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शनिवार, 5 मई 2018

ब्यवस्था में सार्वजनिक एवं संवैधानिक पदों पर महिलाओं को मिलने वाला महिला आरक्षण का नहीं मिला रहा वास्तविक लाभ

क्या देश में महिलाओं के मिलने वाले आरक्षण से जिस पद के लिए वो निर्वाचित हुई और उस पद की शपथ भी ली और उसके बाद अचानक से गायब हों जाए और उस पद पर यदि उसके पति/पुत्र/ससुर/देवर/जेठ के साथ-साथ जिसने उस महिला को उस पद/सीट पर स्थापित कराया यदि उसका ही कब्जा रहा तो ऐसे लोग दीमक से भी अधिक खतरनाक हैं...???
ये अक्सर देखने व सुनने को मिल जाता है कि आईये,आईये प्रधान जी ! जबकि वो प्रधान नहीं रहते ! उनके घर से उनकी पत्नी अथवा बहू या कोई अन्य महिला प्रधान रहती है l फिर भी आमलोग उन्हें अति सम्मान में उस महिला द्वारा प्राप्त पद को उन्हीं के लिए उद्बोधन सुनकर मन में एक सवाल पैदा होना लाजिमी है l ठीक इसी तरह प्रमुख का पद,जिला पंचायत अध्यक्ष का पद,निकायों में मेयर अथवा चेयरमैन का पद के लिए भी लोगों में उस महिला के प्रति वो भावना नहीं उत्पन्न हो पाती जिसके लिए वो निर्वाचित हुई l पुरुष प्रधान देश में महिलाओं को आरक्षण तो दे दिया गया परन्तु उसे उसका वास्तविक हक़ आज भी प्राप्त न हो सका जो ब्यवस्था में बैठे जिम्मेदार लोग हैं उनके चेहरे पर ये विसंगति का जोरदार चाटा है l मेरी बात का जिसे भरोसा न हो वो उदाहरण स्वरूप उसका सत्यापन कर सकता है l नगरपालिका परिषद् बेला प्रतापगढ़ में घटित घटनाक्रम को देखकर आरोपों की पुष्टि कर सकता है l प्रतापगढ़ नगरपालिका के चेयरमैन के रूप में प्रेमलता सिंह चुनाव जीतकर शपथ ली और कुछ दिनों तक सक्रिय रही,परन्तु पति हरि प्रताप सिंह उन्हें पूर्ण रूप से अपने पद पर आजादी के साथ कार्य करने की छूट नहीं दी है,जबकि हरि प्रताप सिंह राजनीतिक ब्यक्ति हैं l निकाय चुनाव के बाद 12 दिसम्बर में शपथ समारोह के बाद से पूर्व चेयरमैन हरि प्रताप सिंह और नगरपालिका में तैनात अधिकारियों से खटपट शुरू हुई जो अब उग्र रूप ले लिया है l चेयरमैन प्रेमलता अब सिर्फ नाम की चेयरमैन हैं l नगरपालिका का पूरा कार्य उनके काबिल हरफनमौला पति हरि प्रताप सिंह सारी डील खुद करने लगे हैं l सबसे बड़ी समस्या है नगरपालिका के कार्यों में होने वाले भ्रष्टाचार का जो बिना लेनदेन के एक कदम आगे बढ़ता ही नहीं l 
नगरपालिका में 25 वार्ड हैं और इस लिहाज से 25 वार्ड सदस्य मिलाकर नगरपालिका का बोर्ड बनता है,जिसके सचिव EO होते हैं l सिर्फ EO ही पदेन होता है l बाकी सब समाजसेवा के लिए होते हैं l अब खाली पेट तो समाजसेवा होने से रही l चूँकि बहुत सारे सभासद लाखों रुपये खर्च कर चुनाव जीते हैं l पहली बार जीतने वाले सभासदों को नगरपालिका में अपनी कमाई का अंदाजा नहीं रहता l चुनाव जीतने के पहले भी वो अपने अधिकार और कर्तब्यों के बारे में पूरी जानकारी नहीं रखते l उस वक्त उनका मकसद सिर्फ और सिर्फ चुनाव जीतना रहता है l चुनाव जीतने के बाद चुनाव में लगे धन को हर ब्यक्ति वापसी चाहता है l शपथ लिए छः माह हो गए और सभासदों को सिर्फ लालीपॉप ही मिला l चेयरमैन प्रेमलता पति हरि प्रताप सिंह तो अपना दाए-बाए वाला खेल खेलना शुरू कर दिया है l चूँकि हरि प्रताप सिंह पुराने खिलाड़ियों में से एक हैं l उन्हें तो सारे दांव बाखूबी पता है l