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शनिवार, 11 नवंबर 2017

भाजपा का हो रहा कांग्रेसीकरण...!

भाजपा के दोहरे चरित्र से बहुतों का मन हुआ विचलित....
ये भाजपा का कम्पेन था,जिसे मोदी जी ने चलाया था...
आम चुनाव लोकसभा चुनाव-2014 से पहले अर्श पर पड़ी भाजपा को जब नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व मिला तो भ्रष्टाचार,दुराचार,ब्यवस्था में पारदर्शिता लाने जैसे सैकड़ो मुद्दे भाजपा के चुनावी मेनोफेस्टो मेशामिल थे।देश की जनता को नरेन्द्र मोदी पर अटूट विश्वास हो गया और देश में परिवर्तन की बयार बहने लगीसारे राजनीतिक दल आपस में गठजोड़ कर मोदी का विरोध करना शुरू किया परन्तु देश की जनता अपना जो मन एक बार बना लिया तो उससे उसके इरादों से कोई दल डिगा न सका। लोकसभा चुनाव से पहले होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा की कम और भाजपा कम्पेन कमेटी का अध्यक्ष चुने जाने से उनके राजनीतिक भविष्य की अग्नि परीक्षा थी। फिलहाल जनता ने मोदी जी को उस अग्नि परीक्षा में पास कर दिया और लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी मोदी जी को भाजपा के कई नेताओं के विरोध के बाद भी बनाना पड़ा 
ना खाऊंगा और न खाने दूंगा 
मोदी जी के पक्ष में चुनावी समीकरण बनता गया और लोकसभा चुनाव हुए जिसमें भाजपा को अकेले बहुमत प्राप्त हुआ। परन्तु भाजपा अपने सहयोगी गठबंधन दलों के सहयोग को तवज्जो देते हुए सरकार में उन्हें भी शामिल किया।  सबसे अधिक तनाव शिवसेना ने दिया।महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में शिवसेना और भाजपा का गठबंधन टूट गया और दोनों दल अलग चुनाव लड़ गए  शिवसेना का अहंकार चकनाचूर हुआ सबसे बड़े दल के रूप में भाजपा को सीट प्राप्त हुई थी पूरा चुनाव का परिणाम आया भी नहीं था कि NCP प्रमुख शरद पवार ने भाजपा को बाहर से सरकार बनाने का समर्थन का ऐलान कर दिया यानि भाजपा की राह आसान कर दी और शिवसेना की बोलती बंद हो गई बहुमत के आभाव में NCP प्रमुख शरद पवार के सहयोग से भाजपा महाराष्ट्र में सरकार बनाकर बहुमत हासिल कर लिया।बाद में शिवसेना को भी मोदी जी के बाद सरकार में शामिल कर लिया गया यही से शरू हुआ भाजपा का कांग्रेसीकरण। 
बीजेपी से बचेगा तब तो मिलेगा.... 
जम्मू और कश्मीर में विधान सभा चुनाव हुआ और वहां सरकार बनाने के लिए भाजपा ने सारे सिद्धांतो की बलि चढ़ाते हुए PDP प्रमुख मुफ्ती से हाथ मिलाकर वहां भी सरकार बना ली बहुत आलोचनाओ से भाजपा नेताओं को सामना करना पड़ा। अभी हाल में बिहार में नितीश कुमार के साथ सरकार बनाकर भाजपा ने ये साबित कर दिया कि उसमें और कांग्रेस में सत्ता पाने वाली सोच में बहुत फर्क नहीं है। वर्तमान में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को कमजोर करने के लिए भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे प्रणव रॉय को भाजपा में शामिल करना इस बात पर पुनः मुहर लगाकर उसको प्रमाणित कर दिया। उ.प्र.में कांग्रेस से जगदम्बिका पाल, बसपा से स्वामी प्रसाद और कई दलों का स्वाद चखने वाले महाभ्रष्टाचारी नन्द गोपाल नंदी जैसे दर्जनों चेहरे हैं। यानि कोई दल का नेता कितना भी बड़ा भ्रष्टाचारी क्यों न हो,परन्तु यदि वो भाजपा में शामिल जाता है तो वह पवित्र हो जाता है क्या यही भाजपा की साफ़ सुथरी छबि वाली राजनीति है,जिसे हम लोग देख रहे हैं...? 
राजनीति एक वेश्या है,इस पर भरोसा नहीं है... 
भ्रष्टाचार के आरोपी नेताओं का एक के बाद एक भाजपा में शामिल होना,भाजपा का कांग्रेसीकरण (भ्रष्टाचारीकरण)होने का संकेत दे रहा हैं। वहीं भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा के अलग पार्टी होने के दावे को इससे गहरा धक्का और धब्बा लग रहा हैं। एक समय वह था जब नारायण राणे को भाजपा भ्रष्टाचार का प्रतिनिधि चेहरा बताती थी और आज वो भाजपा में शामिल होकर पाक-साफ हों गये हैं। यही नहीं तृणमूल कांग्रेस के मुकुल रॉय, पूर्व कांग्रेसी और भ्रष्टाचार(टेलीफोन घोटाला) के आरोपी सुखराम, शारदा हाउसिंग सोसाइटी के आरोपी नारायण राणे, लैंड एंड माइनिंग घोटाला के आरोपी येदियुरप्पा का भी भाजपा में शामिल होना आखिर किस बात का द्योतक हैं...? भाजपा सत्ता की चाहत में हर किसी का स्वागत कर रही हैं,जो पार्टी में शामिल होना चाहता हैं।
 BJP इन्हें ही पार्टी में शामिल कर लें तो भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा...
भाजपा ने राजनीतिक गठजोड़ के लिए ज्यादा व्यावहारिक रास्ता चुना है। निर्विवाद सत्ता की अपनी भूख में भाजपा अपने राजनीतिक विस्तार की राह में किसी भी नैतिक बाधा को नहीं आने देना चाहती हैं। चाहे वो पूर्वोत्तर के राज्य हो जहां भाजपा ने पार्टियां तोड़कर सरकार बनाने में गुरेज नहीं किया या गोवा जहां पार्टी ने चुनाव में दूसरे नंबर पर आने के बावजूद रातों-रात गठबंधन करके सरकार बना लिया या फिर तमिलनाडु जहां पार्टी ने सभी राजनीतिक विकल्प खुला रखे हैं। संदेश साफ हैं कि भाजपा राष्ट्रीय राजनीति में अपने रसूख का इस्तेमाल सत्ता पाने में करने से हिचकिचाएगी नहीं। भाजपा का अपरोक्ष कांग्रेसीकरण होने से भाजपा का वैचारिक जनाधार दिनों-दिन खिसकता जा रहा हैं। “इससे पहले भारतीय राजनीति में ऐसा एकाधिकार रखने वाली एकमात्र पार्टी इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ही थी।” अब यहां सवाल लाजिमी हैं कि-“भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा के अलग पार्टी होने के दावे को क्या इससे गहरा धक्का नहीं लगा है...???”

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