ हों !
चुनाव के समय अनेक विकल्प होते हैं, परन्तु सभी विकल्पों को त्यागकर अच्छे एवं सुयोग्य उम्मीदवार को नकार कर जब एक ही ब्यक्ति के नाम पर बार-बार प्रतापगढ़ के नगरवासियों ने अपनी मुहर लगाई और उसे ही अपना भाग्य विधाता चुना तो उन्हें उसमें किसी भी प्रकार की कमी निकालने का हक अब नहीं है। जैसे अपना लड़का नकबहना निकल जाए तो उसे और उसको पैदा करने वाले चिकित्सक, नर्स और दाई को दोष देना ब्यर्थ होता है और अपने भाग्य को स्वीकार कर उसे अपनाना पड़ता है। उसके लिए हर समय एक नकपोछनी अपने पास रखनी पड़ती है। ठीक उसी तरह से शहरियों को अपने चुने हुए जनप्रतिनिधियों के बारे में एक शब्द भी बोलना अनुचित होगा। फिर किस मुंह से उसका या उसके किसी कृत्यों का विरोध करोगे जब आपने ही उसे निर्वाचित किये हो...???

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