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गुरुवार, 14 जुलाई 2016

आधा दर्जन से अधिक अधिवक्ताओं की हत्याओं से सहम उठा प्रतापगढ़....!!!

आधा दर्जन से अधिक अधिवक्ताओं की हत्याओं से सहम उठा प्रतापगढ़...!!!


चौक घंटाघर, प्रतापगढ़ 
इस पोस्ट से मेरा मकशद किसी की भावना को ठेस पहुचाना नहीं है सिर्फ और सिर्फ लगातार हो रहे अधिवक्ताओं के ऊपर हमले और तीन माह में चार अधिवक्ताओं की जान चली जाने से आज मुझे मजबूर होकर अपनी भावना को ब्यक्त करना पड़ रहा है। हर कार्य के पीछे कोई न कोई मकसद होता है चाहे वह प्रत्यक्ष हो अथवा अप्रत्यक्ष हो
समाज में बुद्धिजीवियों के रूप में अधिवक्ताओं की अपनी प्रतिष्ठा होती है। बड़े सम्मान का पेशा था....,अधिवक्ताओं का...! जिस तरह गुरु यानि पुरोहित का स्थान समाज होता है। ठीक उसी तरह मुवक्किल अपने वकील के प्रति आदर व सम्मान रखता है अब समाज में इतनी बड़ी उपलब्धता के बाद आज वही अधिवक्ता ही अपराधियों के निशाने पर है
आखिर क्यों …? क्या इसके पहले अधिवक्ता किसी अपराधी के खिलाफ कोई केश नहीं लड़ता था....? क्या अपराधियों को इसके पहले कोई अधिवक्ता उसके किये की सजा दिलाने का कार्य नहीं करता था...?
जहां एक अधिवक्ता किसी अपराधी को बचाने का पूरा मनोयोग से प्रयास करता है और दूसरा अधिवक्ता उसे सजा दिलाने की पूरी कोशिश करता है। परन्तु वहां किसी अधिवक्ता की हत्या नहीं की जाती। ऐसे में ये सवाल अनायास पैदा होता है कि इन तीन महीनों में जनपद ने चार अधिवक्ताओं को खोया....,तो इसकी वजह क्या रही....? समाज में सभी तबके के लोग इसे लेकर पसोपेश में हैं। पुलिस भी सही विवेचना न कर खानापूर्ति कर अपने दायित्वों से इति श्री कर अपना पिण्ड छुड़ाकर फुर्सत ले लेती है
समाज में अधिवक्ताओं को ही टारगेट क्यों किया जा रहा है...? उनकी ही हत्या क्यों की जा रही है....? कोई न कोई तो वजह होगी...? इस पर सभी को चिंतन करना चाहिए मैं कोई आरोप नहीं लगा रहा हूँ। सिर्फ समाज को और अधिवक्ता बंधुओं को आईना दिखाना चाहता हूँ जूनियर बार के नवनिर्वाचित अध्यक्ष राजदत्त मिश्रा की हत्या घर से कचेहरी के रास्ते में आते समय हुई थी और सदर तहसील व नगर कोतवाली के परिसर में तहसील पहुचते ही अज्ञात बदमाशों ने अपना निशाना प्रभाकर सिंह "मीनू" को बनाकर दिनदहाड़े सरेआम गोली मारकर कोतवाली गेट से भाग जाना चुनौती भरा कार्य रहा। इन्द्र मणि शुक्ल एवं जवाहर दुबे की गोली मारकर हत्या होने से अधिवक्ता समाज के सामने अत्यन्त चिंता जनक स्थिति पैदा हो चुकी है
सबसे अहम् सवाल ये है कि जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन शहर के प्रमुख चौराहों व सरकारी दफ्तरों में लाखो रुपये खर्च कर सी. सी.टी. बी. कैमरा लगाकर बड़े - बड़े दावे तो करने से नहीं अघाता कि सावधान आप कैमरे कि जद में यानि गिरफ्त में हैं...! ऐसे में ये बड़ा सवाल है कि सदर तहसील में लगा कैमरा क्या कर रहा था...? मैंने आज सदर तहसील और नगर कोतवाली सहित शहर के प्रमुख चौराहों का निरीक्षण किया तो उसकी सच्चाई देख दंग रह गया आइये आपको भी इस कड़वी सच्चाई से अवगत कराते हैं। सदर तहसील में लगे कैमरे को अराजक तत्वों ने उस पर मिट्टी पोत दिया है
यही सबसे बड़ी सच्चाई है, जो लोग सुनना नहीं पसंद करते अब इस बात को पुलिस अपने विवेचना में शामिल ही नहीं करेगी सदर तहसील में रजिस्ट्री दफ्तर को लेकर कई बार अधिवक्ताओं में आपस में ही टकराव हुआ था,जिसे समय - समय शांत करा दिया गया रजिस्ट्री दफ्तर में कराये जाने वाले बैनामों में कुछ अधिवक्ता बंधु खुलेआम वसूली करते हैं।इस बात को जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन भी जानता है। परन्तु क्या करे…? मजबूर है, वो....! सवाल ये भी है जितनी हत्याए अधिवक्ता बंधुओं की हुई,उसमें भाड़े के शूटर इस्तेमाल किये गए। अब ये भाड़े के शूटर को भाड़ा किसने दिया…? यानि सुपारी किसने दी और क्यों दी...? ये है जांच का विषय…!
मैं दावे के साथ कहता हूँ कि कुछ अधिवक्ता बंधु काली कोट को अपना हथियार बनाकर गलत कार्यों में लिप्त हैं। जिसके लिए पूरे अधिवक्ता समाज को बदनाम होना पड़ रहा है अपनी प्रतिष्ठा और व्यवसाय से भी हाथ धोना पड़ रहा है। जिला मुख्यालय और तहसील मुख्यालयों के अधिवक्ता परिवार को जोड़ लिया जाय तो संख्या करीब 10,000 तक की है। इतना मजबूत संघठन और अपने ही न्याय के लिए 3 माह से लगातार हड़ताड़ करना भी अधिवक्ता समाज के अस्तित्व पर सवाल खड़ा करता है आम जनता जहां न्याय की चौखट पर इस विश्वास के आती है कि उसे न्याय मिलेगा। परन्तु उसे मिलती है तो सिर्फ तारीख पर तारीख...! क्या यही न्याय ब्यवस्था होनी चाहिए…? जिसके सूत्रधार अधिवक्ता बंधू ही हैं, जो आज स्वयं निशाने पर हैं…!!!

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