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गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

साइबर क्राइम की जानकारी न रखने वाले दे देते हैं मनगढ़ंत,तहरीर और पुलिस के हाकिम भी जानकारी के अभाव में दर्ज कर लेते हैं,उसी आधार पर मुकदमा...!!!

जानिए क्या है,भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम-2008 धारा-66E...???
प्रतापगढ़। पुलिस के आलाधिकारियों से निवेदन है कि बढ़ते साइबर क्राइम के मद्देनजर प्रत्येक पुलिस थाने/कोतवाली में कम से कम एक साइबर क्राइम की एक किताब प्रभारी निरीक्षको को खरीदकर अध्ययन करने के लिए निर्देशित करें ताकि वादी मुकदमा की तहरीर पर जो धारा बने वहीं जी डी में अंकित करें। अन्यथा जानकारी के अभाव में बिना पढ़े किसी की तहरीर पर किसी सभ्रांत व्यक्ति पर मुकदमा लिख देना भी एक अपराध है। इस तरह सरकारी काम में सिर्फ बाधा ही पड़ती है। जिस तरह एक व्यक्ति जब तक चुनाव नहीं लड़ता तब तक उसकी सम्पत्ति,अपराध और शिक्षा एवं परिवारिक जानकारियां निजी होती हैं और जिस दिन वह निजी जीवन से सार्वजनिक जीवन में कदम रखता है और रिटर्निंग ऑफीसर के समक्ष नामांकन कर देता है तो उस दिन से उसकी सूचना सार्वजनिक हो जाती है। उसके द्वारा दी गई समस्त सूचनाएं नोटिस बोर्ड पर चस्पा कर सार्वजनिक कर दिया जाता है। ठीक उसी तरह से किसी व्यक्ति की निजता का उल्लंघन तब होगा जब कोई व्यक्ति उसके बाथरूम और बेडरूम में उसके गुप्तांगों का वीडियो बनाकर वायरल करे तो भारतीय सूचना प्राद्योगिकी अधिनियम-2008 की धारा-66E प्रभावित होती है...!!!
विधायक समर्थक वादी मुकदमा जयेंद्र नाथ उपाध्याय...!!!
प्रश्नगत प्रकरण का उल्लेख विधायक रानीगंज अभय कुमार उर्फ धीरज ओझा के एक डांस प्रोग्राम के वीडियो के वायरल होने से संबंधित है। विधायक के एक समर्थक द्वारा 11लोंगो पर जिस भारतीय सूचना प्राद्योगिकी अधिनियम-2008 की धारा-66E के तहत मुकदमा दर्ज कराकर विधायक के मानमर्दन और उनके सम्मान एवं निजी जीवन में हस्तक्षेप करने की दुहाई दी गई है। वादी मुकदमा तहसील स्तर के एक अधिवक्ता हैं,जिन्होंने अपनी तहरीर में ये स्वीकार किया है कि तहसील बार के चुनाव के बाद पदाधिकारियों के शपथ के दिन आयोजित कार्यक्रम में धीरज ओझा जो खुद भी अधिवक्ता हैं,उन्हें आमंत्रित किया गया था और उस आयोजन में उन्होंने उक्त डांस किया था। वादी मुकदमा एक अधिवक्ता होते हुए भी सवाल भारतीय सूचना प्राद्योगिकी अधिनियम-2008 की धारा-66E का अध्ययन किए बिना तहरीर देकर थाना रानीगंज में 11लोंगो पर मुकदमा दर्ज कराया। दुःखद और दुर्भाग्य की बिना कानून की किताब पढ़े प्रभारी निरीक्षक महोदय ने तहरीर के आधार पर मुकदमा लिख भी लिया,परन्तु जो मुकदमा लिखा गया उसके अनुसार देश में लागू भारतीय सूचना प्राद्योगिकी अधिनियम-2008 की धारा-66E कहीं से प्रभावित ही नहीं होता।
