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बुधवार, 6 जुलाई 2016

स्मृति इरानी को भारी पड़ सकता है अनुप्रिया पटेल का आना...!!!

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जिस तेज़ी से अनुप्रिया पटेल का उदय हुआ है, वह किसी अचम्भे से कम नहीं है। मंगलवार को जब अनुप्रिया ने केन्द्रीय मंत्री की शपथ ली, उस दृश्य को देख कर स्मृति ईरानी की यादें ताज़ा हो गईं, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में उनको अपने मंत्रिपरिषद में स्थान दिया था। मिर्ज़ापुर की युवा सांसद की पदोन्नति का साफ संकेत है कि लखनऊ के सिंहासन पर विजय पाने के लिए भाजपा की रणनीति में अनुप्रिया अहम भूमिका निभाएंगी। अगर ऐसे होता है तो इसका सीधा असर स्मृति इरानी के राजनीतिक आकांक्षाओं पर पड़ेगा जो विधानसभा चुनावों मे एक महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी तलाश रही हैं। 

मंत्री पद की शपथ लेतीं अनुप्रिया पटेल

अनुप्रिया के पिता सोनेलाल पटेल ने बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम के साथ कई साल काम किया था, लेकिन जब कमान मायावती के हाथ में आई तब उन्होंने पार्टी छोड़ कर 1994 में ‘अपना दल’ का गठन किया। 2009 में उनकी अकाल मृत्यु के बाद अनुप्रिया ने पार्टी के कामकाज में अपनी मां का सहयोग किया। अपना दल का प्रभाव प्रदेश के कुछ हिस्सों में अच्छा खासा है, जिसमें प्रतापगढ़, इलाहाबाद, वाराणसी, राबर्ट्सगंज और मिर्ज़ापुर ज़िले शामिल हैं।





कांशीराम के सहयोगी रहे थे अनुप्रिया के पिता सोनेलाल पटेल 
35 वर्षीय अनुप्रिया ने दिल्ली के प्रतिष्ठित लेडी श्रीराम कॉलेज से स्नातक उपाधि प्राप्त की। उसके बाद उन्होंने एमबीए की डिग्री भी ली। 2012 के विधानसभा चुनावों मे वह रोहनियां सीट पर ‘अपना दल’ का परचम लहराया। रोहनियां विधानसभा प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र, वाराणसी में पड़ता है। 2014 लोकसभा चुनावों के पहले अनुप्रिया ने ‘अपना दल’ और भाजपा के बीच समझौते में अहम भूमिका निभाई, इन चुनावों में उनकी पार्टी ने दोनों, प्रतापगढ़ और मिर्ज़ापुर पर अपना कब्ज़ा जमाया।
उसके बाद से अनुप्रिया और उनकी मां कृष्णा जो ‘अपना दल’ की अध्यक्ष भी हैं, उनके बीच मतभेद पैदा होने लगे। 2014 के उप-चुनावों में कृष्णा की हार के बाद मां बेटी के बीच कड़वाहट इतनी बढ़ गई कि कृष्णा ने अनुप्रिया को पार्टी से निष्कासित कर दिया। इसके बावजूद अनुप्रिया को ‘अपना दल’ के एक धड़े का समर्थन प्राप्त है और वह अपनी पार्टी का विलय जल्द ही भाजपा में करने जा रही हैं।















अनुप्रिया एक युवा होने के साथ-साथ एक अच्छी वक्ता भी हैं। इसके अलावा वह एक ओबीसी (पिछड़े समाज) चेहरा भी हैं जिसका पूरा फायदा भाजपा आगामी विधानसभा चुनावों में उठाना चाहती है। उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव को 2019 के पहले का सबसे कड़ा चुनाव माना जा रहा है। अनुप्रिया को मंत्री बना कर भाजपा उनको कुर्मी समाज का चेहरा बना कर चुनाव में उतारेगी। पार्टी को उम्मीद है कि इससे वह समाजवादी पार्टी को टक्कर दे सकती हैं। हाल ही में सपा ने वृद्ध कुर्मी नेता बेनी प्रसाद वर्मा को पार्टी में वापस लिया है।
अनुप्रिया के आने से भाजपा बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार को भी सीमित रखना चाहती है। नीतिश पिछले कुछ समय से पूर्वी उत्तर प्रदेश में काफी सक्रिय दिखाई दिए हैं।मंत्री बनने के बाद अनुप्रिया का राजनीतिक कद बढ़ गया है। इससे अब प्रदेश के चुनावों मे स्मृति इरानी की भूमिका को लेकर प्रश्नचिन्ह लग गया है। अनुप्रिया के विपरीत स्मृति इरानी को अभी भी बाहरी माना जाता है और ना ही उनके पास किसी जाति या समाज विशेष का समर्थन प्राप्त है। स्मृति इरानी का असर अभी तक प्रदेश में केवल राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र अमेठी तक ही सीमित रहा है। अब यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि भाजपा अध्यक्ष ने प्रदेश के चुनावी घमासान में स्मृति इरानी के बजाय अनुप्रिया पर अपना दांव लगाने का मन बना लिया है।




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