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रविवार, 15 मई 2016

एनआइए के सामने मजाक बन गई महाराष्ट्र एटीएस

एनआइए के सामने मजाक बन गई महाराष्ट्र एटीएस


मुंबई। मालेगांव विस्फोट कांड (द्वितीय) में पेश राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) की नई चार्जशीट ने महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) की विश्वसनीयता पर तो सवाल खड़े किए ही हैं, स्वयं उसकी विश्वसनीयता भी संदेह के घेरे में आ गई है। एनआइए इससे पहले भी दो महत्वपूर्ण मामलों में एटीएस जांच को पूरी तरह खारिज कर चुकी है। पहले जर्मन बेकरी विस्फोट कांड, फिर मालेगांव विस्फोट (प्रथम) और अब मालेगांव विस्फोट (द्वितीय) में एनआइए की जांच में एटीएस के तथ्यों को नकारा जा चुका है। एटीएस द्वारा पेश आरोप पत्र के आधार पर पुणे के जर्मन बेकरी विस्फोट कांड में एक आरोपी मिर्जा हिमायत बेग को निचली अदालत द्वारा मृत्युदंड की सजा सुनाई जा चुकी थी। लेकिन एनआइए की जांच के बाद हाई कोर्ट में उसके द्वारा पेश आरोप पत्र में हिमायत बेग का नाम कहीं लिया ही नहीं गया। फलस्वरूप तीन साल बाद आए मुंबई हाई कोर्ट के फैसले में हिमायत बेग की मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया।
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दूसरा महत्वपूर्ण मामला मालेगांव विस्फोट कांड (प्रथम) का है, जिसमें 20 दिन पहले ही एनआइए द्वारा पेश आरोप पत्र के आधार पर नौ मुस्लिम युवकों को मुंबई की एक अदालत ने बरी कर दिया। आठ सितंबर, 2006 को हुए इस विस्फोट कांड में 37 लोग मारे गए थे। एटीएस की जांच के आधार पर गिरफ्तार मुस्लिम युवकों को लंबा समय जेल में गुजारना पड़ा। अब शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में एनआइए द्वारा मालेगांव विस्फोट कांड (द्वितीय) मामले में दायर आरोप पत्र के आधार पर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल पुरोहित और कुछ अन्य आरोपियों को राहत का रास्ता साफ होता दिख रहा है।
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एनआइए सवालों के घेरे में....!!!
साध्वी प्रज्ञा एवं कर्नल पुरोहित को राहत मिलती देख विपक्षी दलों की त्यौरियां चढ़ गई हैं। इस मामले में अभियोजन पक्ष की विशेष वकील रही रोहिणी सेलियन का कुछ दिन पूर्व दिया एक बयान आग में घी का काम कर रहा है। सेलियन ने कहा था कि एनआइए के एक अधिकारी ने उन्हें इस मामले में हाथ ढीला रखने की हिदायत दी थी। जर्मन बेकरी विस्फोट कांड और मालेगांव विस्फोट (प्रथम) मामलों में एनआइए की तारीफ करने वाले राजनीतिक दल भी अब उस पर भगवा आतंकियों को राहत देने का आरोप लगा रहे हैं।
समाजवादी पार्टी की महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष और विधायक अबू आसिम आजमी ने इसे भगवा आतंकवाद को बचाने के लिए सरकार एवं एनआइए की साजिश करार दिया है। शरद पवार की पार्टी राकांपा इसे एनआइए का दुरुपयोग बता रही है। बता दें कि 2008 में हुए इन विस्फोटों के समय राज्य की यूपीए सरकार में गृह मंत्रालय राकांपा के ही पास था, जब एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे के नेतृत्व में इस मामले की जांच शुरू हुई थी।
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करकरे के नाम पर राजनीति...!!!
एनआइए द्वारा सुप्रीम कोर्ट में पेश आरोप पत्र के बाद पूर्व एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे के नाम पर भावनात्मक राजनीति शुरू हो गई है। आम आदमी पार्टी ने इसे करकरे का अपमान बताते हुए कहा सवाल उठाया कि क्या तब उनके द्वारा की गई जांच तथ्यहीन थी?
एटीएस ने छोड़ीं थीं कई खामियां...!!!
विशेषज्ञों का भी मानना है कि 2006 में हुए मालेगांव विस्फोटों की जांच करने वाली स्थानीय पुलिस टीम एवं एटीएस ने तब अपनी जांच में कई खामियां छोड़ दी थीं, जिन पर लगातार सवाल उठ रहे थे। इसके दो साल बाद ही मालेगांव में हुए दूसरे आतंकी विस्फोटों की जांच जब तत्कालीन एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे के नेतृत्व में शुरू हुई तो उन्होंने दो साल पहले की गलतियों से दूर रहते हुए कदम उठाए, ताकि जांच पर सवाल न उठें।
विस्फोटों में इस्तेमाल की गई मोटर साइकिल के जरिए एटीएस टीम पहले साध्वी प्रज्ञा तक पहुंची, उसके बाद कर्नल पुरोहित सहित अन्य लोग भी गिरफ्तार किए गए। लेकिन आरोप पत्र दाखिल किए जाने से पहले ही 26 नवंबर, 2008 को मुंबई पर हुए आतंकी हमले में एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।

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