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बुधवार, 1 नवंबर 2017

निकाय चुनाव में उम्मीदवारों की उम्मीदवारी खटाई में...

मतदाताओं के समझ से परे राजनीतिक दलों की वेवशी...
राजनीतिक दलों की तानाशाही...!!!
नामांकन शुरू पर उम्मीदवारों का चयन न करना ये स्पष्ट करता है कि राजनीतिक दल जिसे भी टिकट दें,मतदाता उसे स्वीकार करे...!!! यानि ये तो वही हाल हुआ मान न मान,मैं तेरा मेहमान...!!! मतदाता यदि राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को ये कहकर नकार दें कि वो अब तक उनके पास मतदान की भीख माँगने में देर कर दिए और अभी तक 
जहाँ टिकट की भीख मांग रहे थे,वहीं वोट भी मांगे तो राजनीतिक दलों के मठाधीशों की अपनी औकात पता चल जाएगी...!!!
 चोर-चोर मौसेरे भाई वाली कहावत को चरितार्थ करते राजनीतिक दल 
प्रथम चरण के नामांकन में सिर्फ 5 और बचे,परन्तु राजनीतिक दलों की मृतप्राय दृढ़इच्छाशक्ति के कारण निकाय चुनाव के उम्मीदवारों की उम्मीदवारी अभी अटकी हुई है। इसे राजनीतिक दलों का नकारापन न कहे तो क्या कहे...??? लोकसभा चुनाव होता है तो देश भर में चुनाव होने की बात कहकर क्षेत्रीय दलों से तालमेल का हवाला देकर अधिसूचना जारी होने और आदर्श संहिता लगने के बाद उम्मीदवारों की उम्मीदवारी का चयन किये जाने की जैसी प्रथा बन चुकी है। ठीक यही फार्मूला विधानसभाओं में होने वाले चुनाव में राजनीतिक दलों द्वारा किया जाता है। अब उ.प्र.निकाय की बारी है तो यही फार्मूला राजनैतिक दलों द्वारा नगरीय चुनाव (लोकल चुनाव) में भी किया जा रहा है। 
दांव पर राजनीतिक पार्टियों की साख
लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में राजनीतिक पार्टियों की विवशता तो समझ में आती है कि बड़ा चुनाव होता है और उस चुनाव में धन बल और बाहुबल सहित जिताऊ उम्मीदवारों की तलाश करने में वक्त लगता है। साथ ही अधिसूचना के जारी होने तक सभी उम्मीदवारों के बल पर ही राजनीतिक पार्टियां बड़ी-बड़ी जनसभायें करने में सफल होती हैं और जनमानस में अपने-अपने चुनावी माहोल को बताने के लिए अंत तक यानि अधिसूचना जारी होने तक सभी संभावित उम्मीदवारों को एकत्र रखने के लिए उनकी उम्मीदवारी लटकाए रखती हैं। परन्तु निकाय चुनाव जो स्थनीय होता है और उसमें राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों की उम्मीदवारी अधिसूचना के बाद लटकाए रखना किसी भी दशा में ठीक नहीं रहता। 
सूबे में निकाय की अधिसूचना जारी हुए आज 6 दिन हो रहे हैं,परन्तु राजनीतिक दलों द्वारा अपने-अपने उम्मीदवारों की उम्मीदवारी तय नहीं कर पा रहे हैं। इसके पीछे उनकी वेवशी जनता को समझ में नहीं आ रही है। इस उम्मीदवारी को तय करने में गठबंधन भी आड़े नहीं आ रहा है। जनसभाओं को सफल बनाने के लिए सभी उम्मीदवारों को एकजुट रखने जैसी बात भी नहीं है। बसपा और कांग्रेस के लिए निकाय चुनाव में कई वर्षों से नगरीय क्षेत्र में जनाधार ही नहीं है। समाजवादी पार्टी निकाय चुनाव में पार्टी कार्यकर्ता की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती थी,पर इस बार अखिलेश के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद पहली बार समाजवादी पार्टी निकाय चुनाव में अपना उम्मीदवार उतार रही है। 
हलांकि बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष-समाजवादी पार्टी,अखिलेश यादव स्पष्ट कर चुके हैं कि वो निकाय चुनाव का प्रचार नहीं करेंगे। इतने के बाद भी 3 दशकों से निकाय पर भाजपा ही अपना कब्जा बनाये हुए है। भले ही वह डेढ़ दशक से सत्ता के बाहर रही,परन्तु सबसे अधिक समस्या निकाय चुनाव में अपने उम्मीदवारों को लेकर है। ये वही भाजपा है जो अभी हाल ही में हुए दिल्ली एमसीडी चुनाव में जितने सिटिंग मेयर और पार्सद थे,उनके टिकट काट कर नए उम्मीदवारों को टिकट देकर फिर से एमसीडी पर अपना कब्ज़ा बनाये रखने में सफलता अर्जित की। ये वही भाजपा है,जो माह फरवरी में हुए विधान सभा चुनाव में एक भी उम्मीदवार मुस्लिम विरादरी का नहीं रखा। इतने बोल्ड फैसले लेने वाली भाजपा इस बार उ.प्र. के निकाय चुनाव में अपना उम्मीदवार नहीं तय कर पा रही है। इसके पीछे क्या वजह हो सकती है,ये तो भाजपा के रणनीतिकार ही बता सकते हैं,परन्तु जनता में इसे लेकर असंतोष फैल रहा है। जाहिर सी बात है कि अधिसूचना जारी होने के बाद और नामांकन के 4 दिन बीत जाने के बाद भी यदि राजनीतिक दल अपने उम्मीदवार तय न कर सके तो उन्हें चिल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। 

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