अब समस्या सिर्फ सभासदों की बची l सभासद कभी पूर्व चेयरमैन हरि प्रताप सिंह के पास जाते और कभी EO के पास आकर अपने भले की पहल हेतु बात करते परन्तु उनके मतलब की बात हल नहीं हो रही थी l जब बर्दाश्त की सीमा समाप्त हो गई तो सभासदों ने एकराय होकर सबसे पहले नगरपालिका के अधिकारियों पर बगावत का बम फोड़ा l अब इस बगावत में चेयरमैन पति हरि प्रताप सिंह किस हद तक शामिल हैं,कह पाना मुश्किल है l वर्तमान में नगरपालिका में तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों को उस वक्त असहज होना पड़ता है जब चेयरमैन का फोन आता है अथवा चपरासी से बुलावा आता है कि चेयरमैन साहेब से बात कर लीजिये तो उन अधिकारियों और कर्मचारियों को पूछना पड़ता है कि चेयरमैन अथवा चेयरमैन पति से...? चेयरमैन पति अपने विश्वासपात्र कर्मचारियों के फोन से नगरपालिका के अधिकारियों से मोबाइल फोन पर भी बात करके अर्दब में भी लेने का कार्य किया जाता है ताकि कोई सबूत उस अधिकारी के पास न रह जाए जिससे उनकी हाट टाक हुई l 

निकाय चुनाव के बाद शपथ समारोह सम्पन्न हुआ और शपथ समरोह को ऐतिहासिक बनाने के लिए चेयरमैन पति ने नगरपालिका के ठेकेदारों से काफी पैसा ब्यवहारिक रूप में खर्च करा लिया l ठेकेदार भी आशान्वित रहे कि अब भुगतान होगा तब भुगतान होगा l परन्तु नियम और कानून के दायरे में रहकर वर्तमान EO ने बहुत सारे कार्य जो अनर्गल हुए थे उसका भुगतान करने से हाथ खड़े कर दिए l यहीं से चेयरमैन पति और EO में रार ठनी l EO को कुछ लोग रात्रि में फोन पर जान से मारने की धमकी भी दिए और खैरियत चाहते हो तो अपना तवादला कराकर प्रतापगढ़ से निकल लेने का सुझाव भी दिया l उस धमकी का EO ने कोतवाली नगर में मुकदमा भी लिखाया l चेयरमैन पति EO अवधेश यादव की तिकड़ी तोड़ने के लिए सफाई इंस्पेक्टर ऋषिपाल सिंह को हादीहाल तुलसी सदन और JE जलकल जेबा आगा को जलकल परिसर में ही रहने का मौखिक आदेश दे दिया,जिसे EO अवधेश यादव ने क्रियान्वित नहीं किया और कारण स्पष्ट करते हुए चेयरमैन पति को बताया कि जो जनसमस्या आती है वो आपके पास और EO के पास आती है तो उसका निस्तारण कैसे होगा ? अधीनस्थ कर्मचारी तो पास में रहेंगे तभी उन्हें निर्देशित किया जाएगा l इसी परिपेक्ष्य में तत्कालीन जिलाधिकारी डॉ आदर्श सिंह और आपने ODF और ऑनलाइन शिकायत के निस्तारण हेतु एक ऐप का निर्माण कराया था और उसी के लिए मानिटरिंग हेतु एक कक्ष का निर्माण कराया गया था जहाँ से शिकायतों का निस्तारण किया जाता था l बात आई गई और बात खत्म हो गई l परन्तु होशियार और सर्वगुण सम्पन्न चेयरमैन पति ने सभासदों को आगे कर नया दांव नगरपालिका के अधिकारियों के विरुद्ध चला l 
इस दांव में अधिकतर सभासद जो चेयरमैन पति के अति निकट हैं उनके द्वारा EO के कक्ष में EO, सफाई इंस्पेक्टर और JE जलकल से असंसदीय भाषा का प्रयोग करते उन्हें उन सबको नगरपालिका परिसर से खदेड़ दिया और सफाई इंस्पेक्टर और JE जलकल के कक्ष को कब्ज़ा कर सभासद कक्ष का स्टीकर लगा दिया l EO ने इस घटना की सूचना चेयरमैन और उनके पति हरि प्रताप सिंह को दी l साथ ही जिलाधिकारी को भी लिखित रूप में घटना क्रम से अवगत करा दिया l इसीबीच नगरपालिका के सफाईकर्मी हड़ताल कर दिए l हड़ताल को समाप्त कराने के लिए चेयरमैन पति हरि प्रताप सिंह नगरपालिका