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रविवार, 5 जून 2016

रामवृक्ष यादव के गुरु जयगुरुदेव ने कहां से जुटाई थी 4 हज़ार करोड़ की संंपत्ति.....?

यादव के गुरु जयगुरुदेव ने कहां से जुटाई थी 4 हज़ार करोड़ की संंपत्ति......???

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जयगुरुदेव 
नई दिल्ली - पार्टी बनाई, उम्मीदवार उतारे, 20 साल तक लगातार हारते रहे। बावजूद इसके उन्होंने 4000 करोड़ बना लिए। वो अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी कही बातों ने हजारों ऐसे लोगों को एकजुट किया जिन्हें ‘सिरफिरा’ कहा जा रहा है।इन सिरफिरों के धर्मिक गुरू जय गुरुदेव के बारे में तमाम चौकाने वाली बातें सामने आ रही हैं...!!!
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक साल 1975 में जय गुरदेव ने खुद को नेता जी सुभाष चंद्र बोस का अवतार बताते हुए कानपुर में सभा की। जिसमें उन्हें जूते और पत्थर खाने पड़े।कथित समाजसेवी और आध्यामिक गुरू जय गुरुदेव ने साल 1980 में ‘दूरदर्शी पार्टी’ का गठन किया था। गुरुदेव ने साल 1989 के लोकसभा चुनावों में 12 राज्यों की 298 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। 20 वर्षों तक चली पार्टी का एक भी उम्मीदवार कभी संसद तक नहीं पहुंच पाया।
गुरुदेव के समर्थक सियासत तो नहीं कर सके लेकिन बवाल खूब किया। बवाल भी ऐसा कि कान्हा की नगरी में लाशों का अंबार लग गया।बीते गुरुवार को हुई हिंसा के पीछे गुरुदेव के ही एक कट्टर समर्थकों का हाथ माना जा रहा है।अरबों की जमीन पर ढाई साल से 2000 लोगों के साथ कब्जा जमाए बैठा रामवृक्ष यादव लोगों के मन में शासन प्रशासन के खिलाफ बगावत और नफरत के बीज बो रहा था। उन्हें भड़काने के साथ लालच भी देता और बाजार से कम दामों पर सामान बिकवाता था।
बाजार से 35 रुपये किलोग्राम के रेट पर चीनी खरीदकर पब्लिक को 25 रुपये में बेचता था। जब अंगूर 60 रुपये किलोग्राम थे, तब उसने 20 रुपये की दर पर बिकवाए। इसके बाद भी कब्जाधारियों के अलावा कोई और उसके जाल में नहीं फंसा।वह खुद को नेताजी सुभाषचंद बोस का फालोअर बताता और बातें भी अटपटी करता था। एक रुपये में 60 लीटर डीजल मिलना चाहिए, सोना 12 रूपये किलो होना चाहिए, मुद्रा सोने की होनी चाहिए। आजाद हिंद फौज का सिक्का चलना चाहिए, ऐसे प्रवचन देता था।
सुबह को बाग में रोजाना उसका प्रवचन होता था। मथुरा के लोगों को अपने मिशन से जोड़ने के लिए उसने महंगाई को हथियार बनाया। वह कहता था कालाबाजी से चीजें महंगी बिक रही है। उसने सस्ते सामान की दुकानें भी कई बार खोलीं।इन पर बाजार रेट से कम पर सामान देता था। जिस बाग को उसने कब्जा रखा था, उसके सारे फल तोड़कर वही बेचता था। यह कभी पार्क भी था, लोग सुबह की सैर पर इसमें आते थे लेकिन उसने कब्जा जमाने के बाद एंट्री पर बैन कर दिया। अगर कोई भूला-भटका पहुंच जाता तो रजिस्टर में उसकी एंट्री करता। खुद को बाग का मालिक बताता था।
रामवृक्ष यादव करीब चार साल पहले मथुरा आया था। तब उसका मकसद कुछ और था। वह बाबा जयगुरुदेव की गद्दी की विरासत हड़पना चाहता। उसने बाबा के आश्रम में जड़ जमाने की कोशिश की, लेकिन इसमें कामयाबी नहीं मिली। इसके बाद उसकी नजर गई उद्यान विभाग की अरबों की जमीन पर।दरअसल, यह कलक्ट्रेट के पास में है। प्रशासन ने इसके एक हिस्से को धरनास्थल बना दिया था। लोग यहां धरना प्रदर्शन करते थे। गाजीपुर के रहने वाले रामवृक्ष यादव ने दो दिन के लिए यहां प्रवास की अनुमति 2014 में मांगी थी। उसके साथ गिनती के लोग थे ।
लेकिन जैसे ही वह ठहरा, भीड़ आ गई। इसके बाद उन्होंने कब्जा कर लिया। यह बाग मथुरा के वीवीआईपी रोड पर है। यहां जमीन की कीमत 25 हजार से 50 हजार वर्ग गज है। बाग की जमीन 280 एकड़ में है। इसी पर उसने कब्जा जमा लिया था।जवाहर बाग पुलिस लाइन के बराबर में है। इसकी दीवार से पुलिसवालों के आवास सटे हैं। यहां रहने वाले उनके परिवार रामवृक्ष और उसके अनुयायियों से डरते थे। कब्जाधारी उनके बच्चों से गालियां देकर बोलते थे। पुलिस वालों को कोसते थे। उसने पुलिसवालों और उनके परिवारों की बाग में एंट्री बंद कर दी थी। कोई अंदर जाता, तो उसके साथ मारपीट करता। बाग खाली हो जाने से सबसे ज्यादा सुकून इन लोगों को ही मिला है l 

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