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सोमवार, 27 जून 2016

बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय जन्म स्मृति : स्वतंत्रता के मूल मंत्र “वन्दे मातरम” के दृष्टा ॠषि...!!!

बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय जन्म स्मृति : स्वतंत्रता के मूल मंत्र “वन्दे मातरम” के दृष्टा ॠषि...!!!

जब तक भारत रहेगा - तब तक वन्दे मातरम् भी रहेगा, और "बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय" का यशोगान प्रत्येक भारतीय के मानस में गुजांयमानित होता रहेगा....!!!

आनंदमठ



भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रत्येक बलिदानी का अमर घोष– स्वतंत्रता के मूल मंत्र ” वन्दे मातरम ” के दृष्टा ॠषि ” बंकिम बाबू ” का आज जन्म 27 जून 1838 बंगाल के 24 परगना जिला के नेहाटी कस्बे के पास ग्राम कन्ठनपाला में माता दुर्गा देवी और पिता यादव चन्द्र चट्टोपाध्याय के यहाँ हुआ था.
पिता राज्य कर्मचारी थे और मिदनापुर के डिप्टी कलेक्टर पद तक पहुंचे थे. बंकिम बाबू की शिक्षा क्रमशः हुगली मोहिसिन कालेज– प्रेसीडेन्सी कालेज में हुई. कहा जाता है कि वे भारत के प्रथम ग्रैजुएट थे.1857 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद पढाई देर से शुरू होने के बाद भी सत्र नियमन को ध्यान में रखकर परीक्षा समय से ली गयी और प्रथम बैच के प्रथम स्थान पर बंकिम बाबू ने सफलता प्राप्त की. गवर्नर जनरल ने उन्हें अपने यहाँ पर आमंत्रित किया सीधे डिप्टी कलेक्टर पद नियुक्ति पत्र दिया.
भारतीय भाषाओं में उस समय उपन्यास और साहित्य की रचना का प्रचलन नहीं था. बंकिम बाबू ने इस गुरुतर चुनौती को स्वीकार किया और बँगला भाषा का पहला उपन्यास दुर्गेश नन्दिनी 1865, कपाल कुन्डला 1866, मृणालिनी 1869, विष वृक्ष 1873, चन्द्र शेखर 1877 में लिखा . इन सभी का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद भी उन्हीं समयों में होता रहा.
वस्तुतः “भारत की मातृ कल्पना और तदनुसार वंदना का गीत तो उन्होंने 1875 में ही रचित कर दिया था – लेकिन उसे प्रकाशित नहीं किया था. इस गीत को प्रस्तुत करने के लिये उपयुक्त भाव-भूमि की प्रक्रिया उनके मानस में चलती रही और इसी के परिणामस्वरूप उन्होंने सन् 1822 में “आनंद मठ” उपन्यास लिखा और उसमें ही “वन्दे मातरम् ” को स्थापित किया.
अंग्रेजी सहित सभी भारतीय भाषाओं में आनंद मठ का रूपांतरण हुआ...!!
1891 में ही ज्वाइ्न्ट कलेक्टर पद से त्यागपत्र दे दिया. पत्नी श्रीमती राज्य लक्ष्मी देवी के अनुसार बंकिम बाबू की अन्तिम साहित्यिक इच्छा पूरी नहीं हो पाई. वह एक पुस्तक झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई पर लिखना प्रारंभ कर दिए थे.रानी झाँसी के शौर्य ने उन्हें अभिभूत कर दिया था. रानी लक्ष्मी बाई पर पुस्तक लिखने की भावना के वशीभूत ही उन्होंने कलेक्टर पद से मात्र 52 वर्ष की उम्र में त्यागपत्र दिया था. लेकिन नियति ने साथ नहीं दिया और मात्र 55 वर्ष की उम्र में 8 अप्रैल 1894 में बंकिम बाबू इस नश्वर संसार से विदा हो गये.जब तक भारत रहेगा – तब तक वन्दे मातरम् भी रहेगा, और “बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय” का यशोगान प्रत्येक भारतीय के मानस में गुजांयमानित होता रहेगा..!!!
!!!...हार्दिक श्रद्धा सुमन – कोटिशः नमन…!!!

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