पहुंचे l जिलाधिकारी के निर्देश पर एस डी एम सदर और ई ओ नगरपालिका भी हड़तालियों से मिलने पहुंचे l तस्वीर में सबसे आगे हड़ताल पर रहे आक्रोशित कर्मचारियों को निर्देशित करते वर्तमान चेयरमैन प्रेम लता सिंह के पति हरि प्रताप सिंह को देखा जा सकता है l सवाल ये है कि चेयरमैन पति किस अधिकार से ये सब कार्य देख रहे हैं ? यक्ष प्रश्न यही है कि क्या ये वर्तमान चेयरमैन प्रेम लता सिंह के पति की हैसियत से नगरपालिका के कार्यों में अडंगा लगाते हैं अथवा पूर्व चेयरमैन की हैसियत से या अपनी पत्नी के चेयरमैन के प्रतिनिधि के अधिकार से नगरपालिका में अपना प्रभाव और हस्तक्षेप बनाये हुए हैं l मीडिया द्वारा पूंछे गए सवालों में भी चेयरमैन का नहीं बल्कि चेयरमैन पति का वर्जन प्रकाशित होता है l क्या ये नियमतः ठीक है ? क्या देश 71 वर्ष की स्वतन्त्रता के बाद भी आज गुलामी की बेड़ियों से जकड़ा हुआ है ? देश में आरक्षण के लिए युद्ध जैसी स्थिति पैदा है l वोटबैंक प्रभावित न हों इसलिए सत्ता पक्ष के नेता और सरकार आरक्षण दिए जाने की हिमायती हैं l आरक्षण चाहे SC/ST का हो अथवा OBC का परन्तु है,देश के लिए घातक ही...!!! क्योंकि जिस तरह पैदा होने से लेकर मरने के पहले तक आरक्षण पाकर SC/STऔर OBC में सुधार नहीं आ पा रहा है l ठीक वैसे ही राजनीति में सत्ता से लेकर विभिन्न पदों पर महिला का निर्वाचन भले ही हो जाए परन्तु उसका शौहर उसे स्वतंत्रपूर्वक कार्य नहीं करने देता l हर कार्य में बिघ्न डालता है और वो महिला सिर्फ और सिर्फ हाउस वाइफ बनकर ही रह जाती है l 
भारत गाँवों का देश है इसलिए सबसे नीचे पायदान से इसकी शुरुवात करते हैं l एक ग्राम सभा में प्रधान पद पर आरक्षण के तहत एक महिला का निर्वाचन होता है और निर्वाचन और शपथ के बाद सारा हिसाब किताब प्रधानपति अपने कब्जे में कर लेता है l बहुत सारे प्रधान तो खाते का संचालन तक कर रहे हैं l फिर असल प्रधान घर में कैद रहती है और प्रधानी उसका पति ही करता है l ठीक वैसे ही प्रमुख पति, चेयरमैन पति, जिला पंचायत अध्यक्ष पति और विधायक व सांसद पति तक का पद सृजित हो चूका है l अपना काम निकालने के लिए उन्हें ही उस पदनाम से संबोधित करती है l मजे की बात तो ये है कि जिसका काम फंसा हो यदि वो उस पति को उस पदनाम से उच्चारित करता है तो भी समझ में आता है,परन्तु सिस्टम में जिले की कमान जिसके हाथ में हो जब वो भी उस पदनाम पर जिसे शपथ दिलाया उसे बुलाने के बजाय उसके पति को उस पदनाम से बुलाता है तो यही एहसास होता है कि देश को 71 वर्ष की स्वतन्त्रता के बाद जब आरक्षण के कारण एक महिला अपने पदनाम को सुरक्षित और संरक्षित नहीं कर सकती तो उसे अभी 700 वर्ष और दे दिए जाए तब भी उसकी यही दशा रहेगी l उसमें बिलकुल सुधार होने की कहीं से कोई गुंजाइश नहीं रहेगी l फिर तो मन मसोसकर यही कहना होगा कि जिस तरह लकड़ी को दीमक बर्बाद कर रहा है ठीक उसी तरह देश को आरक्षण बर्बाद कर रहा है l ऐसे आरक्षण देने का क्या फायदा जिससे जिसे आरक्षण दिया गया यदि उसमें सुधार न हो सके l महिला सीट पर यदि उसके पति/पुत्र/ससुर/देवर/जेठ के साथ-साथ जिसने उस महिला को उस सीट पर स्थापित कराया यदि उसका ही कब्जा रहा तो ऐसे आरक्षण की ब्यवस्था किस काम की...???

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