रानीगंज विधायक धीरज ओझा के डांस वाले वीडियो में वादी मुकदमा ये स्वीकार करता है कि वीडियो में जो डांस कर रहे हैं वो धीरज ओझा तो हैं परन्तु वो वीडियो पुरानी है। वो वीडियो विधायक बनने के बाद की नहीं है। यानि ये तय हो गया कि ये वीडियो धीरज ओझा की है। अब वादी मुकदमा की ये भी बात मान ली जाए कि उक्त आयोजन जिसमें धीरज ओझा सार्वजनिक रूप से डांस किए वो वास्तव में तहसील बार के चुनाव के बाद शपथ समारोह के समय का है। चलिए ये भी तय हो गया। फिर ये विवाद किसने पैदा किया कि वो डांस वाला वीडियो हाल मे सम्पन्न हुए माँ बाराही धाम चौहर्जन के महोत्सव के समय का है...? फिलहाल हमने तो सिर्फ वायरल वीडियो पोस्ट किया और जिस गाने पर धीरज ओझा डांस कर रहे थे उस गाने का लिरिक्स पोस्ट किया। अब कमेंट में धीरज ओझा के समर्थक ही कहने लगे कि ये वीडियो पुराना है। माँ बाराही महोत्सव का नहीं है। ये तो वही कहावत चरितार्थ हुई कि "काना रहई खोंच जाई...!!!"
अब यक्ष प्रश्न ये है कि वीडियो नया है या पुराना ? परन्तु वीडियो तो धीरज ओझा के डांस का ही है। फिर बात आती है डांस करते धीरज ओझा के वीडियो में छेड़छाड़ करने की तो ये कार्य लैब टेस्टिंग का है। परन्तु फौरी तौर पर वीडियो के साथ छेड़छाड़ करने जैसे हालात दिख नहीं रहे। रहा सवाल ऐसे वीडियो के वायरल करने का तो ऐसे हो रहे वायरल वीडियो की खबर मीडिया के लिए अहम है जिसे देश का कानून भी सार्वजनिक करने की इजाजत देता है। कई न्यूज़ चैनल तो वीडियो का वायरल सच का प्रोग्राम बकायदा अपने चैनल पर दिखाते हैं। वादी मुकदमा जयेंद्र नाथ उपाध्याय एडवोकेट से सवाल कि क्या वो ये बतायेंगे का कष्ट करेंगे कि ये आयोजन किस वर्ष का है और उसकी तारीख क्या रही ? क्या आयोजन की अनुमति संबंधित उप जिलाधिकारी से ली गई थी अथवा नहीं ? क्या बार एसोसिएशन के चुनाव के बाद पदाधिकारियों के शपथ समारोह में नर्तकियों का डांस कराने की अनुमति बार कौंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश देता है ? क्या अधिवक्ताओं का सम्मान और मान मर्दन ऐसे आयोजनों से नहीं होता...???
धीरज ओझा तो विधानसभा चुनाव 2017में अपने संबंध में नामांकन प्रपत्र के साथ हलफनामा देकर जनता को बता चुके हैं कि उनकी हैसियत क्या है ? उनकी शिक्षा कितनी है ? परिवार का विवरण भी घोषित कर चुके हैं और अपनी सम्पत्ति के साथ-साथ अपने आपराधिक इतिहास को भी बता चूके हैं। परन्तु वादी मुकदमा अपनी तहरीर में स्वय को अधिवक्ता बताना और जूनियर बार एसोसिएशन रानीगंज का संस्थापक अध्यक्ष होना बतया गया है। वादी मुकदमा श्री उपाध्याय जी ने ये नहीं बताया कि काली कोट की आंड़ में वो क्या-क्या गुल खिलाते हैं ? अवैध आरा मशीन का संचालन करना स्वयं का आपराधिक इतिहास होना उनकी छवि में चार चाँद लगाता है। इससे उनकी छवि में और निखार आता है। शपथ समारोह में नर्तकी बुलाकर डांस कराना भी उनकी छवि को समाज में गति देने का कार्य करता है। विधायक का समर्थक बनना आसान है। वादी मुकदमा भी बनना आसान है। LLB कर बार कौंसिल उ प्र से रजिस्ट्रेशन कराकर काली कोट धारण करना आसान है,परन्तु कनून का जानकार होना उतना ही कठिन है। इसलिए श्री उपाध्याय जी को सलाह है कि वादी मुकदमा बनने से पहले कानून की जानकरी उन्हे अवश्य कर लेनी थी कि उनकी तहरीर में लगाए गए आरोप भारतीय सूचना प्राद्योगिकी अधिनियम-2008 की धारा-66E पर फिट बैठ पाएगा अथवा खुद के गले की फांस बनेगा...!!!

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